ईश्वर को जानना

श्री श्री परमहंस योगानन्द के लेखन के अंश

“हर समय ईश्वर का चिन्तन करना व्यावहारिक-सा प्रतीत नहीं होता है,” एक आगन्तुक ने कहा। परमहंस योगानन्दजी ने उत्तर दिया :

“संसार आपके साथ सहमत है, परन्तु क्या संसार एक सुखमय स्थान है? जो मनुष्य ईश्वर को त्याग देता है, सच्चा आनन्द उसे त्याग देता है, क्योंकि ईश्वर स्वयं आनन्दस्वरूप हैं। इस धरा पर उनके भक्त शान्ति के आन्तरिक स्वर्ग में निवास करते हैं, परन्तु जो उन्हें भूल जाते हैं वे अपने दिन असुरक्षा और निराशा के स्वनिर्मित नरक में व्यतीत करते हैं। ईश्वर के साथ ‘मित्रता करना’ ही वास्तव में व्यावहारिक होना है!”

उनके साथ परिचय बढ़ाएँ। ईश्वर को जानना ठीक वैसे ही सम्भव है जैसे अपने सबसे प्रिय मित्र को जानना सम्भव है। यही सत्य है।

सर्वप्रथम, आपको ईश्वर की एक सही धारणा रखनी चाहिए — एक निश्चित विचार जिसके द्वारा आप उनके साथ सम्बन्ध स्थापित कर सकें — और तत्पश्चात् आपको ध्यान एवं प्रार्थना तब तक करनी चाहिए जब तक कि आपकी मानसिक धारणा वास्तविक अनुभूति में बदल जाए। तब आप उन्हें जान लेंगे। यदि आप दृढ़ता से डटे रहेंगे, तो ईश्वर अवश्य आएँगे।

कुछ लोग हैं जो अपने सृष्टिकर्ता का चित्रण एक ऐसे शासक के रूप में करते हैं जो मनुष्य का अज्ञानता रूपी धुएँ से और दण्ड रूपी अग्नि से अत्याचार सहित परीक्षण करते हैं और जो मनुष्य कर्मों का निर्णय निर्दयतापूर्ण छानबीन के साथ करते हैं। इस प्रकार वे ईश्वर की सच्ची धारणा को, जो एक प्रेममय दयालु परमपिता है, विकृत करके ऐसा झूठा चित्र बना लेते हैं जो कि एक कठोर, दयारहित और बदला लेने वाला तानाशाह है। परन्तु जो भक्त ईश्वर से सम्पर्क में हैं वे जानते हैं कि उनको अनुकम्पाशील ईश्वर की अपेक्षा कुछ और सोचना मूर्खता है, क्योंकि वे सम्पूर्ण प्रेम और श्रेष्ठता के अनन्त आधार हैं।

ईश्वर शाश्वत आनन्द हैं। उनका अस्तित्व प्रेम, ज्ञान, और आनन्द हैं। वे साकार और निराकार दोनों ही हैं, और वे स्वयं को स्वेच्छानुसार जैसे चाहे व्यक्त करते हैं। वे अपने सन्तों को उसी रूप में दर्शन देते हैं जो प्रत्येक सन्त को प्रिय होता है : एक ईसाई क्राइस्ट को देखता है, एक हिन्दू कृष्ण या जगन्माता के रूप में दर्शन करता है, इत्यादि। जो भक्त निराकार रूप में उपासना करते हैं, वे प्रभु को एक अनन्त प्रकाश या ओम् की अद्भुत ध्वनि, मूल शब्द, पवित्र आत्मा, के स्वरूप में जानते हैं। सबसे उच्च अनुभूति जो मनुष्य प्राप्त कर सकता है वह है उस आनन्द का अनुभव प्राप्त करना जिसमें ईश्वर के अन्य सभी रूप-प्रेम, ज्ञान, अमरता-पूर्णरूप से समाविष्ट हैं।

परन्तु ईश्वर की प्रकृति को आपको शब्दों में कैसे बता सकता हूँ? वे अकथनीय हैं, अवर्णनीय हैं। केवल गहरे ध्यान में ही आपको उनके सार — तत्त्व का ज्ञान होगा।

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प्रतिज्ञापन के सिद्धांत एवं निर्देश

“हे प्रभो! मुझे आशीर्वाद दें कि मैं प्रत्येक विचार और कार्यकलाप के मन्दिर में आपको प्राप्त कर सकूँ। आपको भीतर प्राप्त करके, मैं आपको बाहर, सभी लोगों में, और सभी परिस्थितियों में पा लूँगा।”

— श्री श्री परमहंस योगानन्द
Metaphysical Meditations

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