प्रथम परिचय

परमहंस योगानन्दजी के शिष्यों ने ‘योगी कथामृत’ को कैसे ढूंढा

यह दिसंबर 1946 में था कि ‘योगी कथामृत’ की प्रथम प्रतिलिपियाँ न्यू यॉर्क में प्रकाशक के यहाँ से, सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय पहुंचीं। पुस्तक की पचासवीं वर्षगाँठ के अवसर पर 1996 में, परमहंस योगानन्दजी के अनेक निकटतम शिष्य जो अभी जीवित थे, उन्होंने उस दिन के संस्मरण साझा किये, जब पुस्तक उन तक पहुंची और किस प्रकार उनके जीवन पर प्रभाव डाला था। सब शिष्यों में वो पहले कुछ थे, जिन्होंने इसके पृष्ठों से निःसृत दिव्य ज्ञान, प्रेम और रूपांतरकारी जीवन की दृष्टि को अनुभव किया — वह पृष्ठ जिन्होंने तब से सहस्त्रों के जीवन को बदल दिया है।

श्री श्री दया माता

‘योगी कथामृत’ का लेखन एक ऐसी परियोजना थी जिसे पूर्ण करने में परमहंसजी को कई वर्ष लगे। 1931 में, जब मैं माउंट वॉशिंगटन आई, उन्होंने इस पर अपना काम शुरु कर दिया था। एक बार जब मैं उनके अध्ययन कक्ष में कुछ सचिव-सम्बन्धी दायित्वों को निभा रही थी, तो सौभाग्यवश, उनके लिखे प्रारंभिक पाठों में से एक को देख सकी — वह ‘बाघ स्वामी’ के विषय में था। गुरुदेव ने मुझे इसे संभालने के लिए कहा क्योंकि वह एक पुस्तक में जाने के लिए था।

यद्यपि, उनकी आत्मकथा का बहुत बड़ा भाग 1937-45 की अवधि में लिखा गया था। परमहंसजी इतने दायित्वों और प्रतिबद्धताओं के निर्वहन में व्यस्त रहते, कि पुस्तक को प्रतिदिन समय नहीं दे पाते थे; परन्तु सामान्यतः वह सांय काल में इस पर काम करते थे और साथ ही जो भी और खाली समय में, जब वह इसपर अपना ध्यान लगा पाते। हमारा एक छोटा सा समूह — आनंद माता, श्रद्धा माता, और मैं — उस अवधि में अधिकतर उनके आसपास ही रहते, पांडुलिपि को टाइप करने में सहायता करते। प्रत्येक भाग के टाइप हो जाने के बाद, गुरुदेव उसे तारा माता को दे देते, जो उनकी सम्पादिका के रूप में कार्यरत थीं।

एक दिन, अपनी आत्मकथा पर काम करते करते गुरुदेव ने हमसे कहा, “जब मैं इस संसार से चला जाऊँगा, यह पुस्तक लाखों के जीवन बदल देगी। यह मेरे जाने के बाद मेरी संदेशवाहक होगी।”

जब पांडुलिपि पूर्ण हो गयी, तारा माता इसके लिए प्रकाशक खोजने न्यू यॉर्क चली गयीं। परमहंसजी, उनके ज्ञान और सम्पादकीय क्षमताओं का बहुत सम्मान करते थे और प्रायः सार्वजनिक तौर पर उनकी प्रशंसा करते थे। उन्होंने कहा : “कि इन्होंने (तारा माता) [she] ने जो इस पुस्तक के लिए किया है, मैं उसका वर्णन करना भी आरम्भ नहीं कर सकता। न्यू यॉर्क जाने से पहले ही वह बहुत बीमार पड़ गयीं। उसी हालत में वह न्यू यॉर्क रवाना हो गयीं। उनके बिना, यह पुस्तक कभी प्रकाशित नहीं हो सकती थी।”

पुस्तक के पूर्ण होने पर गुरुदेव की जो प्रतिक्रिया थी — उस आनंद को किसी शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने मेरी प्रति को चिह्नित किया, जैसे उन्होंने आश्रम में उपस्थित अन्य भक्तों के लिए किया। जब मुझे एक प्रति मिली, मैं जान गयी थी, पांडुलिपि को टाइप करने में सहायता देते हुए; कि यह एक अमर पुस्तक है — एक इसलिए कि पहली बार ऐसे छिपे सत्य उद्घाटित किये थे जो पहले कभी इतने स्पष्ट व प्रेरक ढंग से प्रस्तुत नहीं किये गए थे। न ही कोई और लेखक गुरुजी की तरह, इसके पृष्ठों में निहित चमत्कारों, पुनर्जन्म, कर्म, मरणोपरान्त जीवन और अन्य अद्भुत आध्यात्मिक सत्यों की व्याख्या कर पाया है।

