गुरु-शिष्य संबंध

Paramahansa-Yogananda-the-guru

गुरु की भूमिका

एक साधारण आध्यात्मिक शिक्षक सच्चा गुरु नहीं होता, अपितु सच्चा गुरु वही हो सकता है जिसने ईश्वर के साथ एकत्व स्थापित कर लिया है और दूसरों को भी इस लक्ष्य की ओर ले जाने में समर्थ है।

संस्कृत ग्रन्थों में गुरु को “अंधकार को मिटाने वाला” (गु, “अंधकार”, और रु, “मिटाने वाला”) कहा जाता है। गुरु का कार्य है अपने शिष्य की मोक्ष पाने में सहायता करना, जो गुरु और शिष्य के बीच एक अत्यंत व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक संबंध के माध्यम से संभव है, जिसमें शिष्य का निष्ठापूर्वक आध्यात्मिक प्रयास और गुरु के दिव्य आशीर्वाद समाहित रहते हैं। भगवद्‌गीता में अर्जुन एक आदर्श भक्त, एक परिपूर्ण शिष्य के रूप में जाने गए हैं।

जब योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के सदस्य क्रियायोग की दीक्षा ले लेते हैं तब वे परमहंस योगानन्दजी और उनके सभी गुरुओं की शृंखला के शिष्य बन जाते हैं।

परमहंस योगानन्दजी — गुरु शृंखला में अंतिम गुरु

शरीर छोड़ने से पहले, परमहंस योगानन्दजी ने बताया था कि यह ईश्वर की ही इच्छा थी की वह वाईएसएस गुरुओं की शृंखला में अंतिम होंगे। उनके बाद कोई भी उनका शिष्य अथवा अग्रणी इस सोसाइटी में गुरु नहीं कहलाएगा।

भक्ति के इतिहास में इस प्रकार का दैवीय विधान विचित्र नहीं है। गुरु नानकदेव, महान्‌ संत जो सिख धर्म के संस्थापक थे, की परम्परा में कई गुरु हुए। गुरु शृंखला में दसवें गुरु के बाद यह घोषणा की गई कि वे ही अंतिम गुरु माने जाएँगे और उनके बाद शिक्षाएँ ही गुरु होंगी।

परमहंसजी ने यह आश्वासन दिया कि इस संसार से चले जाने के बाद भी वे उनके द्वारा संस्थापित योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के माध्यम से निरंतर कार्यरत रहेंगे। उन्होनें कहा, “मेरे जाने के बाद शिक्षाएँ ही गुरु होंगी।… शिक्षाओं के माध्यम से आप मेरे साथ और उन सब गुरुओं के साथ समस्वर हो सकेंगे, जिन्होनें मुझे यहाँ भेजा है।”

श्री श्री परमहंस योगानन्द तथा उनके गुरु के बारे में योगी कथामृत में और अधिक पढ़ें

गुरु-शिष्य संबंध पर ऑडियो व्याख्यान (अंग्रेज़ी में):

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