योग की सार्वजनिकता

परमहंस योगानन्दजी की पुस्तक ‘मानव की निरन्तर’ खोज
में से ‘योग की सार्वजनिकता’ से लिए कुछ अंश

सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप, हॉलीवुड, कैलिफ़ोर्निया, में 21 मई, 1944 को दिया गया प्रवचन। यह व कई अन्य प्रवचन वाईएसएस द्वारा प्रकाशित परमहंसजी के संकलित प्रवचन एवं आलेख के तीनों भागों में देखे जा सकते हैं

योग का उद्देश्य

योग आत्मा का परमात्मा के साथ पुनर्मिलन करने के लिए वैज्ञानिक विधियों की एक प्रणाली है। हम परमात्मा से यहाँ आए हैं, और हमें उनके पास पुनः जाना है। हमें लगता है कि हम अपने परमपिता से पृथक हो गए हैं, और हमें चेतन रूप से उनके साथ पुनः एक होना है। योग हमें इस वियोग के भ्रम से ऊपर उठने और ईश्वर के साथ अपने एकत्व को अनुभव करने की विधि सिखाता है। कवि मिल्टन ने इस विषय पर लिखा था कि कैसे मनुष्य की आत्मा पुनः अपने आनन्दधाम को प्राप्त कर सकती है। यही योग का उद्देश्य और लक्ष्य है — आत्मा की चेतना के खोये हुए आनन्दधाम को पुनः प्राप्त करना जिसके द्वारा मनुष्य जानता है कि वह परमात्मा के साथ एक है, और सदा एक ही रहा है।

योग सच्चे धर्म का विज्ञान है

विश्व के विभिन्न धर्म न्यूनाधिक रूप से मनुष्य के विश्वासों पर टिके हैं। परन्तु धर्म का सच्चा आधार विज्ञान होना चाहिए, ताकि सभी भक्तजन हमारे एकमात्र परमपिता-ईश्वर तक पहुँचने के लिए उसे प्रयोग कर सकें। योग ही वह विज्ञान है। इस धर्म के विज्ञान का अभ्यास अत्यावश्यक है। विभिन्न हठधर्मी मतों पर आधारित धर्मों ने मानव-जाति को विभाजित करके रखा है, यद्यपि जीसस ने संकेत किया था : “यदि किसी के घर में फूट पड़ जाए, तो वह घर बस नहीं सकता” (मरकुस 3:25)। विभिन्न धर्मों में एकता तभी हो सकती है जब अनेक धर्मों का पालन करने वाले लोग अपने अन्तर्वासी ईश्वर से वास्तव में अवगत हो जाएँ। तब ईश्वर के पितृत्व कि छत्रछाया तले हमारे पास मनुष्य का सच्चा भाईचारा होगा।

संसार के सभी महान धर्म ईश्वर को पाने की, तथा मनुष्यों में आपसी भाईचारे की आवश्यकता का उपदेश देते हैं और सभी की एक नैतिक संहिता है, जैसे कि ईसाई धर्म के दस धर्मादेश। तो फिर, पारस्परिक मतभेद कौन पैदा करता है? यह व्यक्तियों के मन का कट्टरपन है। हम धर्म के अंधविश्वासों पर एकाग्रचित होकर नहीं बल्कि वास्तविक आत्म-ज्ञान के द्वारा ईश्वर तक पहुँच सकते हैं। जब व्यक्तियों को विभिन्न धर्मों के मूल में स्थित सार्वजनीन सत्यों का बोध हो जाता है, तब धर्मसिद्धाँतों की अधिक कठिनाइयाँ नहीं होंगी। मेरे लिए कोई यहूदी नहीं है, न कोई ईसाई है, और न ही कोई हिन्दू है; सब मेरे भाई हैं। मैं सभी मंदिरों में पूजा करता हूँ, क्योंकि उनमें से प्रत्येक मेरे परम पिता के सम्मान में बनाया गया है।