आज इस पुस्तक की प्रसिद्धि पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? वह विनम्रता से भर जाते कि ‘योगी कथामृत’, पृथ्वी के कोने कोने तक, हर संस्कृति, प्रजाति, धर्म और आयु के लोगों तक पहुँच गयी है, और विगत 50 वर्षों के दौरान, इसे अद्भुत प्रशंसा एवं उत्साह से स्वीकारा गया है। यद्यपि गुरुजी ने कभी अपने महत्व के विषय में विचार नहीं किया,पर उन्हें अपने लेखन की बहुमूलयता पर निश्चित ही विश्वास था — क्योंकि वह जानते थे वह सत्य लिख रहे थे।

श्री श्री मृणालिनी माता

वर्ष 1946 के आखिर में, एक शाम एनसिनिटास आश्रम में, हम युवा साधक रसोई के अपने कामों में व्यस्त थे, तभी गुरुदेव ने द्वार से प्रवेश किया। सारी गतिविधियाँ रुक गयीं और हमारा ध्यान पूरी तरह उनकी प्रभावशाली मुस्कराहट और उनकी आँखों, जिसमें सामान्य से अधिक सुंदर चमक थी, पर केन्द्रित हो गया। उनके हाथ पीछे की ओर थे, “कुछ” छिपाते हुए। उन्होंने कुछ औरों को भी बुलाया और अपने सामने कतारबद्ध खड़ा कर लिया। तब उन्होंने हमें उस छिपी संपदा को दिखाया — उनकी पुस्तक ‘योगी कथामृत’ की एक अग्रिम प्रति।

“ओह!” और “आह!” के बीच हम शायद ही अपनी वह ख़ुशी व्यक्त कर पाये, जो भारत के महान साधु-संतों के बीच बीते, उनके बहुप्रतीक्षित जीवन वृतांत को, अंततः देख कर मिली — उन के सान्निध्य में बीते अनमोल समय में, जिसे सुना कर, उन्होंने हमें प्रायः रोमांचित किया। उन्होंने कुछ पृष्ठ खोले और अंत में महावतार बाबाजी के चित्रण पर आकर रुक गए। लगभग रुकी साँसों के साथ, हमनें अपनी श्रद्धा अर्पित की और उस कृपा को आत्मसात किया, जो परम-परम गुरु की झलक पाने वाले पहले कुछ में होने वाले होने पर अनुभव की।

दिसंबर के शुरु में हम सभी को प्रकाशक द्वारा भेजे गए पुस्तक के पार्सलों को सहेजने व लाखों इच्छुक भक्तों को डाक द्वारा भेजने की तैयारी के काम में भाग लेने के लिए माउंट वॉशिंगटन बुला लिया गया — सैंकड़ों में मांग थी। कई सप्ताह पहले से ही जब भी हम में से किसी को खाली समय मिलता, अपने किसी पुराने मैनुअल टाइपराइटर पर पतों के लेबल टंकित करने में व्यस्त हो जाते। बड़ी बड़ी मेजें (खूंटे पर रखे समतल बोर्ड) ऑफिस में लगाई गयीं, ताकि वहाँ से पुस्तक भेजने के प्रबंधन कार्य किये जा सकें; प्रत्येक पुस्तक को एक बड़े बंडल से निकाले खाकी डाक से भेजने वाले पेपर से लपेटना, हाथों से उसे सही आकार में काटना, पतों के लेबल और डाक टिकट को गीली स्पंज से भिगोकर चिपकाना। उस समय स्वचालित या मेलिंग मशीनें नहीं होती थीं! लेकिन सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना में भाग लेने में कुछ और ही आनंद था। संसार इस उत्तम शैली के दूत के माध्यम से हमारे धन्य गुरु को जानेगा।

तीसरी मंज़िल की बैठक में गुरुदेव घंटों एक डेस्क पर बैठ, बिना विराम के प्रत्येक पुस्तक पर अपने हस्ताक्षर करते रहे। पुस्तकों को प्रकाशक के शिपिंग बक्सों से निकाल कर, खोल कर, एक के बाद एक धारा प्रवाह से उनके सामने रखी गईं और उन्होंने प्रत्येक पर हस्ताक्षर किए — एक फाउंटेन पेन खाली कर दिया जबकि दूसरा भरा जा रहा था।

देर हो चुकी थी जब उन्होंने मुझे ऊपर बुलाया। वह अभी भी पुस्तकों पर हस्ताक्षर कर रहे थे। वरिष्ठ शिष्यों ने उनसे थोड़ा आराम करने का आग्रह किया, परन्तु उस आग्रह पर विचार करने से भी इंकार कर दिया, जब तक उन्होंने उस थोक (शिपमेंट) में आईं प्रत्येक पुस्तक को अपने आशीर्वाद के साथ हस्ताक्षर न कर लिया। उनके मुख पर अत्यंत शुभ भाव थे जैसे कि उस छपे पृष्ठों में उनका अपना एक अंश और ईश्वर के लिए उनका प्रेम संसार को भेजा जा रहा हो, और इसमें क्षण मात्र की भी देरी नहीं होनी चाहिए।

