एक आध्यात्मिक गौरवग्रन्थ की रचना

“परमहंस योगानन्दजी से मिलने का अनुभव मेरे जीवन के उन अविस्मरणीय अनुभवों में से एक है जिसकी छाप मेरी स्मृति पर गहरी पड़ी हुई है…. उन्हें देखने का प्रभाव अपरिमेय था… जैसे ही मैंने उनके चेहरे को देखा मेरी आँखें एक प्रकाश से लगभग चौंधिया गई —आध्यात्मिकता का प्रकाश जो वास्तव में उनसे प्रस्फुटित हो रहा था। उनकी अनन्त शालीनता, उनकी उदार सौम्यता ने मुझे गर्माहट देने वाले सूर्य के प्रकाश की भाँति परिवेष्टित कर लिया…. मैं देख सकता था की उनकी समझ और अन्तर्दृष्टि अधिकतर सामाजिक समस्याओं तक पहुंची थी, यद्यपि वे एक दिव्य व्यक्ति थे। मैंने उनमें भारत के वास्तविक राजदूत को पाया, जो भारत के प्राचीन ज्ञान के सार को विश्व में प्रसारित कर रहे थे।”

डा. बिनय आर. सेन, यू.एस.ए. में भारत के भूतपूर्व राजदूत  

वे लोग जो परमहंस योगानन्दजी, उनके अपने जीवन और व्यक्तित्व से व्यक्तिगत रूप से परिचित थे, उस प्राचीन ज्ञान को जो उन्होंने विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया, के प्रभाव और प्रमाणिकता के विश्वसनीय साक्ष्य थे। उनकी आत्मकथा योगी कथामृत के असंख्य पाठक उसके पृष्ठों में, उनके उसी आध्यात्मिक प्रभुत्व के प्रकाश की उपस्थिति के साक्षी हैं, जो उनके व्यक्तित्व से विकीर्ण होती थी। साठ से अधिक वर्ष पूर्व जब यह प्रथम बार प्रकाशित हुई, अत्युत्कृष्ट कृति के रूप में इसका अभिवादन हुआ। पुस्तक ने न केवल एक सुस्पष्ट महान् जीवन की कथा कही, अपितु पूर्व के आध्यात्मिक विचारों का विशेष कर ईश्वर के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क करने के विज्ञान का हृदयग्राही परिचय दिया पाश्चात्य लोगों के लिये ज्ञान के उस विषय को प्रकट किया जो अब तक कुछ ही लोगों के लिये सुलभ था।

योगी कथामृत को आज आध्यात्मिक साहित्य के गौरवग्रन्थ के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस परिचय में, हम इस पुस्तक का कुछ इतिहास साझा करना चाहते हैं।

योगी कथामृत का असाधारण इतिहास

इसके लेखन की भविष्यवाणी तो बहुत पहले ही कर दी गई थी। आधुनिक समय में योग के पुनर्जागरण के आरम्भिक व्यक्तियों में, उन्नीसवीं शताब्दी के गुरु श्रद्धेय लाहिड़ी महाशय ने पहले ही कह दिया था, “मेरे चले जाने के लगभग पचास वर्ष पश्चात्, मेरा जीवन वृत्तान्त, पश्चिम में योग के प्रति गहन रुचि जागने के कारण लिखा जायेगा। योग का सन्देश विश्व भर में छा जायेगा। यह मनुष्य के भाईचारे को स्थापित करने में सहायता करेगा: एक ही पिता की, मानवता की प्रत्यक्ष अवधारणा पर आधारित एकता।”

कई वर्ष पश्चात्, लाहिड़ी महाशय के उन्नत शिष्य स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने यह भविष्यवाणी श्री योगानन्दजी को बतायी। उन्होंने घोषणा की, “उस सन्देश के प्रसार में तुम्हें अपनी भूमिका निभानी होगी, और उस पवित्र जीवनी को लिखने में भी।” सन् 1945 में, लाहिड़ी महाशय के ब्रह्मलीन होने के ठीक पचास वर्ष पश्चात्, परमहंस योगानन्दजी ने अपनी योगी कथामृत पूर्ण की, जिसने उनके गुरु की दोनों आज्ञाओं को बखूबी से निभाया, अंग्रेज़ी में लाहिड़ी महाशय के उल्लेखनीय जीवन की विस्तृत प्रस्तुति, और विश्व के श्रोताओं का भारत के युगों पुराने आत्मा के विज्ञान से परिचय।