हमें योगदा सत्संग सोसाइटी (सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप) के द्वारा आरम्भ किये गए इस विचार से विश्व मैत्री को आरम्भ करना चाहिए : एक “सभी धर्मों का मंदिर”, जहाँ विभिन्न मतों को अपनाना नहीं, अपितु सभी धर्मों के प्रति आदर भाव रखना क्योंकि ये सब ईश्वर तक पहुँचने के विविध मार्ग हैं। ऐसे मंदिर जो एक ही ईश्वर को समर्पित हों, जिनकी सभी धर्मों के लोग पूजा-आराधना करते हों, सब जगह बनाए जाने चाहिए। मैं भविष्यवाणी करता हूँ कि ऐसा अवश्य होगा। पूर्व एवं पश्चिम वासियों को ईश्वर के घरों में संकीर्ण विभाजनों को सदा के लिए समाप्त कर देना चाहिए। योग के द्वारा आत्मानुभूति प्राप्त करते ही सब व्यक्ति यह जान जायेंगे की वे सब एक ही परमपिता की संतान हैं।

एक अँधा दूसरे अंधे का मार्गदर्शन नहीं कर सकता

परमात्मा का वह एकत्व उन महान पुरुषों में व्यक्त होता है जिन्होंने आत्मानुभूति प्राप्त कर ली है। एक अंधा दूसरे अंधे को रास्ता नहीं दिखा सकता; केवल एक गुरु (सिद्ध पुरुष), जो ईश्वर को जानता है, दूसरों को सही ढंग से ईश्वर के प्रति शिक्षा दे सकता है। व्यक्ति को अपनी दिव्यता को पुनः पाने के लिए एक ऐसा ही सद्‌गुरू चाहिए। जो निष्ठापूर्वक सद्‌गुरू का अनुसरण करता है वह उसके समान हो जाता है, क्योंकि गुरु अपने शिष्य का उत्थान अपनी अनुभूति के स्तर तक करने में सहायता करता है। जब मैंने अपने गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी को पाया तो मैंने अपने गुरु के उदाहरण का अनुसरण करने का दृढ़-संकल्प कर लिया : अपनी हृदय की वेदी पर केवल ईश्वर को विराजमान करना और उन्हें दूसरों के साथ बाँटना।

हिन्दू गुरुजन शिक्षा देते हैं कि गहन ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपनी दृष्टि सर्वज्ञ दिव्य नेत्र पर एकाग्र करनी चाहिए। गहनता से मन एकाग्र करते समय योगाभ्यास न करने वाला भी अपने ललाट के भ्रूमध्य बिंदु को सिकोड़ता है और वही गोलाकार दिव्य नेत्र का केंद्र (कूटस्थ) तथा आत्मा के अंतर्ज्ञान का केंद्र भी है। वही वास्तविक ‘क्रिस्टल बॉल’ है, जिसमें ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने के लिए योगी अपनी दृष्टि को एकाग्र करता है। जो अपनी एकाग्रता में पर्याप्त गहराई तक जाते हैं, वे उस ‘तीसरे’ नेत्र को भेद कर ईश्वर के दर्शन करेंगे। इसलिए सत्यान्वेषियों को आध्यात्मिक नेत्र में से अपनी चित्तशक्ति को प्रक्षेपित करने के लिए अपनी योग्यता को विकसित करना चाहिए। योग का अभ्यास अंतर्ज्ञान के दिव्य नेत्र को खोलने में जिज्ञासुओं की सहायता करता है।

अंतर्ज्ञान अर्थात ऐसा ज्ञान जो अंतरात्मा से सीधा प्राप्त होता है, इन्द्रियों से प्राप्त किसी प्रकार की जानकारी पर निर्भर नहीं करता। इसलिए अन्तर्ज्ञान को प्रायः ‘छठी इन्द्रिय’ कहा जाता है। यह ‘छठी इन्द्रिय’ प्रत्येक व्यक्ति में होती है, परन्तु अधिकतर लोग इसे विकसित नहीं करते। फिर भी, लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने कुछ अन्तर्ज्ञानात्मक अनुभव किया होता है, शायद एक ‘आभास’ कि कोई विशिष्ट घटना घटने वाली है, जबकि कोई भी इन्द्रिय प्रमाण इसका संकेत नहीं देता।