एक अवर्णनीय आनंद के साथ, भोर में हम उनके चरणों में ध्यान करने बैठे। गुरुजी ने इस ख़ज़ाने की हमारी व्यक्तिगत प्रतियों को हमारे हाथों में थमाया और बाकी प्रतियों को सुबह डाक से भेजने के लिए लपेट दिया गया अथवा हॉलीवुड व सैन डिएगो के केंद्रों पर भेजने के लिए पैक कर दिया गया। ‘योगी कथामृत’ लाखों जिज्ञासु आत्माओं तक अंततः गुरुजी की कृपा और ईश्वर के लिए प्रेम पहुँचाने की एक दिव्य नियति की ओर अग्रसर थी।

Appreciation letter to Tara Mata from Yogananda
Tara Mata- Editor of Autobiography of Yogi

'योगी कथामृत' की लेखकीय स्वीकारोक्ति में उद्धत श्रद्धांजलि में परमहंस योगानन्दजी ने अपनी पांडुलिपि में संपादकीय सहयोग के लिए तारा माता को सराहा है। तारा माता की पुस्तक के प्रति पर अंकित लेख दर्शाता है कि इस मूल्यवान शिष्या की सेवाओं के लिए उनके मन में अथाह सम्मान था।

हमारी लॉरी प्रैट के लिए

“इस पुस्तक के प्रकाशन में तुम्हारे साहसी और प्रेममय योगदान के लिए ईश्वर और गुरु का तुम पर सदैव आशीर्वाद बना रहे। पी. वाई.”

“अंततः ईश्वर, मेरे गुरुओं और स्वामियों की पावन सुगंध, मेरी आत्मा के गुप्त द्वारों से निकलकर बाहर आ गयी है — अनंत बाधाओं और लॉरी प्रैट व अन्य शिष्यों के अथक प्रयासों के बाद। आनंद की अक्षय ज्वाला में, कठिनाइयों के सभी गठ्ठर जल रहे हैं।”

शैलसुता माता

हममें से कुछ ही लोग उस समय एनसीनिटास आश्रम में रह रहे थे जब परमहंसजी ‘योगी कथामृत’ लिख रहे थे, एक ऐसी परियोजना जिसको पूरा करने में उन्हें कई वर्ष लगे। उस समय मैं भी वहाँ रह रही थी।

गुरुजी पुस्तक का लेखन कार्य अधिकतर आश्रम के अपने अध्ययन कक्ष में करते थे। मुझे वो समय याद है, मौके जब कि वह पूरी पूरी रात श्रुतलेख दिया करते थे, और दूसरे अवसर पर जब यह सारे दिन भर जारी रहता था और उसके बाद भी चलता था। दया माँ और आनंद माँ की तरह मैं सचिव संबंधी दायित्वों में शामिल नहीं होती थी, जो कि उनके वचन को कभी शॉर्ट हैंड में लिखती थीं और अन्य समय पर कभी टाइपराइटर प्रयोग करती थीं। मेरा दायित्व अधिकतर उनका भोजन तैयार करना होता था ताकि वह निर्बाध काम कर सकें!

जब ‘योगी कथामृत’ प्रकाशक के यहाँ से आयी, तो बड़ा जश्न मनाया गया। गुरुजी चाहते थे कि हम उनकी पुस्तक शीघ्र ही उन सभी को भेज दें जिन्होंने पहले से ही अपनी प्रति के लिए आग्रह कर दिया था! इसलिए आरंभिक उत्सव के बाद, हम सब अब तक एकत्र कई सारे पिछले आर्डर पूरे करने में व्यस्त हो गए। मैंने व शीला माई ने बहुत सी प्रतियों को लपेटा, पैकेटों पर मोहर लगाई और उन्हें पूरी तरह तैयार किया। फिर हम वहाँ कार लेकर आए और उसके सारे दरवाज़े और डिक्की खोल दिए। जब कार पूरी तरह भर गई, तो हम पुस्तकों के पार्सल को लॉस एंजेलिस के मुख्य डाकघर ले गए। हम बहुत प्रसन्न थे कि आख़िरकार ‘योगी कथामृत’, अन्य लोगों को सब जगह उपलब्ध होने जा रही है!

स्वामी भक्तानंद

मेरे 1939 में आश्रम प्रवेश के कुछ दिन बाद ही परमहंसजी ने, हम में से कुछ ही लोगों से, माउंट वॉशिंगटन के प्रशासकीय भवन के बरामदे में बात की। उन्होंने हमें बताया कि ईश्वर ने उन्हें कहा है, कि उन्हें अपने जीवनकाल में कुछ पुस्तकें लिखनी हैं; और जब वह पुस्तकें पूर्ण हो जाएंगी तो इस पृथ्वी पर उनका मिशन पूर्ण हो जाएगा। ‘योगी कथामृत’ उन पुस्तकों में से एक थी। जब यह पुस्तक पहली बार आई, तो मैंने इसे आरम्भ से अंत तक एक या दो दिन में ही पूरा पढ़ लिया — कितनी अद्भुत और प्रेरक! मुझे याद है कि मैं सोच रहा रहा था कि परमहंसजी की शिक्षाओं में रुचि बढ़ाने में यह पुस्तक अहम भूमिका निभाएगी। आज के दिन तक, हमने केवल हिमशिला की नोंक भर देखी है।

