अष्टांग योग पथ

श्रीमद्भगवद्गीता एवं पतंजलि के योग सूत्र

योग, सभी सच्चे धर्मों के पीछे एक ऐसा समयातीत विज्ञान है जो आत्मा और परमात्मा के मिलन के सुव्यवस्थित एवं स्पष्ट सोपान प्रस्तुत करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता, जो दिव्य गुरु श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य पवित्र वार्तालाप है, योग का सर्वप्रिय भारतीय धर्मग्रन्थ है जिसका वर्णन परमहंस योगानन्दजी ने अपनी दो खण्डों में रचित अनुवाद और व्याख्या: ईश्वर-अर्जुन संवाद: श्रीमद्भगवद्गीता–आत्म-साक्षात्कार का राजयोग विज्ञान, में किया है।

प्राचीन ऋषि पतंजलि ने अपने संक्षिप्त परन्तु अत्यंत ज्ञानयुक्त ग्रन्थ ‘योग सूत्र’ में व्यवस्थित रूप से योग के मूल तत्व के विषय में बताया था। परमहंस योगानन्दजी ने लिखा है :

“पतंजली का निश्चित काल ज्ञात नहीं है। अनेक विद्वान उनका काल ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी मानते हैं। उनकी सुप्रसिद्ध ‘योग सूत्र’ संक्षिप्त सूक्तियों की एक श्रृंखला है, जो ईश्वर साक्षात्कार के अत्यंत व्यापक और गहन विज्ञान का सारगर्भित तत्व है—जिसमें आत्मा और अभिन्न परमात्मा के एकाकार होने की प्रविधि इतने सुंदर, स्पष्ट तथा संक्षिप्त रूप में बताई गई है कि विद्वानों की पीढ़िओं ने ‘योग सूत्र’ को योग पर लिखी गई सर्वोपरि पुरातन रचना स्वीकार किया है।”

पतंजली की योग पद्धति को अष्टांग योग के नाम से जाना जाता है, जो आत्मसाक्षात्कार के चरम लक्ष्य की ओर ले जाता है।

पतंजलि का अष्टांग योग:

शेयर करें

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email