ईश्वर-साक्षात्कार : व्यक्तियों और राष्ट्रों की दैवी सम्पदा

परमहंस योगानन्द द्वारा

(The Second Coming of Christ:The Resurrection of the Christ Within You, पुस्तक से उद्धृत , बाइबल के लूका 12:22–31 में जीसस क्राइस्ट के वचनों की व्याख्या)

उन्होंने अपने शिष्यों से कहा: – “इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि जीवन की परवाह न करें, न ही इस बात की चिंता करें कि आप को खाना कहां से मिलेगा; न ही शरीर की चिंता करें कि आप के पहनने के लिए कपड़े कहाँ से मिलेंगे। जीवन भोजन से कहीं अधिक है और शरीर कपड़ों से कहीं अधिक।

“कव्वे का उदाहरण लें: वे न तो बीज बोते हैं न फसल काटते हैं; उनके पास न भंडार घर है न खलिहान है; तो भी परमेश्वर उनका पोषण करते हैं। क्या आप पक्षियों से हर तरह से श्रेष्ठ नहीं हैं? और आप में से कौन मात्र विचार करके अपने शरीर को एक हाथ भी लंबा कर सकता है? यदि आप इतना छोटा-सा काम नहीं कर सकते, तो फिर आप बाकी सब की चिंता क्यों करते हैं?

कुमुदिनी का उदाहरण लें: वे कैसे खिलती हैं वे मेहनत नहीं करतीं, वे सूत नहीं कातती और फिर भी मैं आप से कहता हूँ कि सोलोमन अपने भव्यतम परिधान में भी कुमुदिनी जैसा सुन्दर नहीं हो सकता था। अल्प्विश्वास वाले लोगो, ज़रा सोचो: जिस प्रभु ने घास को भी यत्नपूर्वक गढ़ा है, जो आज तो खेत में है, किन्तु कल भट्टी में जलेगी, तब आप के तन के लिए वे क्या कुछ नहीं करेंगे?

इसकी चिंता न करें कि आप क्या खाएँगे या क्या पीएँगे, न ही आप मन में अविश्वास रखिए। इन्हीं सब चीज़ों के लिए सारे राष्ट्र आपस में होड़ लगाते हैं, और आपके परमपिता जानते हैं कि आपको इन वस्तुओं की आवश्यकता है। लेकिन बेहतर यही है कि आप परमात्मा के साम्राज्य को खोजें; तब यह सब आपको अपने आप ही प्राप्त हो जाएगा (लूका 12: 22-31)

पृथ्वी सच में स्वर्ग-लोक बन जाएगी यदि राष्ट्र और मनुष्य परमात्मा को जीवन का प्रथम उद्देश्य मानने की जीसस की चेतावनी पर ध्यान देने लगें। जब लोग राजनैतिक और व्यापारिक स्वार्थ पर ध्यान केंद्रित कर देते हैं और दूसरों के अधिकार छीन कर अपने देश या व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्ता और ऐशो-आराम जुटाने लगते हैं तब सुख-समृद्धि के दिव्य सिद्धांत का उल्लंघन होता है जिससे परिवार, राष्ट्र और दुनिया में अव्यवस्था व विपन्नता व्याप्त हो जाती है। अगर विभिन्न राष्ट्रों के नेतागण हिंसा व राष्ट्रवादी स्वार्थ की अति प्रशंसा करने के बजाए जनता के मन को आंतरिक शांति पाने, परमात्मा एवं दूसरों से प्रेम करने, और ध्यान का आनंद खोजने के लिए आह्वान करें तो भौतिक समृद्धि, स्वास्थ्य तथा अंतरराष्ट्रीय सौहार्द अपने आप राष्ट्रों के आध्यात्मिक खजाने में जुड़ जाएंगे।

जीसस ने “ईश्वर प्रथम” सिद्धान्त को न केवल व्यक्तिगत सुख पाने का सर्वश्रेष्ठ उपाय बताया बल्कि इस बात पर बल दिया कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कल्याण के लिए भी यह उपाय लागू होता है: “पृथ्वी के सारे राष्ट्र स्वार्थ-वश असंयमित तरीकों से भौतिक समृद्धि और सत्ता हथियाना चाहते हैं जिससे अपरिहार्य रूप से घातक असमानता, युद्ध और विनाश बढ़ता है। उन्हें इसके बजाय पहले परमात्मा को पाने का प्रयास करना चाहिए और उनके सिद्धांतों के अनुसार लोक मंगल को अपने सभी प्रयासों से जोड़ना चाहिए तथा अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक बंधुत्व की भावना की छत्रछाया में समन्वयपूर्वक अग्रसर होना चाहिए। ऐसे राष्ट्र जो एक दूसरे के साथ शांति से रहते हैं और प्रभु की चेतना में बने रहने का प्रयास करते रहते हैं, उन्हें परमपिता-परमेश्वर स्थाई समृद्धि प्रदान करते हैं, क्योंकि ऐसे राष्ट्र विश्व-कुटुंब की सहायता करने के द्वारा, तथा अपनी शुभेच्छा एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में सहयोग द्वारा ऐसी समृद्धि के योग्य होते हैं। जो परमात्मा ब्रह्मांडों का पालन-पोषण करते हैं, वे व्यक्ति और राष्ट्रों की आवश्यकता भली-भांति जानते हैं। यदि वे कौवे का भरण-पोषण करते हैं, कुमुदिनी को परिधान देते हैं, तो वे उन लोगों व राष्ट्रों को कितना कुछ प्रदान करेंगे जो परमात्मा के सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करते हैं!”