योगी कथामृत की रचना में परमहंस योगानन्दजी ने कई वर्षों तक काम किया। दया माताजी उनकी आरम्भिक और निकटतम शिष्या स्मरण करती हैं:

“जब मैं सन् 1931 में माउन्ट वॉशिंग्टन आई, परमहंस योगानन्दजी ने पहले से ही आत्मकथा पर काम करना आरम्भ कर दिया था। एक बार जब कुछ सचिवीय कार्यों को करने के लिये उनके अध्ययन कक्ष में थी, मुझे उनके द्वारा लिखित कुछ आरम्भिक अध्यायों में से एक को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ यह “बाघ स्वामी,” पर था। उन्होंने मुझे उसे सुरक्षित रखने के लिये कहा और समझाया कि जो पुस्तक वे लिख रहे थे वह उसमें जायेगा। पुस्तक के अधिकतर भाग की रचना बाद में सन् 1937 और 1945 के बीच में हुई।”

जून 1935 से अक्तूबर 1936 तक श्री योगानन्दजी ने, अपने गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से अन्तिम भेंट हेतु (यूरोप और फिलिस्तीन से होते हुए) भारत की आमोद-यात्रा की। वहाँ रहते हुए उन्होंने आत्मकथा के लिये बहुत से तथ्यात्मक विवरण और कुछ सन्तों एवं ऋषियों से सम्बन्धित कथाएँ संकलित की, जिन्हें वे जानते थे और जिनके जीवन के विषय में वे अपनी पुस्तक में अविस्मरणीय रूप से बताना चाहते थे। “मैं श्रीयुक्तेशरजी का अनुरोध कभी नहीं भूला कि मैं लाहिड़ी महाशय के जीवन के विषय में लिखूं,” वे आगे लिखते हैं, “भारत में अपने प्रवास के समय में मैं योगावतार के शिष्यों और सम्बन्धियों से सम्पर्क करने के प्रत्येक अवसर का लाभ ले रहा था। उनकी बातचीत के प्रत्येक विवरण को विस्तार से अंकित कर रहा था, मैंने तथ्यों और तिथियों की पुष्टि की, चित्रों, पुराने पन्नों तथा दस्तावेजों को एकत्रित भी किया।”

सन् 1936 के अन्त में, अमेरिका वापस आने पर, उन्होंने अपना अधिकतर समय, उनकी अनुपस्थिति में उनके लिये दक्षिणी कॅलिफ़ोर्निया तट पर एन्सिनीटस में निर्मित आश्रम में ही व्यतीत करना आरम्भ किया। यह वर्षों पूर्व आरम्भ हुई इस पुस्तक को पूर्ण करने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये एक आदर्श स्थान प्रमाणित हुआ।

“मेरी स्मृति में अभी भी उस शान्तिपूर्ण समुद्र तटीय आश्रम में बिताये हुए वे दिन सजीव हैं,” श्री दया माता बताती हैं। उनकी इतनी सारी वचनबद्धतायें और उत्तरदायित्व थे कि वे आत्मकथा पर प्रतिदिन कार्य नहीं कर पाते थे, परन्तु सामान्यत: वे सन्ध्या का समय इसे समर्पित करते थे, और जो भी खाली समय इसके लिये निकाल सकते थे। लगभग सन् 1939 या 1940 के आरम्भ से वे पुस्तक पर पूर्ण समय ध्यान दे पाये। और पूर्ण समय था ब्रह्मवेला से अगली ब्रह्मवेला तक! हम शिष्यों का एक छोटा समूह तारा माता, मेरी बहन, आनन्द माता; श्रद्धा माता और मैं-उनकी सहायता के लिये उपस्थित थे, प्रत्येक भाग टाईप हो जाने पर, वे उसे तारा माता को देते थे, जो उनके लिये सम्पादक का कार्य करती थीं।

“कितनी बहुमूल्य स्मृतियाँ! जब उन्होंने लिखा तब दिव्य अनुभवों को भीतर पुन: उसे वैसा ही जीया भी। उनका दिव्य प्रयोजन सन्तों और महान् गुरुओं के सान्निध्य में तथा किसी की ईश्वर प्राप्ति में व्यक्तिगत अनुभूतियों से प्राप्त आनन्द और रहस्योद्घाटन को साझा करना था। प्राय: वे कुछ समय तक विराम लेते, दृष्टि ऊपर की ओर स्थिर और शरीर अविचल, समाधि अवस्था में ईश्वर के गहन मिलन में लवलीन हो जाते। पूरा कक्ष दिव्य प्रेमी की अत्यन्त प्रभावी आभा से भर जाता। हम शिष्यों का ऐसे समयों में उपस्थित रहना मात्र ही चेतना की उच्च अवस्था में उठा देता था।

