लाहिड़ी महाशय के साथ एक अविस्मरणीय भेंट

सनन्द लाल घोष द्वारा

मेजदा : श्री श्री परमहंस योगानन्द का परिवार एवं उनका प्रारम्भिक जीवन, पुस्तक से उद्धृत। लेखक योगानन्दजी के छोटे भाई थे, और उन्हें मेजदा कह कर बुलाते थे, बंगाली में अपने दूसरे बड़े भाई का संबोधन। उनके सबसे बड़े भाई का नाम अनन्त था, जिनका नाम भी इस कहानी में आता है।

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अनन्त की दैनन्दिनी के अनुसार 3 मई, 1906 को हमने बरेली से चिट्टागोंग को प्रस्थान किया था। यहाँ पर मेजदा पड़ोसियों के घरों के आंगन से फल तोड़ने के लिए मुझे अपने साथ ले जाते थे। एक घर में कुछ सुन्दर बड़ी बतखें थीं। मेजदा ने एक पंख-लेखनी बनाने का निर्णय किया, इसलिए उन्होंने उनमें से एक मनोहर पक्षी का एक पंख निकाल लिया। उसके मालिक को पता चला और उसने अनन्त से शिकायत कर दी। बड़दा ने मेजदा की शरारतों का अन्त करना चाहा, और उन्होंने निर्णय लिया कि सबसे उत्तम ढंग है उन्हें दिन के समय बन्द रखना। इसलिए उन्होंने स्वयं मेजदा को और मुझे ले जाकर स्थानीय विद्यालय में प्रवेश करवा दिया। मेजदा ने अपना प्रश्नपत्र बहुत अच्छी तरह से हल किया; मैं कठिनता से पास हो सका।

एक दिन, मेजदा को और मुझे बताया गया : “बन्दरगाह की ओर मत जाना। नदी के मुहाने से दूर रहना।”

मैंने सोचा : “मेजदा कभी इसका पालन नहीं करेंगे। ठीक इसी का वे विरोध करते हैं।” निस्संदेह, थोड़े ही समय में वे मुझे अपने साथ नदी के मुहाने पर ले गए।

अनन्त ने हम सब बच्चों को निर्देश दे रखे थे कि प्रतिदिन सायंकाल के प्रारम्भ होते, हम शीघ्र घर आ जाएँ और हाथ-पैर धोकर, छ: बजे तक विद्यालय से मिला अपना गृह-कार्य आरम्भ कर दें। चिट्टागोंग का बन्दरगाह हमारे घर से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर था। इस प्रकार, विद्यालय से लौटकर और अपना दोपहर का जलपान करने के बाद, हम आठ किलोमीटर की वापसी यात्रा करके निर्धारित समय पर वापस नहीं आ सकते थे। इसलिए हम बन्दरगाह तक पूरे रास्ते दौड़कर जाते, थोड़े समय तक जहाज़ों को देखते, और दौड़कर घर आ जाते। इस अति वेग की दौड़ से मेजदा एक उत्कृष्ट खिलाड़ी बन गए। मैं, भी, एक अच्छा खिलाड़ी बन गया; परन्तु उतना नहीं जितने मेजदा थे।

नदी के मुहाने को जाने वाले रास्ते में बहुत सी छोटी-छोटी पहाड़ियाँ पड़ती थीं। हमारे रास्ते के किनारे वृक्षों से फल भरपूर मात्रा में लटके होते थे। एक दिन मेजदा ने कहा, “सुनो, इस सायंकाल जब हम वापस आएँगे तो कुछ लीचियाँ तोड़ लेंगे। गोधूलि के प्रकाश में हमें कोई नहीं देख पाएगा।”

जैसा कहा था, वैसा ही किया! जब मेजदा स्वादिष्ट मीठी लीचियाँ तोड़ रहे थे, तो उन्होंने किसी को उनके नाम से पुकारते सुना। चौंक कर मेजदा निश्चल खड़े हो गए। साहसिक कार्य की सारी भावना अचानक लुप्त हो गयी! सावधानी से हम उस दिशा की ओर बढ़े जिससे आवाज़ आई थी। संध्या का प्रकाश शीघ्रता से क्षीण हो रहा था और छाया में हम अधिक दूर तक नहीं देख पा रहे थे, परन्तु शीघ्र ही हमने सफ़ेद वस्त्र पहने हुए एक व्यक्ति को देखा। हमें कुछ डरे हुए देख कर, उसने मित्रतापूर्ण ढंग से हमें निकट आने का संकेत किया। यदि वह यहाँ का चौकीदार होता तो मेजदा के नाम को कैसे जान पाता?

