संन्यास परंपरा

अर्जुन को भगवान कृष्ण का यह प्रेम भरा अनुरोध हममें से प्रत्येक, उनकी संतानों के लिए भगवान की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। हमें इच्छा की स्वतंत्रता देने के बाद, वह तब तक हमारे हृदय का पूर्ण प्रेम और भक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक कि हम स्वेच्छा और निर्बाध रूप से अपने हृदय को उन्हें अर्पित नहीं कर देते।

वे सभी जो सच्चा प्रेम, आनंद और तृप्ति पाना चाहते हैं, इस दिव्य रहस्य को अवश्य जान लें, क्योंकि सब प्रभु के द्वारा ही आता है, और उनके बिना कोई आनंद नहीं है। यह गृहस्थ के साथ-साथ संन्यासी के लिए भी सत्य है।

कोई भी युवक जो श्री श्री परमहंस योगानन्दजी की योगदा सत्संग शिक्षाओं का अध्ययन और अभ्यास कर चुके हैं, और यह अनुभव करते हैं कि उनका पूरा जीवन केवल हमारे गुरुदेव और उनके कार्यों का अनुसरण करने और उनकी सेवा करने के लिए है, ईश्वर के इस आह्वान पर गहराई से विचार करना चाहेंगे, कि वह अपना हृदय प्रभु को सौंप दें, और गहन ध्यान में पूछें कि उन्हें ऐसा करने में सर्वाधिक सक्षम ढंग क्या होगा। जो व्यक्ति इस जीवन में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश हेतु आकर्षित नहीं हैं, जो सभी सांसारिक और पारिवारिक प्रतिबद्धताओं या दायित्वों से मुक्त हैं, जिनका स्वास्थ्य उत्तम है, और जो भगवान को जानने की सर्वोच्च इच्छा रखते हैं, वे योगदा सत्संग संन्यास परंपरा में संन्यास ग्रहण के बारे में विचार कर सकते हैं।

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यदि आप इस जीवन का गहराई से आकर्षण अनुभव करते हैं, और उपरोक्त शर्तों को पूरा करते हैं, तो हम आपको योगदा सत्संग शाखा मठ, परमहंस योगानन्द पथ, रांची 834001, झारखंड में अपने विचारों और भावनाओं को लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं।

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