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कीर्तन की दिव्य कला

चैंटिंग: एक योग विद्या

जब 1920 में परमहंस योगानन्दजी अमेरिका पहुंचे तो भारत की सार्वभौमिक भक्तिमय चैंटिंग को अपने साथ पश्चिम ले गए और हज़ारों को सामूहिक भक्तिमय चैंटिंग के अनुभव से अवगत कराया।

हमें आशा है कि आप इस पृष्ठ का उपयोग, अपने ध्यान अभ्यास में भक्तिमय चैंटिंग को शामिल करने हेतु एक सहायक के रूप में करेंगे। जब भी आप व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से चैंटिंग करें तो याद रखें, योगी कथामृत में परमहंस योगानन्दजी ने चैंटिंग को “योग अथवा आध्यात्मिक अनुशासन की एक प्रभावी विद्या” बताया है।

मात्र भावुकता बढ़ाने की बजाय एकाग्रता तथा सच्चे समर्पण से आप इस विद्या को अपने पर लागू कर सकते हैं – वह, जो परमहंसजी के वचनानुसार, अद्भुत फल प्रदान करती है । “जब भी प्रार्थना या चैंटिंग करें, शब्दों के बारे में न सोच कर उनके अर्थ के विषय में सोचें और उनमें निहित विचार को गहनता से मन ही मन ईश्वर को अर्पित करें,” योगदा सत्संग पाठमाला में बताते हुए वे कहते हैं’ “और आपकी प्रार्थना साहूल की तरह सीधे ईश्वरीय चेतना के सागर की गहराई में उतर जाएगी।”

दिव्य अनुभूति का द्वार

जैसा कि परमहंसजी ने ऊपर कहा है, चैंट के शब्दों के भावार्थ के साथ गहराई से जुड़ना जरूरी होता है। यह करने के लिए हम आपको वाईएसएस/ एसआरएफ़ अघ्यक्ष श्री श्री स्वामी चिदानन्द गिरि द्वारा निर्देशित ध्यान-सत्र में भाग लेने के लिए आमंत्रित करते हैं, जो परमहंस योगानन्दजी के चैंट “शान्ति मन्दिर में” जनित शान्ति व आनंद के मानस-दर्शन् और दर्शन के अनुभव पर केंद्रित है। दर्शन वह कृपा है जो एक सच्चे गुरु या संत के सानिध्य में मिलती है, इस संदर्भ में स्वयं परमहंसजी के सानिध्य में।

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उक्त निर्देशित ध्यान स्वामी चिदानन्दजी द्वारा गुरुजी के सभी कॉस्मिक चैंट्स के यशगान से आरंभ होता है, जिसमें वह बताते हैं कि इनमें से प्रत्येक चैन्ट “एक वह द्वार है जिसके द्वारा हम उस अनुभूति को आत्मसात करते हैं” जो योगानन्दजी ने ईश्वर के लिए उस विशेष चैन्ट को रचते हुए स्वयं अनुभव की थी।

स्वामी चिदानन्दजी यह भी बताते हैं कि गुरु प्रदत्त साधना के अभ्यास (आध्यात्मिक अनुशासन), वाईएसएस/ एसआरएफ़ प्रविधियों के प्रयोग से – हंसः प्रविधि, ओम प्रविधि, तथा क्रियायोग – और भक्ति के द्वारा साधक अनंत परमप्रिय के साथ आंतरिक संवाद में प्रवेश करता है। यह प्रविधियां वाईएसएस पाठमाला में सिखाई जाती हैं।

परमहंस योगानन्द कृत “शान्ति मन्दिर में”

शान्ति मन्दिर में, शान्ति कुटीर में,
तुझे मिलूँगा, तुझे छूऊँगा,
प्रेम करूँगा,
तुझे लाऊँगा शान्ति मन्दिर में।

समाधि मन्दिर में, समाधि कुटीर में,
तुझे मिलूँगा, तुझे छूऊँगा,
प्रेम करूँगा,
तुझे लाऊँगा हृदय मन्दिर में।

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