“अन्त में, सन् 1945 में, पुस्तक के पूर्ण होने का आनन्ददायक दिन भी आ गया। परमहंसजी ने अन्तिम शब्द लिखे भगवन! आपने इस संन्यासी को इतना बड़ा परिवार दिया,” तब कलम नीचे रख दी और आनन्दपूर्व कहा:

“सब कर दिया; यह पूर्ण हुई। यह पुस्तक लाखों लोगों का जीवन बदल देगी। जब मैं चला जाऊँगा, यह मेरी सन्देशवाहक होगी।”

इसके पश्चात् प्रकाशक को खोजना यह तारा माता का दायित्व हो गया। सन् 1924 में, सेन फ्रांसिस्को में, व्याख्यानों और कक्षाओं की श्रृंखला के संचालन के समय परमहंस योगानन्दजी की भेंट तारा माता से हुई। दुर्लभ आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न, वे उनके सर्वाधिक उन्नत शिष्यों के एक छोटे से मण्डल में से एक हो गईं। उन्होंने उन (तारा माता) की सम्पादकीय क्षमताओं को सर्वोच्च स्थान पर रखा, और प्राय: कहते थे कि अभी तक जितने भी लोगों से मैं कभी भी मिला, उनमें से सबसे प्रतिभाशाली मस्तिष्क इसके पास है। उन्होंने उनके भारतीय शास्त्रों के विस्तृत ज्ञान और समझ की भी सराहना की और एक अवसर पर कहा, “मेरे महान् गुरु श्रीयुक्तेश्वरजी के अतिरिक्त और कोई अन्य नहीं है, जिसके साथ भारतीय दर्शन पर बातचीन का मैंने आनन्द उठाया हो।”

तारा माता पाण्डुलिपि को लेकर न्यूयार्क शहर गईं। लेकिन प्रकाशक खोजना एक सरल कार्य नहीं था। प्राय: ऐसा देखा जाता है, एक महान् कार्य की उच्चता को, पारम्परिक स्वभाव के लोगों द्वारा पहली बार में ही मान्यता प्राप्त नहीं होती। नवजात परमाण्विक युग जिसमें पदार्थ, ऊर्जा, और विचार की सूक्ष्म एकता से विकसित होती समझ से मानवता की सामूहिक चेतना के विस्तार के उपरान्त भी, उस समय के प्रकाशक ‘द्विशरीरी सन्त’ और ‘हिमालय में महल का सृजन’ जैसे अध्यायों के लिये तैयार नहीं थे!

एक वर्ष तक, तारा माता एक कम सुसज्जित, उष्मारहित, ठण्डे-जल वाले फ्लैट में रहीं। अन्तत: वे सफलता के समाचार का तार भेज पायीं। न्यूयार्क के एक सम्मानित प्रकाशक, ‘द फिलॉस्फिकल लाइब्रेरी,’ ने आत्मकथा को प्रकाशित करना स्वीकार कर लिया था। “उस (तारा माता) ने इस पुस्तक के लिये जो किया है मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता,” श्री योगानन्दजी ने कहा, “किन्तु उसके बिना यह पुस्तक कभी भी सम्भव नहीं थी।”

पुस्तक का पाठकों और विश्व भर की प्रेस द्वारा भावोद्गार पूर्ण प्रशंसनात्मक स्तुति से स्वागत किया गया। कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस, ने धर्म की अपनी समीक्षा में लिखा, “योग की इस प्रस्तुति के समान अंग्रेज़ी या किसी अन्य यूरोपीय भाषा में इससे पूर्व कुछ भी नहीं लिखा गया है।” द न्यूयार्क टाइम्स ने इसे “एक अद्वितीय वृत्तान्त” घोषित किया। न्यूज़ वीक ने लिखा, “योगानन्द की पुस्तक शरीर की आत्मकथा की अपेक्षा आत्म की आत्मकथा है। यह जीवन के धार्मिक रूप का, सरस और उदार पौर्वात्य शैली में लिखा मनमोहक तथा व्याख्यापूर्ण अध्ययन है।”