उमा माता

जब मैं 1943 में परमहंस योगानन्दजी से मिली तो मैं नौ वर्ष की थी। मेरे पिता सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप के सदस्य थे और सैन डिएगो मंदिर के सत्संग में भाग लेते थे। सन 1947 में मैंने ‘योगी कथामृत’ पढ़ी, जो प्रति उन्हें योगानन्दजी ने दी थी। मेरे पिता बहुत संकोची स्वभाव के थे और कभी अपने विश्वासों से दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने मुझे भी यह पुस्तक कभी नहीं दिखाई — यह मुझे अनायास ही मिल गई। इसे पढ़ने में मुझे कुछ समय लगा — मैं उस समय काफ़ी छोटी थी और पुस्तक में कुछ भारी भरकम शब्दावली थी। लेकिन आरंभ से ही, ‘योगी कथामृत’ मेरे लिए शरणस्थान रही है, मेरी आत्मा के लिए आरोग्यकर मरहम की तरह।…और सबसे बड़ी बात, ‘योगी कथामृत’ दर्शाती है कि हमारे लिए ईश्वर को जानना संभव है।

मुक्ति माता

सन् 1946 में, मुझे आश्रम में अपना पहला क्रिसमस याद है। ‘योगी कथामृत’ पूर्ण हो गयी थी, और परमहंसजी ने हम सबको प्रतियां दीं। कितने शक्तिशाली रूप में उन पृष्ठों ने हमारे गुरु के उज्जवल एवं रमणीय व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया — वह प्रेम और आनंद जो हमें उनके सानिध्य में मिलता था। हमने उनके मुख से इन्हीं कई वृतांतों को सुन कर कितना उन्नत अनुभव किया है, और इस पुस्तक के माध्यम से सभी उसमे सहभागी बन सकते हैं।

पार्वती माई

मुझे स्पष्ट रूप से याद है जब ‘योगी कथामृत’ का पहली बार विमोचन हुआ। कुछ समय बाद मैंने परमहंसजी से पूछा कि क्या वह एक छोटा सा विचार मेरी पुस्तक की प्रति पर लिखेंगे? उन्होंने लिखा, “इन पृष्ठों की वेदी पर छिपे अनंत को खोजो।” कभी कभी जब मुझे विशेष आवश्यकता पड़ी है, मैंने ‘योगी कथामृत’ को खोल कर एक अनुच्छेद देखा और सोचा, “मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले इसे देखा है!” लेकिन वह सटीक रूप से सम्बंधित था, जो मुझे उस समय निपटना था। यद्यपि मुझे पता भी नहीं होता कि पुस्तक में उसे कहाँ ढूँढना है, वह पृष्ठों से उछल, मेरी आवश्यकता के समय, सामने आ गया। मैंने पाया है कि सद्गुरु का मार्गदर्शन वास्तव में सच्चा है — आप इन पृष्ठों की वेदी पर अनंत को खोज सकते हैं।

“यह पुस्तक मेरी संदेशवाहक होगी।…” इस प्रकार परमहंस योगानन्दजी की भविष्यवाणी अनुसार, विश्व भर की आत्माओं को क्रियायोग के पावन पथ पर लाने के, उन्हें दिए गए दायित्व को निभाने में ‘योगी कथामृत’ की भूमिका रही। नीचे उन अनगिनत आत्माओं में से तीन के वृतांत दिए हैं, जिनके लिए इस पुस्तक ने गुरु के संदेशवादक का काम किया — उनके जीवन काल में भी और उनके जाने के बाद भी।

स्वामी आनंदमय

मैंने किशोर अवस्था में प्रवेश ही किया था, जब मैंने स्विट्ज़रलैंड के एक बड़े शहर विंटर्थर के एक उपनगर में अपने एक अंकल आंटी के साथ गर्मी की छुट्टियां बिताईं। मेरे अंकल एक संगीतज्ञ थे, ऑर्केस्ट्रा सिम्फनी के एक सदस्य। वह भी छुट्टी पर थे जिसे वे अपने बगीचे में काम कर बिताते थे। मैं उनकी सहायता करता था। चूंकि मेरे अंकल निःसंतान थे, वे मुझमें बहुत रुचि लेते थे, और बगीचे में काम करते हुए लंबी “बातचीत के सत्र” होते थे। मुझे पता चला, कि मेरे अंकल, कि पूर्वी दर्शनशास्त्र में गहरी रुचि थी, और मैं पूरी तन्मयता से कर्म, पुनर्जन्म, सूक्ष्म और कारण धरातल संबंधी विशेषतः, संतों व् स्वामियों जो आत्मसाक्षात्कार कर चुके थे, उनकी बातें सुनता।

