योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की शब्दावली

अहंकार : अहंकार-सिद्धान्त, अहंकार (अक्षरशः, ‘मैं करता हूँ’) द्वैतता या मानव एवं उसके सृष्टिकर्ता के बीच प्रतीयमान पृथकता का मूल कारण है। अहंकार मानव को माया की प्रभुता में ले आता है, जिसके कारण कर्ता (अहं) भ्रमित रूप से एक वस्तु नजर आने लगता है; सृष्टि के जीव स्वयं को सृष्टि के निर्माता समझने लगते हैं। अहंकारी चेतना को मिटाकर मनुष्य अपनी दिव्य पहचान, एकमात्र जीवन : परमेश्वर, के साथ एकात्मता में जाग्रत हो उठता है।

तत्त्व (पाँच) : ब्रह्माण्डीय स्पंदन, या ओम् जो सारी भौतिक सृष्टि को, जिसमें मानवीय भौतिक शरीर भी सम्मिलित है, पाँच तत्त्वों: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश की अभिव्यक्ति द्वारा संरचना करता है। ये संरचनात्मक शक्तियाँ, बुद्धिशील एवं स्पंदनीय प्रकृति की हैं। बिना पृथ्वी तत्त्व के, यहाँ कोई भी ठोस पदार्थ नहीं हो सकता: बिना जल तत्त्व के, कोई तरल अवस्था नहीं हो सकती; बिना वायु तत्त्व के, कोई गैसीय अवस्था नहीं हो सकती; बिना अग्नि तत्त्व के, ताप नहीं हो सकता; बिना आकाश तत्त्व के, ब्रह्माण्डीय चलचित्र को उत्पन्न करने हेतु कोई पृष्ठभूमि नहीं हो सकती। शरीर में, प्राण (विराट स्पंदनकारी ऊर्जा) मेडुला में प्रवेश करता है तथा वहाँ निम्न पाँच चक्रों या केन्द्रों: मूलाधार (पृथ्वी), स्वाधिष्ठान (जल), मणिपुर (अग्नि), अनाहत (वायु), विशुद्ध (आकाश) की क्रिया से पांच तत्त्वीय तरंगों में विभक्त हो जाता है। संस्कृत में इन तत्त्वों को पृथ्वी, अप् (जल), तेज, प्राण एवं आकाश कहा गया है।

शक्ति-संचार व्यायाम : मनुष्य ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से घिरा हुआ है, जैसे मछली पानी से घिरी हुई होती है। शक्ति-संचार व्यायाम जिनका परमहंस योगानन्दजी ने आविष्कार किया था, तथा जो योगदा सत्संग पाठमालाओं में सिखाए जाते हैं, मनुष्य को अपने शरीर को इस ब्रह्माण्डीय ऊर्जा या सार्वभौमिक प्राण द्वारा अनुप्राणित करने में सक्षम बनाते हैं।

ईथर : संस्कृत में आकाश। यद्यपि भौतिक जगत् की प्रकृति (nature) पर आज के वैज्ञानिक सिद्धान्त में इसे तत्त्व के रूप में मान्यता नहीं दी जाती, लेकिन भारतीय सन्तों द्वारा युगों से ईथर का इस प्रकार से संकेत दिया जाता रहा है। परमहंस योगानन्द ने ईथर को एक पृष्ठभूमि कहा है जिस पर ईश्वर सृष्टि के ब्रह्माण्डीय चलचित्र को प्रक्षेपित करते हैं। आकाश वस्तुओं को आयाम प्रदान करता है, ईथर चित्रों को अलग करता है। यह ‘पृष्ठभूमि’, एक सृजनात्मक शक्ति है जो सभी आकाशीय स्पंदनों को समन्वित करती है, जब हम सूक्ष्म शक्तियों — विचार एवं प्राणशक्ति (प्राण) — तथा आकाश की प्रकृति तथा पदार्थ एवं भौतिक शक्तियों के स्रोत के बारे में सोचते हैं तो यह एक आवश्यक घटक है। देखें — तत्त्व।

बुराई : माया की शक्ति जो मानव एवं प्रकृति में अशान्ति के रूप में प्रकट होकर सृष्टि में ईश्वर की सर्वव्यापकता को धूमिल कर देती है। मोटे तौर पर प्रत्येक वह वस्तु जो दिव्य नियम के विरुद्ध है (देखें —धर्म) अर्थात् जो मनुष्य को ईश्वर के साथ उसकी आवश्यक एकत्व की चेतना को खो देने का कारण बनती है, तथा ईश्वर-प्राप्ति में रुकावट है।

गुण : प्रकृति की तीन विशेषताएँ : तमस्, रजस् एवं सत्त्व —रुकावट, सक्रियता तथा विस्तार; या पदार्थ, ऊर्जा और बुद्धि। मनुष्य में तीनों गुण स्वयं को अज्ञानता या निष्क्रियता; सक्रियता या संघर्ष; तथा ज्ञान के रूप में व्यक्त करते हैं।

गुरु : आध्यात्मिक शिक्षक। यद्यपि गुरु शब्द को एक सामान्य शिक्षक या किसी भी शिक्षक अथवा प्रशिक्षक के संदर्भ में, प्रायः गलत प्रयोग किया जाता है, एक सच्चा ईश्वर प्राप्त गुरु वह है जिसने आत्म-संयम को सिद्ध करके अपनी एकता सर्वव्यापक परमेश्वर के साथ बना ली हो। ऐसा गुरु किसी भी जिज्ञासु को उसकी दिव्य अनुभूति की आन्तरिक यात्रा की ओर ले जाने के लिए अद्वितीय रूप से सक्षम होता है।

