ध्यान एवं क्रियायोग : परमहंस योगानन्द द्वारा

Kriya Yoga by Paramahansa Yogananda

ध्यान के लाभ

“अपनी स्वप्न जनित मर्त्य चेतना को भूल जाओ,
जागो और जानो की आप और इश्वर एक हैं।”

— श्री श्री परमहंस योगानन्द

ध्यान के बहुत से लाभ हैं। नित्य प्रति अभ्यास के द्वारा शरीर, मन तथा अंतःकरण में सूक्ष्म बदलाव आने लगते हैं। कुछ लाभ तुरंत ही दिखाई देने लगते हैं; लेकिन कुछ समय के साथ धीरे-धीरे आते हैं जिन्हें स्पष्ट दिखाई देने में समय लगता है।

यह परिणाम निष्ठा व समर्पण के साथ निरंतर प्रयास करने और इच्छाशक्ति का प्रयोग कर, तब तक डटे रहने से आते हैं जब तक जीवन का परम लक्ष्य जो कि — सदा नया लगने वाला आनंद और आत्म साक्षात्कार द्वारा परमात्मा से एकात्म होना है, प्राप्त नहीं हो जाते।

ध्यान क्या है?

ध्यान वह विज्ञान है जो आत्मा को अनंत आत्मा या परमात्मा से पुनः एकाकार करता है। गहराई से नित्य ध्यान का अभ्यास करने से आप अपनी आत्मा को जागृत कर सकते हैं — अपने अस्तित्व के केंद्र में दिव्य चेतना के शाश्वत आनंद का अनुभव। अपनी आत्मा के असीमित कोष को खोलने की समय-सिद्ध विधि है योग एवं ध्यान। यह विचार करने की अस्पष्ट मानसिक प्रक्रिया या दार्शनिक विवेचना नहीं है। यह सीधी विधि है जीवन के भटकाव और वैचारिक उथल-पुथल को शांत कर अपने असली स्वरूप का उदघाटन करने की — उस स्वरूप का जो अद्भुत और दिव्य है। ध्यान के अनुशासन द्वारा हम अपने अंतर्जगत में ध्यान एकाग्र करना सीखते हैं जहां हमें अपने अंदर के उस धाम का अनुभव होता है जहां अचल शांति एवं आनंद का निवास है।

जैसे-जैसे ध्यान में गहरे उतरने लगते हैं आपको निरंतर बढ़ती आंतरिक शांति व आनंद का अनुभव होता है जो आपकी आत्मा से प्रकट होता है। अति उन्नत अवस्था में अपनी आत्मा को परमात्मा के साथ पूर्णतया एकाकार हो जाने का अनुभव होने लगता है। ध्यान का यही उद्देश्य है — परम आनंदमय चेतना की उत्कृष्ट अवस्था, आनंदमय दिव्य तादात्म्य जिसे समाधि कहते हैं।

परमहंस योगानन्दजी ने क्रियायोग विज्ञान के अंग के रूप में प्रभावशाली ध्यान की विधियां सिखाईं। यह विधियां योगदा सत्संग पाठमाला का अंग हैं। कोई भी साधक जो ध्यान की सर्वोत्तम विधि सीख कर लाभ उठाना चाहता है वह इस पाठमाला को अनमोल ज्ञान का कोष और आजीवन मार्गदर्शन देने वाला आलम्ब पाएगा।

यदि आपने अभी तक योगदा सत्संग पाठमाला को पाने के लिए पंजीकरण नहीं किया है, तो आपको यहां ध्यान के विषय में कुछ प्राथमिक जानकारी मिलेगी, जिसका प्रयोग आप अभी से शुरू कर सकते हैं जिससे आपको ध्यान से प्राप्त होने वाली शाश्वत शांति व दिव्य चेतना का अनुभव होगा।

परमहंस योगानन्दजी के लेखन से :

“ध्यान का अभ्यास किए बिना आप चाहे और सब कुछ करते रहें आपको उस उल्लास का अनुभव नहीं होगा जो विचारों को शांत होने के बाद मन को परमात्मा में लीन करने पर प्राप्त होता है।”

— श्री श्री परमहंस योगानन्द
योगदा सत्संग पाठमाला

प्रकृति

ध्यान इश्वर-साक्षात्कार का विज्ञान है। यह विश्व का सबसे अधिक व्यावहारिक विज्ञान है। यदि संसार के अधिक से अधिक लोग आत्मज्ञान के लाभदायक परिणामों को समझने लगें तो वे सभी ध्यान करने लगेंगे। ध्यान का परम उद्देश्य परमात्मा की चेतना की अनुभूति करना और उनके साथ आत्मा की शाश्वत एकता प्राप्त करना है। सीमित मानवीय क्षमताओं को सृष्टिकर्ता की सर्वव्यापी व सर्व शक्तिमान सत्ता से एकाकार करने से अधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण भला दूसरी कौन सी उपलब्धि हो सकती है? इश्वर-साक्षात्कार साधक के जीवन को परमात्मा की परम शांति, प्रेम, आनंद, शक्ति और विवेक से परिपूर्ण कर देता है।

ध्यान एकाग्रता का उत्कृष्ट रूप में प्रयोग करना है। भटकावों से ध्यान को मुक्त कर अपनी रुचि के किसी विचार पर केंद्रित करना ही एकाग्रता है। ध्यान एकाग्रता का विशिष्ट रूप है जिसमें ध्यान को हर प्रकार के भटकाव व अशांति से हटाकर परमात्मा पर केंद्रित किया जाता है। ध्यान इसलिए परमात्मा को खोजने के लिए एकाग्रता का व्यावहारिक प्रयोग है।…

परमात्मा की विद्यमानता का पहला प्रमाण है अनिर्वचनीय शांति। यह शांति ऐसे आनंद उल्लास में खिलती है जो साधारण मनुष्य की समझ से नितांत परे है। एक बार भी यदि आप सत्य व जीवन के मूल स्त्रोत की अनुभूति कर लेते हैं तो संपूर्ण प्रकृति आपके साथ संवाद करने लगती है।

“ईश्वर को अपने अंतःकरण में खोज कर आप उन्हें हर तरफ और हर परिस्थिति में अनुभव करने लगेंगे।”

—श्री श्री परमहंस योगानन्द
Metaphysical Meditations

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