अंतर्ज्ञान अर्थात प्रत्यक्ष आत्म-ज्ञान को विकसित करना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जो ईश-चेतना में है उसे आत्म-विश्वास होता है। वह जानता है, और वह जानता है कि वह जानता है। हमें ईश्वर की विद्यमानता के प्रति उतना आश्वस्त होना चाहिए, जितना यह आश्वस्त हैं की हम संतरे के स्वाद को जानते हैं। जब मैंने अपने गुरु से मिलने के बाद ईश्वर के साथ वार्तालाप करना सीख लिया और प्रभु की उपस्थिति को प्रतिदिन अनुभव करने लगा, केवल तभी मैंने दूसरों को ईश्वर के विषय में बताने के अपने आध्यात्मिक कर्त्तव्य को अपनाया।

पश्चिम में बड़े पूजा-घरों पर बल दिया गया है, परन्तु उन में से ऐसे कम ही हैं जहाँ उपासकों को बताया जाता है कि ईश्वर को किस प्रकार प्राप्त किया जाए। पूर्व में ईश्वर-प्राप्त व्यक्तियों को विकसित करने पर बल दिया जाता रहा है, परन्तु बहुत बार वे आध्यात्मिक जिज्ञासुओं की पहुँच के बाहर होते हैं, और दूर और एकांतवास में अकेले रहते हैं। ऐसे आध्यात्मिक केन्द्र जिनमें लोग ईश्वर के साथ संपर्क स्थापित कर सकते हैं, और वे गुरु जो लोगों को ऐसा करने का मार्ग बता सकते हैं, दोनों की ही आवश्यकता है। कोई उस गुरु से किस प्रकार ईश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकता है जो स्वयं ईश्वर को नहीं जानता? मेरे गुरु ने दूसरों को परमपिता के विषय में बताने से पहले उसे जानने की आवश्यकता के महत्व को बताया। मैं उनका प्रशिक्षण प्राप्त करके कितना कृतज्ञ हुआ हूँ! वे वास्तव में स्वयं भी ईश्वर के साथ संलाप किया करते थे।

ईश्वर का बोध सर्वप्रथम व्यक्ति को अपने देह-मंदिर में करना चाहिए। प्रत्येक साधक को प्रतिदिन अपने विचारों को अनुशासित करना चाहिए और अपनी भक्ति के वनफूलों को अपनी आत्मा की वेदी पर समर्पित करना चाहिए। जो ईश्वर को अपने अंतर में पा लेगा, वह जिस भी मंदिर अथवा चर्च में प्रवेश करेगा वहीं प्रभु की उपस्थिति को अनुभव कर पायेगा।

योग धर्म-दर्शन को व्यावहारिक अनुभव में बदल देता है

योग मनुष्य को सभी धर्मों में सत्य का बोध करने के योग्य बना देता है। प्रत्येक धर्म में दस धर्मादेशों का उपदेश विभिन्न शब्दों में दिया जाता है। परन्तु दो महानतम धर्मादेश हैं जिन पर जीसस ने ज़ोर दिया; “प्रभु को, अपने परमपिता को, अपने सम्पूर्ण हृदय से, अपनी सम्पूर्ण आत्मा से, और अपने सम्पूर्ण मन से प्रेम करो।” और “तुम्हें अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करना चाहिए” (मैथ्यू 22:37, 39)।

ईश्वर को ‘अपने सम्पूर्ण मन से’ प्रेम करने का अर्थ है अपने ध्यान (मन) को इन्द्रियों से हटाकर ईश्वर पर लगाना, और ध्यान में अपनी सम्पूर्ण एकाग्रता को प्रभु पर केन्द्रित करना। ईश्वर के प्रत्येक जिज्ञासु को अपने मन को एकाग्र करना सीखना ही चाहिए। यदि किसी प्रार्थना को बोलते समय व्यक्ति अपने मन की पृष्ठभूमि में किसी अन्य वस्तु का विचार कर रहा होता है, तो वह प्रार्थना सच्ची नहीं है और ईश्वर उसे अनसुना कर देते हैं। योग सिखाता है कि परमपिता को पाने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है की उन्हें पूरे मन के साथ, अपनी एकलक्षित एकाग्रता के साथ खोजें।

