अंतर्ज्ञान

श्री श्री परमहंस योगानन्द की रचनाओं से चयनित

अन्तर्ज्ञान आत्मा द्वारा मार्गदर्शन है, जो मनुष्य में उन क्षणों में स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है; जब उसका मन शान्त होता है।… योग विज्ञान का लक्ष्य मन को शान्त करना है, ताकि विकृत हुए बिना यह आन्तरिक आवाज़ के अचूक परामर्श को सुन सकें।

“अपनी सभी समस्याओं का समाधान ‘ध्यान’ द्वारा करो,”[लाहिड़ी महाशय ने कहा]। “स्वयं को सक्रिय आन्तरिक ईश्वरीय मार्गदर्शन के साथ अन्तर्सम्पर्क में लाओ; ईश्वर की वाणी में जीवन की सभी दुविधाओं का उत्तर है। यद्यपि मनुष्य की स्वयं को कष्टों में डालने की चतुरता अन्तहीन प्रतीत होती है, तथापि ईश्वर की अनन्त सहायता भी कम साधन सम्पन्न नहीं है।”

हम केवल उन (ईश्वर) पर निर्भर रहें, ईश्वर की इस इच्छा से, उनका यह अर्थ नहीं है कि आप स्वयं के बारे में न सोचें; वे चाहते हैं कि आप अपनी पहलशक्ति का प्रयोग करें। भाव यह है, कि यदि आप पहले ईश्वर के साथ सचेत अन्तर्सम्पर्क प्राप्त करने में असफल रहते हैं, तो आप परम स्रोत से अलग हो जाते हैं और इसलिए आप उनकी सहायता प्राप्त नहीं कर सकते। जब आप सभी कार्य-कलापों के लिए सर्वप्रथम उनकी ओर अभिमुख होते हैं तो वे आपका मार्गदर्शन करेंगे; वे आपकी ग़लतियों को आपके सामने प्रकट करेंगे ताकि आप स्वयं को बदल सकें एवं अपने जीवनपथ को बदल दें।

याद रखें, कि मन के लाखों तर्कों से बढ़ कर है, बैठ कर ईश्वर का तब तक ध्यान करना, जब तक कि आप भीतर शान्ति का अनुभव न कर लें। फिर प्रभु से कहें, “मैं अपनी समस्या को अकेले हल नहीं कर सकता, चाहे मैं असंख्य विचार सोचूँ; परन्तु मैं इसे आपके हाथों में सौंपकर, सर्वप्रथम आपके मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करके, और फिर संभावित समाधान के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचकर मैं इसका समाधान कर सकता हूँ।” ईश्वर उनकी सहायता अवश्य करते हैं जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। ध्यान में ईश्वर से प्रार्थना करने के उपरान्त जब आपका मन शान्त एवं विश्वास से भरपूर होता है, तो आप अपनी समस्याओं के अनेक समाधानों को देख सकते हैं; और क्योंकि आपका मन शान्त है, इसलिए आप सर्वोत्तम समाधान को चुनने में सक्षम होते हैं। उस समाधान का अनुसरण करें और आपको सफलता मिलेगी। यह धर्म के विज्ञान को अपने दैनिक जीवन में लागू करना है।

अंतर्ज्ञानात्मक शांति के संवर्धन हेतु आंतरिक जीवन के अनावरण कि आवश्यकता होती है। जब अंतर्ज्ञान बहुत उन्नत हो जाये तो सत्य का बोध तुरंत हो जाता है। आप इस अद्भुत अनुभूति को प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान के द्वारा यह संभव है।

“मानव जीवन तब तक दुःखों में ग्रस्त रहता है जब तक कि हम दिव्य इच्छा के साथ अन्तर्सम्पर्क स्थापित नहीं कर लेते, जिसकी ‘सही दिशा’ प्रायः अहंकारयुक्त बुद्धि के लिए चकरा देने वाली होती है,” [स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी  ने कहा]। “केवल ईश्वर ही अचूक परामर्श देते हैं; क्योंकि सृष्टि के भार को उनके अतिरिक्त और कौन वहन करता है?”

प्रतिदिन प्रातः और रात को शान्ति या गहरे ध्यान में जाएँ, क्योंकि ध्यान ही सत्य एवं ग़लत विचार के बीच विवेक करने का एक मात्र उपाय है।

अपनी अन्तरात्मा से, जो आपके अन्दर एक दिव्य विवेक शक्ति है, मार्गदर्शन प्राप्त करना सीखें।

ईश्वर आपके अन्तरात्मा के मन्दिर में मन्द ध्वनि हैं, और वे (ईश्वर) अन्तर्ज्ञान का प्रकाश हैं। आप जानते हैं जब आप ग़लत कार्य कर रहे होते हैं; आपका सम्पूर्ण अस्तित्व आपको बताता है, और यह अनुभूति ईश्वर की वाणी है। यदि आप उनको नहीं सुनते तो वे चुप हो जाते हैं। लेकिन जब आप अपने भ्रम से जागें, और उचित कार्य करना चाहें, तो वे आपका मार्गदर्शन करेंगे।

अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ का, जो कि ईश्वर की आवाज़ है, निरन्तर अनुसरण करने से, आप एक सच्चे चरित्रवान व्यक्ति, एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक व्यक्ति, एक शान्त व्यक्ति बन जाएँगे

जब हम परमपिता परमात्मा को जान लेंगे, तब हम केवल अपनी समस्याओं के उत्तर ही नहीं, अपितु संसार की समस्याओं के उत्तर भी प्राप्त कर लेंगे। हम क्यों जीते हैं और क्यों मर जाते हैं? वर्तमान की घटनाएँ क्यों हैं और भूतकाल की क्यों थी? मुझे शंका है कि शायद ही कभी कोई ऐसा सन्त इस धरा पर आएगा जो सभी मनुष्यों के सभी प्रश्नों के उत्तर देगा। परन्तु ध्यान के मन्दिर में जीवन की प्रत्येक उलझन का, जो हमारे हृदय को दुःखी करती है, समाधान हो जाएगा। जब हम ईश्वर के सम्पर्क में आएंगे, हम जीवन की पहेलियों के उत्तरों को जान लेंगे और अपनी सभी कठिनाइयों के समाधान प्राप्त कर लेंगे।

प्रार्थना और प्रतिज्ञापन

परमपिता, आपका ब्रह्मांडीय जीवन और मैं एक हैं। आप सागर हैं, मैं लहर हूँ; हम एक हैं। मैं अपने दैवी जन्मसिद्ध अधिकार कि मांग करता हूँ, यह आंतरिक अनुभूति करते हुए कि सभी बुधिमत्ता तथा शक्ति पहले से ही मेरी आत्मा में निहित है। ईश्वर मेरे तर्क के पीछे हैं, आज व प्रतिदिन और मुझे सही कार्य करने हेतु सदा मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं।

परमपिता, जगन्माता, सखा, प्रियतम प्रभु! मैं तर्क करूँगा, मैं इच्छाशक्ति का प्रयोग करूँगा, मैं कार्यरत होऊँगा; परन्तु आप मेरे तर्क, इच्छाशक्ति एवं कार्य को उचित दिशा की ओर निर्देशित करें।

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