उन्होंने मुझे बुद्ध के बारे में बताया और कैसे उन्होंने सौभाग्यशाली अवस्था प्राप्त की, और अन्य संतों के बारे में बताया, जिससे मुझ में उनका अनुसरण करने की प्रबल इच्छा भड़क उठी। मुझे याद है कि मैं कैसे मन ही मन बोधित्व, बोधित्व दोहराता हुआ इधर उधर घूमता रहता। यद्यपि इस शब्द का पूर्ण अर्थ नहीं समझता था, तथापि, मैं जानता था यह कोई, साधारण मनुष्य की उपलब्ध वस्तु से बहुत बड़ी चीज़ है, चाहे वह मनुष्य अपने भौतिक या कलाक्षेत्र में कितना ही निपुण क्यों न हो। मैंने अपने अंकल से पूछा कि ऐसी स्थिति कैसे पा सकते हैं, तो वह बस इतना ही बता सके कि इसके लिए ध्यान करना पड़ता है। परन्तु कैसे, यह वह नहीं जानते। उन्होंने कहा कि इसके लिए आपको गुरु बनाना पड़ता है जो सब कुछ सिखा सके। जब मैंने ऐसे किसी गुरु से मिलने की उत्कट इच्छा प्रकट की, वह बस सर हिला कर मुस्कराए, “मेरे विनीत बच्चे, स्विट्ज़रलैंड में कोई गुरु नहीं है!”

इसलिए मैंने गुरु के लिए प्रार्थना आरंभ कर दी। गुरु के लिए मेरी तड़प इतनी अधिक थी कि, अपने गृहनगर लौट कर, मैं रेलगाड़ी स्टेशन जाया करता था और इस आशा में घंटों प्रतीक्षा करता कि “वह” आएंगे। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

मैंने स्कूली शिक्षा समाप्त कर निराशाजनक दो वर्ष तक अपने पिता के व्यवसाय में काम किया। तब तक हिन्दू दर्शन में अपनी रुचि को त्याग चुका था, क्योंकि गुरु पा सकने की आशा नहीं दिखती थी। मैंने कला को आजीविका का साधन चुना और तीन साल बाद मुझे संयुक्त राज्य से प्रसिद्द वास्तुकार फ्रैंक लॉयड राइट के साथ अध्ययन करने का निमंत्रण मिला।

अमेरिका का में मेरे प्रथम सप्ताह के दौरान, मैं एक अंकल को मिलने गया जो कि 1920 में इस देश में आ बसे थे। बातचीत में उन्होंने हिन्दु दर्शनशास्त्र की चर्चा की। जब मैंने उन्हें बताया कि कई वर्षों से पहले ही मेरी भी इस विषय में रुचि थी, तो उनका चेहरा चमक उठा और वो मुझे अपने व्यक्तिगत अध्ययन कक्ष में ले गए और वहां ‘योगी कथामृत’ दिखाई। मुखपृष्ठ पर परमहंस योगानन्दजी के चित्र की ओर संकेत करते हुए उन्होंने पूछा, “क्या तुमने कभी इनके बारे में सुना है?” जब मैंने कहा नहीं, तो उन्होंने उत्तर दिया, “ऐसा श्रेष्ठ मनुष्य मैंने पहले नहीं देखा। वह सच्चे गुरु हैं!”

“आपने उन्हें देखा है?” मैं अत्यंत आश्चर्य से चिल्लाया, “वह कहाँ हैं? — अमेरिका में तो नहीं !?”

“हाँ, वह लॉस ऐंजिलीस में रहते हैं, ” तब उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने इस देश में आने के तुरंत बाद परमहंसजी द्वारा प्रदत्त व्याख्याओं और कक्षाओं की श्रंखला में भाग लिया। मैंने सोचा कि, उन तमाम वर्षों में जब मैं गुरु की लालसा में लिप्त था, मेरे अंकल एक गुरु और उनकी शिक्षाओं से परिचित थे!”

मैंने भूखे की भांति किताब पढ़ डाली। वह पहला चमत्कार था। मैं इतना सम्मोहित हो गया कि मुझे इसका भी भान न रहा कि यह अपने आप में एक चमत्कार था — मुझे इतनी अंग्रेज़ी नहीं आती थी कि उस भाषा में पुस्तक पढ़ सकूँ। फ्रैंक लॉयड राइट ने भी एक आत्मकथा लिखी थी, लेकिन मैंने उसके शुरु के दो चार पृष्ठ पढ़ने का असफल प्रयास किया। मुझे अंग्रेज़ी सीखने में एक वर्ष लगा, ताकि मैं उस पुस्तक को पढ़ने योग्य बन सकूँ। लेकिन ‘योगी कथामृत’ मैं आरम्भ से अंत तक पढ़ गया।

अपने हृदय में मैं जानता था कि जो मैं चाहता था वह मुझे मिल गया, और मैंने परमहंस योगानन्दजी की शिक्षाओं के अध्ययन का और ईश्वर को खोजने का मन बना लिया।

कुछ महीने बाद था, जब मैं थोड़ी और अंग्रेज़ी सीख गया, तब मैं लॉस ऐंजिलीस की यात्रा के योग्य हो गया, ताकि गुरु से मिल सकूँ। जैसे ही मैंने मदर सेंटर की धरती पर कदम रखा, वैसे ही मैंने एक असीम शांति अनुभव की, ऐसी मैंने पहले कभी कहीं अनुभव नहीं की। मैं जान गया मैं पावन धरती पर खड़ा हूँ।