योग सबके लिए है

कुछ लोग कहते हैं कि योग का अभ्यास करने में हिन्दू ज़्यादा अभ्यस्त होते हैं, तथा योग पाश्चात्य लोगों के अनुकूल नहीं है। यह सत्य नहीं है। इस समय भी कई पाश्चातय लोग योग का अभ्यास करने के लिए हिन्दुओं की अपेक्षा अधिक अच्छी स्थिति में हैं, क्योंकि वैज्ञानिक उन्नति के कारण पाश्चात्य लोगों के पास अधिक खाली समय है। भारत के लोगों को दिन-प्रतिदिन अपना जीवन आसान और निर्बाध बनाने के लिए, अधिक-से-अधिक पश्चिम के उन्नतिशील भौतिक साधनों को उपयोग में लाना चाहिए, और पश्चिम के लोगों को भारत से योग की व्यवहारिक आध्यात्मिक विधियों को लेना चाहिए ताकि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की ओर जाने वाले मार्ग को अपना सके। योग कोई धर्म सम्प्रदाय नहीं है, बल्कि एक सार्वभौमिक रूप से उपयोगी विज्ञान है जिसके द्वारा हम अपने परमपिता को पा सकते हैं।

योग प्रत्येक व्यक्ति के लिए है, चाहे वह पश्चिम का हो या पूर्व का। कोई यह नहीं कह सकता की टेलीफोन पूर्व के लोगों के लिए नहीं है क्योंकि इसका आविष्कार पश्चिम में हुआ है। इसी प्रकार, योग की प्रविधियाँ, यद्यपि पूर्व में विकसित हुई हैं, तथापि वे केवल पूर्व के लिए नहीं हैं, बल्कि समस्त मानव-जाति लिए उपयोगी हैं।

कोई व्यक्ति चाहे भारत में पैदा हुआ हो या अमेरिका में, एक दिन उसे मरना ही है। तब संत पॉल की भाँति, ईश्वर के ध्यान में ‘प्रतिदिन मरना’ क्यों न सीखें? (आई कोरिंथियंस 15:31) योग इसकी विधि सिखाता है। मनुष्य अपने भौतिक शरीर में एक कैदी की भाँति रहता है; जब उसकी अवधि पूरी हो जाती है, वह बाहर निकाल दिए जाने के अपमान को भोगता है। इसलिए देह का मोह, कारागार के मोह से अधिक और कुछ नहीं है। लम्बे समय से शरीर में रहने के कारण, हम भूल गए हैं कि सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ क्या है। पाश्चात्य होना स्वतंत्रता को न खोजने का कोई बहाना नहीं है। प्रत्येक मनुष्य के लिए यह अति आवश्यक है कि वह अपनी आत्मा को खोजे और अपनी अमर प्रकृति को जाने। योग इसका रास्ता दिखाता है।

आत्मा को परमात्मा तक पुनः आरोहण करना चाहिए

सृष्टि के अस्तित्व से पूर्व ब्रह्माण्डीय चेतना थी; अर्थात वह ब्रह्म या परमात्मा या परब्रह्म, यह नित्य-विद्यमान, नित्य-चेतन, नित्य-नवीन-आनन्द तथा अजन्मा जो निराकार है। जब सृष्टि की रचना हुई, तो ब्रह्माण्डीय चेतना भौतिक जगत में ‘अवतरित’ हुई जहाँ यह क्राइस्ट चेतना के रूप में प्रकट हुई, जो ईश्वर की प्रज्ञा चेतना की सर्वव्यापक विशुद्ध प्रतिछाया है और जो समस्त सृष्टि में गुप्त अवस्था में अन्तर्निहित रहती है। जब कूटस्थ चेतना मनुष्य के भौतिक शरीर में अवतरित होती है तो यह आत्मा अथवा अधिचेतना बन जाती है, जो कि परमात्मा-स्वरुप सत्‌-चित्त-आनन्द है परन्तु शरीर के आवरण द्वारा सीमित हो गया है। जब आत्मा अपने आपको शरीर समझने लगती है, तो यह अहम् के रूप में नश्वर-चेतना के रूप होती है। योग सिखाता है कि आत्मा को परमात्मा तक पहुँचने के लिए वापस चेतना की सीढ़ियाँ अवश्य चढ़नी होंगी।