मधुरता से मुस्कराते हुए व्यक्ति की ओर हम धीरे-धीरे आगे बढ़े। उनकी आकृति अद्भुत प्रकाश के साथ दीप्तिमान लग रही थी। मैंने यह जानने के लिए इधर-उधर देखा कि प्रकाश कहाँ से आ रहा था। अचानक मेजदा ने सन्त को प्रणाम किया और उनके चरण स्पर्श किए। संत ने मेजदा को गले से लगा लिया और उनका माथा चूमा। मैंने भी संत स्वरूप पुण्यात्मा को प्रणाम किया। आशीर्वाद की मुद्रा में उन्होंने हमसे कहा, “जय-अस्तु!” (“विजय तुम्हारे साथ है!”) और फिर उन्होंने मेजदा से कहा :

“मुकुन्द, यह ईश्वर की इच्छा है कि आज मैं आपको दर्शन दूँ। जो मैं आपको कहता हूँ उसे याद रखो। आप इस धरा पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उनकी इच्छापूर्ति के लिए आए हो। प्रार्थना और ध्यान से पवित्र हुआ आपका शरीर, उनका मन्दिर है। सांसारिक सुखों या आनन्द के पीछे मत भागो। आप सच्चे सुख के मार्ग को प्रदर्शित करोगे; और आप अज्ञान में पीड़ित लोगों को अपने आध्यात्मिक ज्ञान से मुक्ति दिलाओगे। कभी मत भूलो कि आप महापुरुष के साथ एक हो, जिसकी उपलब्धि केवल उन्हीं को होती है जो ध्यान में परम सफलता प्राप्त करते हैं। आपका शरीर, मन और जीवन कभी भी, एक क्षण के लिए भी, ईश्वर के चिन्तन से विचलित नहीं होना चाहिए। आपको परमपिता का आशीर्वाद प्राप्त है। उनपर आपका पूर्ण विश्वास होना चाहिए। वे सभी आपत्तियों से आपकी रक्षा करेंगे। इस संसार में केवल वे ही शाश्वत हैं; शेष सभी कुछ नश्वर और अविश्वसनीय है। एक दिन आपके योग के आदर्श समस्त मानवता को प्रेरणा देंगे। मुकुन्द आगे बढ़ते रहो!”

मुझे कुलबुलाहट हो रही थी, क्योंकि समय व्यतीत हो रहा था, और अन्धेरा हमारे ऊपर छा रहा था। हमें घर पहुँचने के लिए लम्बे रास्ते पर चलना था। पिताजी से झिड़की और अनन्त से पिटाई अवश्यम्भावी थीं। संत ने मेरे विचार को अनुभव कर लिया और कहा, “दुःखी मत हो। निडर होकर घर जाओ; कोई भी नहीं जान पाएगा कि आप विलम्ब से आ रहे हैं।”

हम घर के लिए चल पड़े। थोड़ी दूर चलने के बाद, हमने पीछे मुड़कर देखा कि संत हाथ उठाकर हमें आशीर्वाद दे रहे थे। फिर वे अदृश्य हो गए। मैं मेजदा की ओर मुड़कर बोला, परन्तु वे नहीं सुन रहे थे। वे विचारपूर्ण भाव में सिर झुकाए हुए चल रहे थे। घर पहुँचकर मेजदा सीधे अपने प्रार्थना कक्ष में चले गए। मैंने पिताजी और अनन्त के बारे में जानकारी ली। मुझे पता चला कि बड़दा को एक मित्र ने अपने घर बुलाया है, और पिताजी कार्यालय की एक महत्त्वपूर्ण बैठक से वापस नहीं लौटे थे। कितना आनन्द! उन्हें हमारे देरी से आने का पता नहीं चल पाया था। मैं मेजदा को बताने के लिए प्रार्थना कक्ष की ओर भागा।

परन्तु मेजदा मुझसे मिलने बाहर आ रहे थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे उस चित्र के पास ले गए जो दीवार पर लटका हुआ था। हम कुछ क्षण उसके समक्ष खड़े रहे, तब उन्होंने कहा, “क्या तुम इन्हें पहचानते हो ? क्या ये वही नहीं हैं जिन्होंने हमसे बात की थी?”

मैं चकित रह गया। ये वही थे — वैसी ही मुस्कराहट। परन्तु उनका तो बहुत पहले निधन हो चुका था। वे अब हमारे पास कैसे आ सकते थे? जिनका निधन हुए इतने वर्ष हो चुके थे उनके साथ हम बातें कैसे कर सकते थे? उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया था, मेजदा को गले से लगाया और उनका माथा चूमा था। श्रद्धायुक्त भय से मेरा श्वास रुक गया, मैं बोल न सका। मैंने केवल मेजदा को देखा। इसमें कोई सन्देह नहीं था कि मेजदा और मैंने महान् लाहिड़ी महाशय को देखा था और उनसे बातें की थीं! एक ऐसे संत जिनका परामर्श समस्त भारतवर्ष में सर्वत्र गृहस्थियों और साधुओं द्वारा इच्छित था, एक ऐसे सद्गुरु जिनके पास आशीर्वाद और आध्यात्मिक निर्देश प्राप्त करने के लिए लोग अनन्त धाराओं की भाँति आते थे। मेजदा के साथ, मैंने अपनी आँखों से योगावतार के दर्शन किए और उनसे बातें कीं। मैं आज भी उस अद्भुत अनुभव को याद करके रोमांचित हो उठता हूँ। मेरी स्मृति में यह सदा के लिए अमिट है। मैं धन्य हो गया : मुझ पर उनकी निरन्तर दया, उनकी सर्वोच्च कृपा है। मेरी कृतज्ञता की कोई सीमा नहीं है।

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