रविवार को मैंने हॉलीवुड मंदिर में परमहंसजी के प्रातःकालीन सत्संग में भाग लिया। रविवार को मैंने हॉलीवुड मंदिर में परमहंसजी के प्रातःकालीन सत्संग में भाग लिया। वह एक अविस्मरणीय अनुभव था। सत्संग के बाद, गुरुजी एक कुर्सी पर बैठ गए और अधिकतर सभागण उनका अभिवादन करने गये। मैं व्यक्त नहीं कर सकता कि कतार में खड़ा मैं कैसा अनुभव कर रहा था। अन्ततः जब मैं उनके सामने जा खड़ा हुआ, तो उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और मैंने उन गहरी प्रदीप्त मृदु आँखों में देखा। एक शब्द नहीं बोला गया। लेकिन एक अवर्णनीय आनंद उनके हाथ और आँखों से मुझ में प्रवेश कर रहा था।

मैं टेम्पल से निकला और सनसेट बोलीवर्ड की ओर मंत्रमुग्ध सा चल पड़ा। मैं आनंद से इतना मदहोश था कि मैं सीधा नहीं चल पा रहा था। मैं शराबी की तरह लड़खड़ा रहा था। इतना ही नहीं, बल्कि मैं अपने भीतर आनंद को सम्भाल नहीं पा रहा था और ज़ोर ज़ोर से हंसता जा रहा था। राह चलते लोग मुड़ रहे थे और मुझे घूर रहे थे; और जो मेरी ओर आ रहे थे, वह रविवार की सुबह सार्वजनिक मादकता का अनुमान लगाते हुए, अरुचि से सिर हिलाते हुए छिटक कर दूर हो गए। मैंने परवाह नहीं की। मैं अपने जीवन में इतना खुश कभी नहीं हुआ था।

इस अनुभव के बाद, ज़्यादा समय नहीं बीता, कि मैंने सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप के आश्रम में एक संन्यासी के रूप में प्रवेश किया।

स्वामी प्रेममय

पैंतीस वर्ष से अधिक परमहंस योगानन्दजी के संन्यास शिष्य, सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप के मिनिस्टर स्वामी प्रेममय सन् 1990 में अपनी मृत्यु तक, संगठन के युवा संन्यासियों के आध्यात्मिक प्रशिक्षण के लिए उत्तरदायी रहे। उन सबको उन्होंने यह वृतांत बताया।

स्वामी प्रेममय का जन्म स्लोवेनिया में हुआ। उनके परिवार के राजघराने और अन्य प्रभावशाली लोगों से संबंध होने के कारण, जब दूसरे विश्व युद्ध के बाद उनके देश की सत्ता पर कम्युनिस्ट लोगों ने कब्ज़ा किया, तो उन्हें ज़बरदस्ती भागना पड़ा। सन् 1950 में, अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने उन्हें अमेरिका आने का निमंत्रण दिया।

सन् 1950, के अंतिम चरण में न्यू यॉर्क जाने के लिए जहाज़ पर चढ़ने से पहले स्वामी प्रेममय को एक पुराने पारिवारिक मित्र (एवलीना ग्लैंज़मैन) ने एक विदाई उपहार दिया। उपहार के आकार से उन्होंने उसे टॉफियों का डिब्बा समझा,और जहाज़ पर चढ़ने पर, अपने साथी यात्रियों के साथ साझा करने के लिए खोल लिया। वह यह देख आश्चर्यचकित रह गए, वह टॉफियों का डिब्बा नहीं, बल्कि एक पुस्तक थी — ‘योगी कथामृत’।

यद्यपि वह उपहार देख भावुक हुए, लेकिन उसे तत्काल पढ़ने की प्रेममयजी को इच्छा नहीं हुई। जब कि तरुण अवस्था में उन्हें पढ़ने की बहुत भूख थी, पर अब वो दिन बीत गए थे (उन्होंने बाद में बताया कि पंद्रह वर्ष की आयु से पहले इतनी पुस्तकें पढ़ी थीं, जितनी उन्होंने बाकी पूरे जीवन में नहीं पढ़ीं)। वैसे भी, वह पूर्वीय दर्शनशास्त्र से परिचित भी थे, किशोरावस्था में ही उन्हें भगवद्गीता पढ़ने को मिल गयी थी और उसे याद कर लिया था। अब, उपहार दी गयी पुस्तक की विषय वस्तु देख कर, उनकी पहली प्रतिक्रिया थी “मैं इस पुस्तक को नहीं पढूंगा — मैं फंसना नहीं चाहता।” अमेरिका में वह विभिन्न व्यावसायिक उपक्रमों में लग गए, और अंत में उन्हें संयुक्त राष्ट्र के महासचिव डैग हैमर्शोल्ड के व्यक्तिगत सचिव का पद प्रस्तावित किया गया। (कैलिफ़ोर्निया आने से पूर्व उन्होंने पद अस्वीकार कर दिया)। महीने बीत गए — और आत्मकथा प्रेममय जी के न्यू यॉर्क वाले घर की शैल्फ पर बिना पढ़े, पड़ी रही। इसी बीच, श्रीमती ग्लैंज़मैन (जो कि आत्मकथा के इटालियन संस्करण की अनुवादक थी) अपने मित्रों से पुस्तक पर उनकी राय पूछ रही थीं। तब तक स्वामी प्रेममय ने पृष्ठों को पलटने का प्रयास भी नहीं किया। अंततः श्रीमती ग्लैंज़मैन ने यह शब्द लिखे, “बताएं अच्छी लगी या अच्छी नहीं लगी; लेकिन कुछ बताएं!” उदास मनःस्थिति में — उस दिन, 6 मार्च उनका जन्मदिन भी था, और वह विचार कर रहे थे कि अपने जीवन के साथ क्या किया जाए — उन्होंने पुस्तक उठाई और पढ़ना शुरु कर दिया।