नोट : योग सिखाता है कि आत्मा का — मनुष्य के जीवन और ईश-चेतना का — वास मस्तिष्क में सूक्ष्म आध्यात्मिक केन्द्रों : सहस्रार, प्रमस्तिष्क के ऊपर सहस्र-दल-कमल, ब्रह्माण्डीय चेतना; कूटस्थ, भ्रूमध्य में, क्राइस्ट चेतना का आसन; और मज्जक केंद्र मेरूशीर्ष (ध्रुवता के द्वारा कूटस्थ से जुड़ा हुआ), अधिचेतना का आसन, में है। उच्चतम आध्यात्मिक बोध के इन केन्द्रों से शरीर (और शरीर चेतना) में अवतरित होकर, प्राणशक्ति जीवन और चेतना मेरुदण्ड में नीचे की ओर प्रवाहित होते हुए, पाँच मेरूदण्डीय केन्द्रों से गुजरती है और जीवन के भौतिक अंगों, ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों की शाखाओं में बाहर की ओर बहती है।

ईश्वर के साथ अपने एकत्व की आनन्ददायक अनुभूति को पुनः प्राप्त करने के लिए, मनुष्य की आत्मा को अपने अधोमुखी प्रवाह से लौटना चाहिए, ईश बोध के उच्चतम मस्तिष्कीय केन्द्रों में अपने निवास के पवित्र मेरूदण्डीय मार्ग से ऊर्ध्वमुखी होते हुए। यह गुरु-प्रदत्त योग-ध्यान की वैज्ञानिक प्रविधियों के अभ्यास द्वारा पूरा किया जा सकता है, और इसे योगदा सत्संग पाठमाला से सीखा जा सकता है।

ईश्वरीय विद्यमानता की चेतना सुख का रहस्य है

जीवन का आनन्द लेना तो ठीक है, परन्तु सुख का रहस्य किसी वस्तु में आसक्त न होने में है। पुष्प की सुगन्ध का आनंद लें, परन्तु उसमें ईश्वर को देखें। मैंने अपनी इन्द्रिय-चेतना को केवल इसलिए रखा है कि उनके उपयोग में मैं हर समय ईश्वर का दर्शन और चिन्तन कर सकूँ। “मेरी आँखें हर जगह आपकी सुंदरता को देखने के लिए बनी हैं। मेरे कान आपकी सर्वव्यापी वाणी को सुनने के लिए बने हैं।” यही योग है, ईश्वर के साथ एकत्व। उन्हें ढूँढने के लिए जंगल में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। हम जहाँ कहीं भी होंगे सांसारिक आदतें हमें मज़बूती से जकड़े रखेंगी जब तक कि हम अपने को उनसे मुक्त न कर लें। योगी ईश्वर को अपने ह्रदय की गुफ़ा में खोजना सीखता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, ईश्वर के सान्निध्य की आनन्ददायक चेतना को अपने साथ रखता है।

मनुष्य केवल नश्वर इन्द्रिय चेतना में गिरा ही नहीं है बल्कि उस इन्द्रिय चेतना की विकृतियों से बंध भी गया है, जैसे लोभ, क्रोध और ईर्ष्या। ईश्वर को पाने के लिए व्यक्ति को इन विकारों को समाप्त करना ही चाहिए। पूर्वी और पश्चिमी दोनों जगत के लोगों को इन्द्रियों की दासता से मुक्त होना चाहिए। एक साधारण मनुष्य इस बात से क्रोधित हो सकता है कि उसे सुबह की कॉफ़ी नहीं मिली और वह अच्छी तरह से जानता है कि इसके न मिलने से उसे सिर दर्द हो जाएगा। वह अपनी आदतों का दास है। उन्नत योगी स्वतन्त्र होता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी वर्तमान स्थिति कैसी भी क्यों न हो, योगी बन सकता है। परन्तु अपने जीवन के परे किसी भी विषय पर कुछ भी सोचना विचित्र और कठिन लगता है। हम इस बात पर विचार ही नहीं करते कि हमारी आदतें दूसरों को कैसी लगती होंगी।