जब कोई भक्त ईश्वर की खोज के लिए तत्परता से तैयार हो जाता है, तब ईश्वर उसके पास गुरु को भेजते हैं। गुरु के ज्ञान, बोध, आत्मसाक्षात्कार तथा शिक्षाओं द्वारा ईश्वर शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं। गुरु की शिक्षाओं एवं अनुशासन का अनुसरण करके, शिष्य अपनी आत्मा की ईश्वर प्राप्ति के आध्यात्मिक आहार की इच्छा को पूरा करने में सक्षम होता है। एक सच्चा गुरु, जिसे ईश्वर ने सच्चे जिज्ञासु की गहन आत्म के प्रत्युत्तर में सहायता हेतु भेजा है, कोई साधारण शिक्षक नहीं होताः वह एक मानवीय वाहन है जिसका शरीर, वाणी, मन एवं आध्यात्मिकता का प्रयोग ईश्वर एक माध्यम के रूप में भटकी आत्माओं को अमरता के अपने घर में पुनः वापस लाने हेतु आकृष्ट एवं मार्गदर्शित करने के लिए भेजते हैं। गुरु धर्मग्रन्थों के सत्यों का जीवंत स्वरूप हैं। भक्त की पदार्थ के बंधनों से मुक्ति की माँग के प्रत्युत्तर में ईश्वर द्वारा नियुक्त वह मुक्ति का संवाहक होता है।

स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी अपनी पुस्तक ‘कैवल्य दर्शनम्’ (The Holy Science) में लिखते हैं, “गुरु के सान्निध्य का अर्थ सदैव उनकी भौतिक उपस्थिति में रहना नहीं होता (जैसा कि कभी-कभी असंभव होता है), लेकिन मुख्यतः उन्हें अपने हृदय में रखना तथा आदर्श रूप से उनके साथ रहना होता है, ताकि उनके साथ अन्तर्सम्पर्क बनाया जा सके”। देखें — गुरुदेव, मास्टर।

गुरुदेव : ‘दिव्य शिक्षक’, आदर सूचक प्रचलित संस्कृत शब्द जो व्यक्ति के आध्यात्मिक गुरु को संबोधित करने एवं उनका उल्लेख करने हेतु प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अंग्रेज़ी में इसे ‘मास्टर’ कह देते हैं।

सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप/योगदा सत्संग सोसाइटी के गुरु : भगवान् श्री कृष्ण, जीसस क्राइस्ट गुरु हैं तथा आधुनिक समय की उत्कृष्ट गुरु परम्परा, श्री श्री महावतार बाबाजी, श्री श्री लाहिड़ी महाशयजी, श्री श्री स्वामी श्री युक्तेश्वरजी तथा श्री श्री परमहंस योगानन्दजी हैं। भगवान् श्री कृष्ण के योग-उपदेशों तथा जीसस क्राइस्ट की शिक्षाओं में सामंजस्य एवं आवश्यक समानता दर्शाना योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की शिक्षाओं की पूर्णता के लिए एक आवश्यक अंग है। ये सभी गुरु अपनी उत्कृष्ट शिक्षाओं तथा दिव्य माध्यम होने के रूप में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का संपूर्ण मानव जाति को ईश्वर बोध का एक व्यावहारिक आध्यात्मिक विज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग करते हैं।

गुरु के आध्यात्मिक दायित्व का अपने ही गुरुवंश के शिष्य को हस्तांतरण गुरु-परम्परा कहलाता है। इस प्रकार, परमहंस योगानन्दजी के गुरुओं का सीधा वंश महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय और स्वामी श्रीयुक्तेश्वर है।

अपनी महासमाधि से पहले, परमहंस योगानन्दजी ने बताया था कि यह ईश्वर की इच्छा थी कि वह वाईएसएस गुरु परम्परा में अंतिम हों। उनके पश्चात् आने वाला कोई भी शिष्य या प्रमुख उनकी इस संस्था में कभी भी गुरु की उपाधि धारण नहीं करेगा। परमहंसजी ने विश्वास दिलाया था कि उनके प्रस्थान के बाद, वे स्वयं द्वारा स्थापित योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइजे़शन फ़ेलोशिप के माध्यम से कार्य करना जारी रखेंगे। उन्होंने कहा,”मेरे जाने के पश्चात् शिक्षाऐं ही गुरु होंगी।…उन शिक्षाओं के माध्यम से आप मुझ से और मुझे भेजने वाले महान गुरुओं के साथ समस्वर रहेंगे।”

जब उनसे योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप नेतृत्व के उत्तराधिकार के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “इस संगठन के प्रमुख के पद पर सदा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त पुरुष और महिलाएं होंगी। ईश्वर तथा गुरुजन उन्हें पहले से ही जानते हैं। वे सभी आध्यात्मिक और संगठनात्मक मामलों में मेरे आध्यात्मिक उत्तराधिकारी और प्रतिनिधि के रूप में काम करेंगे।”

ज्ञान योग : बुद्धि की विवेक शक्ति को आत्मा के सर्वज्ञ ज्ञान में परिवर्तित करके ईश्वर से एकात्म होने का मार्ग।

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