द्वितीय संस्करण शीघ्रत: तैयार किया गया, और सन् 1951 में तृतीय संस्करण। पुनरीक्षण और ग्रंथांशों के अद्यतन करने और संस्थात्मक गतिविधियों तथा योजनाओं का वर्णन करने वाले उन कुछ अंशों को जो अब वर्तमान में कार्यान्वित नहीं थे, को हटाने के अतिरिक्त, परमहंस योगानन्दजी ने एक अन्तिम अध्याय और समाविष्ट किया-पुस्तक में सबसे लम्बे अध्यायों में से एक सन् 1940 से 1951 तक के वर्षों को समाहित करते हुए। नये अध्याय की पाद-टिप्पणी में उन्होंने लिखा, “अध्याय 49 में बहुत-सी नई सामग्री, इस पुस्तक के तृतीय संस्करण (1951) में दी गई है। पहले दो संस्करणों के पाठकों के अनुरोध के प्रतिवचन में मैंने इस अध्याय में, भारत, योग तथा वैदिक दर्शन के विषय में विभिन्न प्रश्नों के उत्तर दिए हैं।”

परमहंस योगानन्दजी द्वारा किये गये अतिरिक्त संशोधन, सप्तम संस्करण (1956) में सम्मिलित किये गये, जैसा कि प्रकाशकीय टिप्पणी में बताया गया है। योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप द्वारा प्रकाशित सभी वर्तमान संस्करण योगानन्दजी की इच्छानुसार इस पुस्तक के अंतिम संस्करण के अनुरूप हैं।

“सन् 1951 के संस्करण में लेखक की टिप्पणी में, परमहंस योगानन्दजी ने लिखा, सहस्रों पाठकों के पत्र पाकर मैं बहुत अधिक प्रभावित हुआ। प्रकट किये गये उनके मतों एवं विचारों तथा इस तथ्य कि पुस्तक का अनुवाद कई भाषाओं में किया गया है, ने मुझे यह विश्वास करने के लिये प्रोत्साहित किया है कि पश्चिम को इन पृष्ठों में इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर प्राप्त हुआ: ‘क्या योग के प्राचीन विज्ञान का आधुनिक व्यक्ति के जीवन सार्थक में कोई स्थान है?’”

बीतते वर्षों के साथ, ‘सहस्रों पाठक’ करोड़ों हो गये, योगी कथामृत की चिरस्थाई और सर्वजनीन प्रभावोत्पादकता तेजी से स्पष्ट हो रही थी। प्रथम प्रकाशन के साठ से अधिक वर्षों पश्चात यह अभी भी आध्यात्मिक और प्रेरणादायक सर्वश्रेष्ठ बिकने वाली पुस्तकों की सूची पर दृष्टिगोचर हो रही है। एक दुर्लभ घटना! कई अनूदित भाषाओं में उपलब्ध, यह पूर्वी दर्शन और धर्म से लेकर अंग्रेजी साहित्य, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, मानव-विज्ञान, इतिहास और यहाँ तक कि व्यापार के प्रबन्धन के पाठ्य-क्रमों में विश्वभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रयुक्त हो रही है। जैसे कि एक शताब्दी से भी अधिक समय पूर्व लाहिड़ी महाशय द्वारा भविष्यवाणी की गई, योग के सन्देश और उसकी ध्यान की प्राचीन परम्परा ने वास्तव में ही विश्व को आवृत कर लिया है।

पुस्तक के अन्तिम अध्याय में परमहंस योगानन्दजी, विश्व के युगों से चले आ रहे सभी धर्मों के सन्तों और सिद्ध महात्माओं द्वारा पुष्ट किये गये परम आश्वासन को लिखते हैं:

“ईश्वर प्रेम है: सृष्टि के लिये उनकी योजना केवल प्रेम में ही निहित हो सकती है। क्या यह सरल विचार मानव हृदय को विद्धतापूर्ण तर्कों की अपेक्षा अधिक सान्त्वना नहीं देता है? प्रत्येक वह सन्त जो सत्य के अर्थ तक पहुँच गया है, ने साक्षी दी कि दिव्य योजना का अस्तित्व है और सुन्दर तथा आनन्दपूर्ण है।” योगी कथामृत अपनी द्वितीय अर्द्ध शताब्दी में चल रही है, हमारी यह आशा है कि इस प्रेरणादायक कार्य के सभी पाठक वे—सभी जिनके सामने यह पहली बार आई है, साथ ही साथ वे जिनके लिये जीवन पथ पर यह लम्बे समय से सम्वर्द्धन करने वाली साथी रही है—अपनी आत्माओं को, भावातीय सत्य जो जीवन के आभासित रहस्यों के केन्द्र में निहित है में, गहन आस्था में खुलता हुआ पायेंगे।

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