योग का अभ्यास मुक्ति की ओर ले जाता है। कुछ योगी अनासक्ति के इस विचार को चरमसीमा तक ले जाते हैं। वे शिक्षा देते हैं कि व्यक्ति को बिना किसी कष्ट के कीलों की शैय्या पर सोने, या अन्य प्रकार की तपस्या एवं शारीरिक अनुशासन को अपनाने में सक्षम होना चाहिए। यह सत्य है कि जो व्यक्ति कीलों की शैय्या पर बैठ कर ईश्वर का चिन्तन कर सकता है वह महान मनोबल सिद्ध करता है। परन्तु ऐसे असाधारण करतब करने की आवश्यकता नहीं है। व्यक्ति एक आरामदायक कुर्सी या आसान पर भी बैठ सकता है और ईश्वर का ध्यान कर सकता है।

ऋषि पतंजलि सिखाते हैं कि कोई भी आसन जो मेरुदण्ड को सीधा रखे वह ध्यान के लिए, ईश्वर पर यौगिक एकाग्रता के लिए, अच्छा है। हठयोग में बताए गए उन व्यायामों की आवश्यकता नहीं है, जिनमें शरीर को तोड़ा-मरोड़ा जाए या जिसमें असाधारण सहनशीलता और लचीलेपन की आवश्यकता हो। ईश्वर लक्ष्य है; और उनकी उपस्थिति की चेतना के लिए ही हमें परिश्रम करना है। भगवद्गगीता में कहा गया है : “जो भक्त स्वयं अपनी आत्मा को मुझसे एकाकार करके, मुझ में लीन करता है, वह मुझे योगियों की सभी श्रेणियों में से अत्यधिक परम-संतुलित योगी के रूप में मान्य है। (भगवद्गीता 6:47)

हिन्दू योगी, अत्यधिक गर्मी और सर्दी और कष्टकर कीड़ों एवं मच्छरों की उपेक्षा करने के प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। योगी बनने के लिए ऐसा प्रदर्शन आवश्यक नहीं है, बल्कि यह तो निपुण योगी की एक स्वाभाविक उपलब्धि है। विघ्न देने वाले तत्त्वों को हटाने का प्रयास करें; या अगर आवश्यकता हो तो आतंरिक रूप से परेशान हुए बिना उन्हें झेलने का प्रयास करें। यदि कोई स्वच्छ रह सकता है, तो उसका अस्वच्छ रहना निरर्थक है। कोई व्यक्ति एक झोपड़ी के प्रति भी उतना ही आसक्त हो सकता है जितना एक महल के प्रति।

आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने में सबसे मुख्य तत्त्व है — तत्परता। जीसस ने कहा था “फसल तो वास्तव में बहुत है, परन्तु मज़दूर बहुत कम हैं।” (मत्ती 9:37, बाइबल) संसार के लोग ईश्वर के उपहारों को चाहते हैं, लेकिन जो बुद्धिमान हैं वे उपहारों के दाता को ही चाहते हैं।

योगी बनने का तात्पर्य है ध्यान करना। योगी सुबह उठने पर सर्वप्रथम अपने शरीर के लिए भोजन के विषय में नहीं सोचता; वह अपनी आत्मा का ईश-सम्पर्क के अमृत से पोषण करता है। ध्यान में गहरे गोते लगाने से प्राप्त प्रेरणा द्वारा वह भरपूर मन से प्रसन्नतापूर्वक दिन के समस्त कर्तव्यों को पूरा कर लेता है।

ईश्वर ने इस पृथ्वी को जैसी यह है उस तरह किसी उद्देश्य से ही बनाया है। उनकी योजना में संसार को और अच्छा बनाना मनुष्य का कर्त्तव्य है। पश्चिम के लोगों में नए और उन्नत भौतिक सुखों को पाने के लिए निरंतर व्यस्त रहने की प्रवृत्ति चरम सीमा पर होती है। दूसरी ओर पूर्व के लोगों में, जो कुछ भी उनके पास है, उसी में संतुष्ट रहने की प्रवृत्ति पराकाष्ठा पर होती है। दोनों जगह के लोगों में कुछ विशेष आकर्षण होता है — पश्चिम के लोगों का साहसी भाव और पूर्व के लोगों का सुगम एवं शांत स्वभाव। हमें दोनों का संतुलित मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए।

