परमहंस योगानन्दजी पर डॉक्टर एम. डब्ल्यू. ल्यूइस के शब्द

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योगानन्दजी तथा डॉक्टर एम. डब्ल्यू. ल्यूइस की प्रथम भेंट

‘डॉ. मिनॉट डब्ल्यू. ल्यूइस, बॉस्टन के एक दंत चिकित्सक, 1920 में गुरुजी के अमेरिका आने के थोड़े समय बाद परमहंसजी से मिले और जीवन भर के लिए उनके शिष्य बन गए। जिन वर्षों के दौरान वे सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के उपाध्यक्ष एवं लोकप्रिय मिनिस्टर रहे, वे अक्सर अपने श्रोताओं को परमहंसजी के बारे में प्रेरणाप्रद कहानियां सुनाया करते थे। उन में से सर्वाधिक प्रेरक थी उनकी परमहंस जी के साथ पहली मुलाकात। नीचे का विवरण डॉक्टर द्वारा कई वर्षों के दौरान दिये प्रवचनों से संकलित है।’

1920 के अंत में, जब परमहंस योगानन्दजी को अमेरिका आये ज़्यादा समय नहीं हुआ था, इस युवा स्वामी को बॉस्टन के एक युनिटैरियन चर्च में व्याख्यान के लिये आमंत्रित किया गया था। श्रीमती ऐलिस हैसी, जो डॉ. ल्यूइस की पुरानी मित्र थीं, इस चर्च की एक सदस्या थीं। श्रीमती हैसी (जिन्हें परमहंसजी ने बाद में सिस्टर योगमाता नाम दिया) डॉ. ल्यूइस की अध्यात्म में रुचि को जानती थीं और उन्होंने अति आग्रहपूर्वक डॉ. ल्यूइस को यह सुझाव दिया, “आपको स्वामी योगानन्दजी से अवश्य मिलना चाहिए।”

यूनिटि हाऊस में, जहाँ गुरुजी का कमरा था, क्रिसमस की पूर्व संध्या का समय निर्धारित किया गया। नियुक्त समय पर उपस्थित रहने के लिये जब डॉक्टर घर से निकले तो उन्होंने समझा था कि वे थोड़े समय में ही लौट आयेंगे। उन्होंने अपनी पत्नी, मिल्ड्रड, से कहा कि क्रिसमस वृक्ष को सजाने के लिये वे जल्दी ही लौट आयेंगे।

यूनिटि हाऊस जाते समय, रास्ते में, डॉक्टर को अपने माता-पिता द्वारा किसी पाखंडी, जो धर्मगुरु होने का दावा करता है, द्वारा फंसाए जाने या गुमराह किए जाने की दी गयी चेतावनियों का स्मरण हो आया; उनकी मनःस्थिति संशयी थी।

परमहंसजी डॉक्टर ल्यूइस से बड़ी सहृदयता से मिले। इस युवा दंत चिकित्सक के मन में अनेक आध्यात्मिक प्रश्न थे, और परमहंसजी ने उसे उनके संतोषजनक उत्तर दिए। अनेक वर्षों के बाद डॉक्टर ने इस प्रसंग के बारे में कहा, “मैं ‘मिसौरी राज्य’ का था और मैं देखने में विश्वास करता था। इससे भी बदतर यह था कि मैं न्यू इंगलैंड का था, और मैं जानने में विश्वास करता था!”

1920 की उस क्रिसमस पूर्व-संध्या को उन्होंने परमहंसजी से कहा : “बाइबल हमें बताती है : ‘इस देह का प्रकाश चक्षु है : इसलिए अगर तुम्हारी चक्षु एक हो जाय, तो तुम्हारा देह प्रकाश से भर जायेगा।’ क्या आप इसे समझा सकते हैं?”

गुरुजी ने जवाब दिया, “मेरे विचार से मैं समझा सकता हूँ।”

डॉक्टर को अभी संदेह था। उन्होंने कहा “मैंने बहुतों को पूछा है परन्तु कोई भी इसका अर्थ समझा हुआ प्रतीत नहीं होता।”

“क्या अंधा अंधे को राह दिखा सकता है?” परमहंसजी ने प्रतिप्रश्न किया।”दोनों ही उसी गलती के गढ़े में जा गिरेंगे।”

“क्या आप मुझे यह वास्तविकताएँ दिखा सकते हैं?”