मंत्रमुग्ध, उन्होंने एक बार में ही पूरी पुस्तक पढ़ डाली। यह पहचानते हुए कि लेखक में अब तक मिले व्यक्तियों से अधिक तक की आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि है, प्रेममयजी ने परमहंस योगानन्दजी को पत्र लिखने का निश्चय किया।

प्रेममयजी को शायद ही पता था कि जब वह डाक से पत्र भेज रहे थे, गुरुजी अपने जीवन का इस पृथ्वी पर अंतिम दिन जी रहे थे।

स्वामी प्रेममयजी को गुरुजी के निधन का समाचार कुछ समय बाद मिला, जब दया माता ने उनके पत्र का उत्तर दिया। कई माह बीत गये; प्रेममयजी पुस्तक और उसके लेखक के विचार को अपने मन से निकाल नहीं पा रहे थे, और उन गर्मियों में, उन्होंने परमहंसजी की शिक्षाओं के विषय में और जानने के लिए, लॉस ऐंजिलीस जाने का निर्णय किया। जैसे ही उन्होंने पहली बार सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फे़लोशिप मुख्यालय की धरती पर कदम रखा, एक मुस्कुराता हुआ अजनबी उनके निकट आया। एक दीप्तिमान मुस्कान के साथ, उस आदमी ने उनका स्नेह पूर्ण आलिंगन किया जैसे कि वह पुराने मित्र थे — बहु प्रतीक्षित व बहु अभिलाषित। शब्दों का कोई आदान प्रदान नहीं हुआ, और बाद में ही प्रेममयजी को औपचारिक तौर पर उनके नये ‘पुराने मित्र’ से परिचित कराया गया — श्री श्री राजर्षि जनकानन्द, सोसाइटी के अध्यक्ष!

इस प्रकार, वह पुस्तक जिसे परमहंसजी अपना ‘दूत’ कहते थे, ने एक और आत्मा पर जादू कर दिया — क्योंकि उस दिन से, प्रेममयजी के जीवन की राह तय हो गयी थी।

शान्ति माई

यह सन् 1952 था, और मैं लॉस ऐंजिलीस में विलशायर बोलीवार्ड स्थित होटल एम्बैसेडर के सहायक प्रबंधक की सचिव के रूप में सेवारत थी; यह संभ्रांत वातावरण में एक आकर्षक कार्य था, जहाँ मैं कई विश्व प्रसिद्ध हस्तियों से मिली। लेकिन मुझे शायद ही पता था कि एक नाम की ध्वनि जब मेरे कानों में पड़ेगी तो मेरे जीवन पर उसका ऐसा प्रभाव पड़ेगा।

एक मोशन पिक्चर के निर्माता की सचिव ने, 6 मार्च, को होटल में फ़ोन कर कहा कि एक संदेश परमहंस योगानन्द को देना है। जिस क्षण मैंने वह नाम सुना, एक बड़े से “घड़ियाल” की घंटी मेरे हृदय में बजी; मेरा सिर चकरा गया, दिल-दिमाग में आनंद हिलोरें लेने लगा और मैं सीधी चल भी नहीं पा रही थी, जब संदेश देने की व्यवस्था हेतु मैं आरक्षण डेस्क की ओर चली। मुझे बताया गया कि इस नाम का कोई व्यक्ति होटल में पंजीकृत नहीं था, हालांकि भारतीय राजदूत और उनके कर्मचारी उस समय वहीं रह रहे थे। अपने ऑफिस में लौटते समय वह नाम मेरी चेतना में घूमता रहा और मैं और अधिक प्रेम और आनंद से भर गई। थोड़ी देर बाद मोशन पिक्चर के निर्माता का फ़ोन आया और पूछा, “मेरी सचिव ने तुम्हें कौन सा नाम दिया था” मैंने उसे बताया “परमहंस योगानन्द” और उसने हैरानी से कहा, “वही तो मैंने सोचा कि मैंने उसे कहते सुना! मैंने उसे यह नाम नहीं दिया था। उसे भी पता नहीं उसने क्यों ऐसा कहा।”