ध्यान से योगी बनता है

ईश्वर को पाने के लिए व्यक्ति को प्रत्येक सुबह और रात्रि को, और दिन में जब भी खाली समय मिले, ध्यान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त सप्ताह में एक दिन छः घण्टे का ध्यान करना महत्त्वपूर्ण है। यह असंगत नहीं है; कुछ लोग पूरे सप्ताह, प्रतिदिन दस-घण्टे के लिए पियानो पर अभ्यास करते हैं और उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं लगती। सिद्ध पुरुष बनने के लिए ईश्वर को अधिक समय देना आवश्यक है। हमें उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि हम उनसे अन्य किसी भी वस्तु की अपेक्षा अधिक प्रेम करते हैं। जब आप ध्यान के अनुभवी हो जाएँगे, अधिचेतनावस्था में गहरे जाने में सक्षम हो जायेंगे, तब आपके लिए पाँच घण्टे की नींद पर्याप्त होगी। रात्रि के शेष समय को ध्यान के लिए उपयोग करना चाहिए। व्यक्ति रात्रिकाल और प्रातःकाल और अवकाश के दिन को ईश्वर का ध्यान करने के लिए उपयोग कर सकता है। इस तरह से कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक की पश्चिम का अति व्यस्त व्यक्ति भी, योगी बन सकता है। इसलिए आप पश्चिम के योगी बनें। आपको मेरी तरह पगड़ी पहनने या मेरे जैसे लम्बे बाल रखने की आवश्यकता नहीं है।

हमें मंदिरों के ‘मधुमक्खी के छत्तों’ की तो आवश्यकता है, परन्तु हमें मंदिरों को हमारी अपनी आत्मानुभूति के ‘मधु’ से भरने की भी आवश्यकता है। वस्तुतः ईश्वर मंदिरों और गिरिजाघरों में भी विद्यमान हैं, लेकिन आपका वहाँ जाना मात्र ही प्रभु को दर्शन देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। मंदिर अथवा गिरिजाघर में जाना अच्छा है, लेकिन नित्य प्रति ध्यान करना उससे भी अच्छा है। दोनों कीजिए, क्योंकि मंदिर जाने से आप निश्चित रूप से प्रेरणा प्राप्त करेंगे, और नित्य ध्यान से आप उससे भी अधिक उन्नत अवस्था प्राप्त करेंगे। जब भक्त का हृदय ईश्वर के लिए प्रेमाग्नि में जलता है और जब वह प्रार्थना के बम के गोले एक के बाद एक फेंकता है केवल तब ईश्वर स्वयं को उसके प्रति समर्पित कर देते हैं। उन्हें पाने के लिए ऐसी अनवरत भक्ति का होना अनिवार्य है। योगी बनने के लिए और साथ ही आज के युग के साथ मिलकर चलने के लिए, घर में ध्यान करना, स्वयं को अनुशासित करना, और समस्त कर्तव्यों को ईश्वर की सेवा के रूप में पूरा करना आवश्यक है।

मेरी सबसे बड़ी इच्छा है मनुष्यों की आत्माओं में ईश्वर के मंदिरों को स्थापित करना और उनके चेहरे पर ईश्वर की मुस्कान को देखना। अपनी आत्मा में प्रभु के लिए एक मंदिर स्थापित करना आपके जीवन की सम्पूर्ण उपलब्धियों में से सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। और यह सरलता से किया जा सकता है। इसलिए सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप को पश्चिम में भेजा गया था।

जिस किसी ने भी अपनी आत्मा के मंदिर में ईश्वर को स्थापित कर लिया है, वह योगी है। वह मेरे साथ कह सकता है कि योग पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के लिए है — सभी लोगों के लिए है, और वे योग के राजमार्ग में सम्मिलित होने के लिए आध्यात्मविद्या के सिद्धान्तों के उपमार्गों का अनुसरण कर सकते हैं। सही मार्ग ईश्वर के आनन्दधाम की ओर जाता है। जो एक बार वहां पहुँच जाता है वह “फिर कभी वहाँ से बाहर नहीं जाएगा”। (प्रकाशित वाक्य 3:12- बाइबल)

आगे अध्ययन के लिए

शेयर करें

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email