150th Anniversary of Revival of Kriya Yoga -2011 - Hindi

क्रिया-योग के पुरुत्थान की 150वीं वर्षगांठ - 2011

श्री श्री मृणालिनी माता का संदेश

प्रिय आत्मन,

सितम्बर - अक्टूबर 2011

लम्बे समय से लुप्त हो चुके पुण्य क्रिया-योग विज्ञान को इस युग के लिए एक विशेष ईश्वरीय वरदान के रूप में पुनः प्रदान किया गया था | वर्तमान वर्ष इस विज्ञान के पुरुत्थान की 150वीं वर्षगांठ है | अतः ये महत्वपूर्ण समय आनद मनाने का अवसर है, और साथ ही साथ यह ईश्वर तथा योगदा सत्संग सोसाइटी के हमारे पूज्य गुरुओं की परम्परा के प्रति आमार व्यक्त करने का भी अवसर है, क्योंकि उन्होंने ही ईश्वर-प्राप्त ऋषियों के प्राचीन उन्नत युग के दिव्य भंडार से यह अनमोल उपहार हमें प्रदान किया है |

क्रिया-योग मानव चेतना के उन्यन का विज्ञान है | यह मनुष्य की आत्मा में निहित ईश्वर के साम्राज्य को पाने की कुंजी है, और एक ऐसी कुंजी है जिसके द्वारा हम इस मतर्य-लोक में रहते हुए भी उस स्वर्ग-सदृश साम्राज्य को अनुभव कर सकते हैं जो सांसारिकता में लिप्त साधारण मतर्य-चेतना के आवरण से ढका रहता है | इस उपहार में ईश्वर की अनुकम्पा, तथा सत्यनिष्ठ क्रिया योगियों के प्रति हमारे महान गुरुओं की सहायता एवं मार्गदर्शन का आश्वासन भी निहित है | क्रिया के अभ्यास का, तथा उचित तरीके से जीवनयापन करने का प्रत्येक सच्चा प्रयास ईश्वर एवं गुरुजनों के सदा-उपस्थित आशीषों के प्रति भक्त की ग्रहणशीलता को गहनतर बनता हैं |

हमारे गुरुदेव परमहंस योगानन्दजी की इस संस्था के माध्यम से संसार को क्रिया-योग से पुनः अवगत कराया जाना,तथा इस विज्ञान को विश्वव्यापी प्रसार होना, ये दोनों घटनायें एक ऐसे समय पर हुई हैं जब मानव-जाति के क्रम-विकाश का दौर एक अहम् मोड़ पर आ पहुंचा है | गत शताब्दियों में वैज्ञानिक एवं तकनिकी उपलब्धियों के क्षेत्र में महान सफलतायें हासिल की जा चुकी हैं,किन्तु तब भी विकास के ये दौर उथम-पुथल से दूषित ही रहे हैं | ये इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं की अपने आप में इस प्रकार की उपलब्धियाँ सच्ची प्रसन्ता एवं संतुष्टि प्रदान करने के लिए पर्यापत नहीं हैं | ईश्वर-संपर्क द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के बिना लोगों के हृदयों में सदा ही एक रिक्तकता बानी रहेगी जो कभी-भी पूर्ण नहीं होगी चाहे ऐंद्रिय इच्छाओं एवं अहंमन्य आकांक्षाओं की कितनी भी तृप्ति क्यों न कर ली जाये | ईश्वर के साथ हमारे शाश्वत सम्बन्ध के, तथा हमारे दैनिक जीवनों में ईश्वर को समाविष्ट करने की अनिवार्यता के बोध द्वारा ही हमरा अस्तित्व पूर्ण हो सकता है | उचित जीवनयापन तथा ध्यान की शिक्षा प्रदान करने वाला क्रिया-योग हमारे अंतर में, दुसरो के साथ हमारे सम्बन्धो में, तथा हमारे स्रष्टा-परमपिता परमेश्वर-के साथ हमरे सम्बन्ध में भी समस्वरता लता है | यह विज्ञान उन अनेकानेक लोगों की आत्मा की गुहार का ईश्वर का करुणामय प्रत्युतर है जो माया के बंधन से उत्पन्न होने वाले दुःख-कष्टों से मुक्त होने की उत्कण्ठा रखते हैं | यह हमें एक माध्यम प्रदान करता है की हम ईश्वर की शान्ति एवं दिव्य-प्रेम को अनुभव कर सकें, की हम ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध में अपने कल्याण का बोध पा सकें, और अंततः की हम अपनी चेतना को शरीर-बध अहं से हटा कर अपनी अमतर्य आत्मा की और केन्द्रित कर सकें | यही है चेतना की वह अवस्था जिसमे गुरुदेव परमहंसजी रहा करते थे | हमने देखा हैं यधपि अपने ईश्वर-प्रदत मिशन का निर्वाह करने में उन्हें अनगिनत उतरदायित्वों एवं अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता था, तथापि वे सदा ईश्वर के परमानन्द में दृढ़ता से स्थित रहते थे | उन्होंने कितनी अथक सेवा की, ताकि वे सभी के साथ उन उनतकारी आशीषों को बाँट सकें जो क्रिया-योग प्रदान कर सकता है |

गुरूजी ने हमें स्मरण कराया है की हममे से प्रत्येक के पास ईश्वर को जानने का सहजात आध्यात्मिक जन्मसिद्ध आधिकार है, और यहाँ तक कि यह इसी जीवनकाल में किया जा सकता है | क्रिया-योग के गहन ध्यान द्वारा जब हम अनंत परमात्मा का स्पर्श करते हैं, तो हम अपनी सांसारिक भूमिका में उनके दिव्य गुणों को वयकत करते हैं | ईश्वर की प्रज्ञा हमें सक्षम बनाती है की हम दूसरों को बेहतर समझ सकें और अपनी चुनौतियों के समाधान खोज सकें | ईश्वर-प्रेम का अनुभव कर हम अधिक करुणाशील एवं क्षमाशील बनते हैं | महावतार बाबाजी क्रिया-योग की रूपांतरणकारी शक्ति का उल्लेख कर रहे थे जब उन्होंने यह भविष्वाणी की थी की मनुष्य को अनन्त परमपिता का व्यक्तिगत इन्द्रियातीत अनुभव करने के द्वारा यह राष्ट्रों के बिच सौमनस्य-सौहार्द्र स्थापित करने में सहायक होगा |" हमारे व्यक्तिगत प्रयास अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जैसे-जैसे माया का अन्धकार हमारी चेतना से हटता जाता है, हम अधिकाधिक रूप से ईश्वर के प्रकाश को खोज के मार्ग में जुड़ती जायेंगी, वैसे-वैसे ईश्वर के प्रकाश का आरोग्यकारी प्रभाव समूचे विश्व में फैलता जायेगा | इस पवन वर्षगांठ के अवसर पर मेरा प्रेम एवं मेरी प्रार्थनायें आपको प्राप्त हों कि क्रिया-योग एवं गुरुजनों के आशीर्वादों के माध्यम से आप अपनी आत्मा की जागृति के आनन्द का अनुभव कर सकें, और ईश्वर ने जहाँ कहीं भी आपको रखा है आप वहां ईश्वर का सौहार्द एवं प्रेम विकीर्ण कर सकें |

ईश्वर एवं गुरुदेव के प्रेम में अनन्त आशीष आपको प्राप्त हों,

श्री श्री मृणालिनी माता