परमहंसजी ने पुनः कहा, “मेरे विचार में मैं ऐसा कर सकता हूँ।”

“तो फिर भगवान के लिये कृपया मुझे दिखाइये।”

एक बाघ की खाल को फर्श पर बिछाकर, गुरुजी ने डॉक्टर से उस पर पालथी मारकर बैठने के लिए कहा, और उसके सामने बैठ गए। डॉक्टर की आँखों में सीधा दृष्टिपात करते हुए परमहंसजी ने प्रश्न किया : “मैं तुमसे जैसा प्रेम करता हूँ, क्या तुम सदैव मुझसे वैसा ही प्रेम करोगे?”

डॉक्टर ने स्वीकारात्मक जवाब दिया। तब गुरुजी ने कहा, “तुम्हारे पाप क्षमा कर दिये गए हैं और मैं तुम्हारे जीवन का दायित्व लेता हूँ।”

“इन शब्दों के साथ,” डॉक्टर ने बाद में याद किया, “मैंने महसूस किया कि मेरे कंधों से एक अत्यधिक भारी बोझ उठा लिया गया है। यह सच है। मैंने बहुत राहत महसूस की — मानो मैं कर्म और माया के पहाड़ों से मुक्त हो गया हूँ। एक बहुत भारी वज़न उठ गया, और वह वज़न तब से हट ही गया है। कई परीक्षाएँ आयीं हैं — अनेक — पर वह भार फिर कभी नहीं आया।”

कहानी आगे बताते हुए, डॉ. ल्यूइस ने कहा :

“इसके बाद गुरुजी ने अपने माथे को मेरे माथे के साथ लगाया और उन्होंने मुझे कहा कि मैं अपनी दृष्टि को ऊपर उठाऊँ और भ्रूमध्य में देखूं, जो मैंने किया। और वहाँ मैंने आध्यात्मिक नेत्र के दिव्य प्रकाश को देखा। गुरुजी ने यह नहीं कहा कि मैं कुछ देखूं। उन्होंने किसी भी तरह के सुझाव द्वारा मुझे प्रभावित नहीं किया। जो मैंने देखा वह एक स्वाभाविक तरीके से आया।

“मैं पूरी तरह से होश में था, पूरी तरह से जागरूक, पूरी तरह से सतर्क। और मैं दिव्य नेत्र को देख पाया क्योंकि गुरुजी ने मेरे मन की लहरों को शांत कर मेरी आत्मा के अंतर्ज्ञान को मुझे यह दिखाने दिया। जब मैंने वह दिव्य स्वर्णिम प्रकाश देखा, तो पूरे आध्यात्मिक नेत्र के भीतर पहले गहरे-नीले रंग का केन्द्र बना, जो मेरे भीतर के क्राइस्ट चैतन्य का प्रतीक है, तथा अंत में उसके बीच में वह छोटा रुपहला चमकता सितारा दिखा, जो ब्रह्म-चैतन्य का प्रतीक है। [शब्दावली में “आध्यात्मिक नेत्र” देखें ]

“वाक़ई मैं यह सोच कर अभिभूत था कि मुझे कोई ऐसा मिल गया जो मुझे वह आंतरिक वास्तविकता दिखा सकता था जो हममें से हर एक के भीतर है। मुझे एहसास हुआ कि वे एक साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि उन साधारण व्यक्तियों से बहुत ही अलग थे जो ऐसे आध्यात्मिक तथ्यों के बारे में जानने का दावा करते हैं।

“हमने कुछ मिनट के लिये बात की, और तब एक बार फिर उन्होंने मेरे माथे को अपने माथे से दबाया; और तब मैंने सहस्रदल [उच्चतम आध्यात्मिक चक्र जो मस्तिष्क के ऊपरी भाग में स्थित रहता है] के महान् प्रकाश को देखा। यह देखी जा सकने वाली सारी वस्तुओं में सबसे शानदार है और इसकी रुपहली पत्तियों जैसी कई, कई किरणें थीं। मैं सहस्रदल के नीचे घने प्रकाश में रेखांकित, मस्तिष्क के आधार पर बड़ी धमनियों की दीवारों को देख सकता था। और जैसे मैं निहार रहा था, धमनियों के भीतर प्रकाश के छोटे स्फुलिंग ऊपर-नीचे नाचते हुये, धमनियों की दीवारों से टकराते हुए, मेरी दृष्टि के सामने से निकल जाते। ये रक्त कणिकायें थीं। प्रत्येक कणिका अपना सूक्ष्म प्रकाश स्वरूप प्रकट कर रही थी और ईश्वर के प्रकाश के नाटक में अपनी भूमिका निभा रही थी।