उस दिन के बाकी समय मैं आतंरिक जागरूकता की एक अजीब अवस्था में रही और उस नाम के साथ गहन संबद्धता अनुभव करती रही। और फिर 7 मार्च, परमहंस योगानन्दजी की महासमाधि का निर्णायक दिन आ गया। मैंने उसके विषय में समाचार पत्रों में पढ़ा और मुझे लगा कि मैंने अपने घनिष्ठ मित्र को खो दिया है। यह दिल दहलाने वाला था! ऐसा लगा जैसे मेरी ज़िंदगी अचानक ख़त्म हो गई है। मैं सोचती रही, मुझे उनकी कमी अनुभव हुई! मैंने पूरी ज़िंदगी उनकी प्रतीक्षा की थी और मैंने उन्हें खो दिया! लेकिन मुझे ठीक से पता नहीं था कि इसका क्या मतलब है क्योंकि मैं किसी गुरु या पंथ को नहीं खोज रही थी। इतना होते हुए भी, मेरी चेतना की गहराइयों में मुझे इस सत्य का भान था, कि मैंने अपने अस्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को खो दिया है।

उस क्षण के बाद मेरा सुव्यवस्थित, या यूँ कहें कि मोहक जीवन मुझे और नहीं भाया। मैंने अचानक अपनी महत्त्वपूर्ण योजनाएँ रद्द कर दीं, परिचितों से मिलना बंद कर दिया और पुस्तकों के माध्यम से खोज आरंभ कर दी। मेरे मन में यह विचार कभी नहीं आया कि देखूँ कि कहीं परमहंस योगानन्द जी ने कभी कोई पुस्तक तो नहीं लिखी; मुझे बस यह महसूस होता रहा कि वह जा चुके है और मैंने उन्हें खो दिया। चार आध्यात्मिक विषय की पुस्तकें पढ़ने के बाद जो कि मेरी आवश्यकता की गहराई को संतुष्ट नहीं कर पाईं, मैं पुनः हॉलीवुड पब्लिक लाइब्रेरी में पुस्तकों की उसी पंक्ति में खोजने लगी, अपनी माँ के साथ, जिन्होंने मेरे अंतर में सुलग रही आग को भांप लिया था। पहले खंड से मैं लगभग गुज़र चुकी थी, यह सोच कर कि यहाँ अच्छे से ढूंढ चुकी हूँ, तभी एक पुस्तक सबसे ऊपरी खाने से मेरे सिर पर गिरी और टकरा कर फर्श पर जा पड़ी। मेरी माँ ने उसे उठाया और उसे मेरी ओर बढ़ाते हुए राहत की सांस ली — परमहंस योगानन्द कृत ‘योगी कथामृत’। वहाँ मेरे सम्मुख वह नाम था जिसे मैं खोज रही थी और वह चेहरा जिसकी ऑंखें आत्मा तक को भेद रहीं थीं!

मैंने उसे रात में पढ़ा और माँ ने जब मैं काम पर गई हुई थी। “पढ़ना” शब्द शायद उस अनुभव का वर्णन करने के लिए पर्याप्त नहीं है जिससे हम सत्य के संसार में प्रवेश कर तल्लीन हो जाते। जीवन का उदगम, शिष्यत्व, क्रियायोग दीक्षा— ‘योगी कथामृत’ ने सब स्पष्ट कर दिया।

हमने हॉलीवुड टेंपल में एक सत्संग में भाग लिया, जिसने मुझे उसी “उपस्थिति” से अभिभूत कर दिया जो उस सुबह टेलीफोन पर गुरुजी का नाम पहली बार सुनने पर इतनी प्रबल थी। सत्संग के बाद मीरा माता ने हमारा सहृदयता से स्वागत किया और कुछ क्षण बाद सुझाया कि मैं माउंट वॉशिंगटन में मदर सेंटर जाऊँ, और उनकी बेटी मृणालिनी माता से मिलूँ। हम गये और हमें संन्यासी मार्ग का पता चला, और मैं तीसरी बार “आकर्षित” हुई — पहले परमहंस योगानन्द द्वारा, दूसरी बार ‘योगी कथामृत’ द्वारा और अब, केवल ईश्वर को समर्पित संन्यासी जीवन के आदर्श द्वारा।

जब मैंने 6 मार्च को, परमहंस योगानन्दजी का नाम सुनने का अपने ऊपर प्रभाव का वृतांत बताया, तो मुझे पता चला कि उस सुबह वह महामहिम भारतीय राजदूत बिनय रंजन सेन को दिए अल्प भोज में वहीं उपस्थित थे। वह भोज मेरे ऑफिस के साथ वाले कमरे में ही हुआ था। जिस समय मैंने फ़ोन उठाया और उनका नाम सुना, उस समय गुरुदेव मेरे मेज़ से लगी दीवार के ठीक दूसरी तरफ़ बैठे थे।

गुरुदेव उनके सभी “अपनों को” अपनी अद्भुत आत्मकथा के माध्यम से पुकार रहे हैं। हममें से कुछ को उत्तर देने में थोड़ा अधिक समय लगता है और सिर पर मार खानी पढ़ती है, जैसे मुझे पड़ी! परन्तु हम लाखों में से प्रत्येक कितना सौभाग्यशाली है जो उनकी “आवाज़” सुनता है और उनकी बंशी बिगुल की पुकार का उत्तर देता है।

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