“परमहंसजी ने मुझे ईश्वर के दिव्य प्रकाश का दर्शन कराया और कहाः ‘यदि तुम इस पथ पर दृढ़ता से बने रहकर नियमित रूप से ध्यान करोगे, तो यह दिव्य-दर्शन सदा तुम्हारे साथ रहेगा।’ और इसलिये मैंने उनके परामर्श का पालन किया। मैंने अपने क्रियायोग के अभ्यास को कभी नहीं छोड़ा, और मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि गुरुजी ने सत्य कहा था।”

उन्होंने और कहा “मैं चाहता हूँ कि तुम यह वचन दो कि तुम कभी भी मुझे टालोगे नहीं।”

डाक्टर ने वचन दिया। गुरु और शिष्य के बीच होने वाले इस समझौते के बारे में डॉक्टर बाद में कहते थे, “बहुत बार यह बहुत मुश्किल होता था, कारण गुरु का अनुशासन सुगम नहीं होता; परन्तु वह तुम्हारे उच्चतम कल्याण के लिये, तुम्हें प्रकाश के स्रोत की ओर ले जाने वाला होता है।”

डॉक्टर ल्यूइस को यह बतलाने के बाद, कि आध्यात्मिक नेत्र का प्रकाश किस प्रकार देखना चाहिये और उन्हें अन्य आध्यात्मिक सूचनाएँ देने के पश्चात्, परमहंसजी ने उनसे पूछा कि उनके विचार में क्या दूसरे अमेरीकी इन शिक्षाओं में रुचि लेंगे।

डॉक्टर ने जवाब दिया, “हाँ, निश्चय ही।”

गुरुजी ने कहा, “तो फिर, जब मेरे द्वारा सिखायी गई ध्यान की इन प्रविधियों का तुम अभ्यास करोगे, और तुम्हें ये लाभदायक लगें, तो क्या तुम इनके बारे में जानकारी प्राप्त करने में दूसरों की सहायता करोगे?”

डॉक्टर बोले, “मैं निश्चय ही ऐसा करुंगा।”

परमहंसजी के साथ मिलने के बाद जब डॉक्टर 1920 की क्रिसमस की रात्रि में घर वापिस लौटे तो रात्रि के दो बजे थे। स्वाभाविक ही श्रीमती ल्यूइस उनकी इस लम्बी अनुपस्थिति से कुपित हो गई थी; परन्तु जब उन्होंने उनका चेहरा देखा तो वे समझ गई कि परमहंसजी से हुई उनके पति की मुलाकात एक परिवर्तनकारी अनुभव था।

इस दिव्य जागृति के बारे में बोलते हुए बाद में डॉक्टर बहुधा कहते थे, “वह मेरी पहली सच्ची क्रिसमस थी!”

अपने गुरु के साथ हुए उस प्रारम्भिक मिलन की उन पर पड़ी छाप का वर्णन करते हुए बाद में उन्होंने लिखा : “जब हम उस व्याघ्रचर्म के कालीन पर ईश्वर की उपस्थिति का आनन्द अनुभव करते हुए साथ साथ बैठे थे, और मैंने उनके मुख का भाव देखा, तो मुझे किसी प्रकार की श्रेष्ठ योग्यता की चेतना का दिखावा वहां नहीं दिखाई दिया। उनका ऐसा भाव प्रकट करना उचित भी होता; कारण कि इतनी गहरी शान्ति और सिद्धि द्वारा दूसरे व्यक्ति को दिव्य चेतना की अनुभूति करने में सहायता प्रदान करने की योग्यता होना, यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। परन्तु उसके बदले वहाँ पर एक विनम्रता, प्रेम और परम संतोष का भाव प्रदर्शित हो रहा था, कि उनकी ही तरह, ईश्वर की एक और संतान, प्रभु — हमारे सर्वजनीन पिता — के सामीप्य और परमानन्द का रस लेने के योग्य हो गई। इस प्रकार का विनय मेरे लिये सदैव गहरी प्रेरणा रहा है और रहेगा। मेरे विचार में यह सच्ची महानता की विशेषता है।

इस घटना के कई साल बाद, एन्सिनिटास में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन आश्रम केंद्र के समर्पण पर, डॉक्टर ने कहा :

“इसीलिए, दोस्तों, मुझे सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप में रूचि रही है, और इसीलिए मैंने सहायता करने की चेष्टा की है; क्योंकि मैं जानता था कि परमहंस योगानन्दजी द्वारा कुछ भला, कुछ बहुत भला, होगा। अमेरिका ने मुझे बहुत कुछ दिया है, और मैं इसके लिए आभारी हूं; लेकिन एक वस्तु है जो अमेरिका ने मुझे नहीं दी, और वह है भारत से प्राप्त आध्यात्मिक बोध और समझ; जो परमहंस योगानन्दजी के द्वारा मुझे प्राप्त हुआ।”

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