धन के लिए पागलपन की हद तक लोलुप आधुनिक सभ्यता की स्थिति स्पष्ट रूप से दिखा रही है कि स्वार्थपरकता व्यक्ति और राष्ट्र दोनों को नष्ट करती है। व्यापार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा घातक रूप से हानिकारक है क्योंकि हर कोई दूसरे की संपत्ति छीनने, हड़पने का प्रयास करता है। इस प्रकार 1000 लोगों के समुदाय में हर व्यापारी के 999 शत्रु एवं प्रतियोगी बन जाते हैं। जीसस ने लोगों से अपनी संपत्ति सभी के साथ साझा करने के लिए कहा; जब इस सिद्धांत का पालन किया जाता है तब 1000 लोगों के समाज में प्रत्येक व्यक्ति के 999 सहयोगी हो जाते हैं।

“राष्ट्रीय सुरक्षा व समृद्धि कभी भी देशानुराग व औद्योगिक स्वार्थ से हासिल नहीं हो सकते…. स्थाई राष्ट्रीय समृद्धि न केवल प्राकृतिक संसाधनों और देशवासियों के स्वावलंबी उद्यमों पर निर्भर करती है बल्कि प्राथमिक रूप से देशवासियों की नैतिकता, समन्वयकारी रुझान व आध्यात्मिक जीवन-शैली पर निर्भर करती है।”

— परमहंस योगानन्द

आज के गला-काट व्यापारिक वातावरण में अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष इतना अधिक तीव्र हो चुका है कि व्यापारी को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है और वह अपने जीवन को वास्तव में तथा आध्यात्मिक रूप से सुखी बनाने के विषय पर गहराई से सोच भी नहीं पाता है। व्यापार मनुष्य की प्रसन्नता के लिए है; मनुष्य को व्यापार के लिए नहीं रचा गया था। मात्र उतना ही उद्यम आवश्यक है जो मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में बाधक सिद्ध न हो। विज्ञान व तकनीकी में प्रगति तभी प्रशंसनीय है जब वह मानव-जाति की उन्नति में सहयोगी सिद्ध हो; किंतु व्यावहारिक सच्चाई यह है कि पृथ्वी के सभी राष्ट्र अपने देशवासियों की प्रसन्नता को बढ़ा सकते हैं यदि वे सादा जीवन एवं उच्च विचार की अवधारणा को आगे रखकर चलें﹘ अर्थात अपने मन को आध्यात्मिक उन्नति, प्रेरणाप्रद साहित्य, दर्शन-शास्त्र, सृष्टि की महिमाओं एवं संरचना के ज्ञान पर अधिक एकाग्र करें, तथा धन लोलुपता को बढ़ावा देने वाली उन्मादपूर्ण तकनीकी पर कम एकाग्र करें।

यदि पृथ्वी के सभी राष्ट्र औद्योगिक स्वार्थपरकता द्वारा सभ्यता में अव्यवस्था न फैलाएँ, जो धनी राष्ट्रों में आवश्यकता से अधिक उत्पादन एवं आवश्यकता से अधिक उपभोग को, और कमज़ोर राष्ट्रों में शोषण तथा गरीबी को बढ़ावा देती है तब सभी लोगों के पास खाने और रहने के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होंगे। किंतु क्योंकि लगभग सभी विकसित राष्ट्रों का उद्देश्य राष्ट्रवादी स्वार्थ और भौतिक संसाधनों की श्रेष्ठता स्थापित करना है, अपने पड़ोसी देशों की आवश्यकताओं का बिना ध्यान रखे हुए, सारा संसार अराजकता व अनेक प्रकार के ‘वादों’ से भ्रमित होकर कष्ट भोग रहा है जिसका परिणाम भुखमरी, गरीबी और युद्ध से उत्पन्न होने वाले दुख-दर्द हैं जिन से बचा जा सकता है। इस बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जो घटनाएं घटी उन्होंने स्पष्ट रूप से सिद्ध कर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा व समृद्धि, देशानुराग व औद्योगिक स्वार्थ द्वारा हासिल नहीं हो सकते, बल्कि इनके कारण तो आर्थिक आपदाएं, दो विश्वयुद्ध, बेरोज़गारी, डर, असुरक्षा, भुखमरी और भूकंप, समुद्री तूफान, सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा (जिनका अप्रत्यक्ष कारण सामूहिक कर्म सिद्धान्त है जो व्यक्तियों और देशों के इकट्ठे किए गए बुरे कर्मों पर आधारित होता है)।

आज संसार भर में व्याप्त अराजक स्थितियां, ईश्वर विरोधी जीवन शैली का परिणाम हैं। व्यक्तियों और राष्ट्रों की उनके अपने द्वारा सृजित विध्वंस से रक्षा की जा सकती है यदि वे पृथ्वी पर स्वर्ग रचने वाले दिव्य सिद्धांतों को अंगीकार कर लें – जैसे विश्व-बंधुत्व, औद्योगिक सहयोग, तथा भौतिक वस्तुओं एवं आध्यात्मिक अनुभवों का अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान। वर्तमान में चल रही मुनाफाखोरी व शोषण पर आधारित अर्थव्यवस्था पूर्णतया असफल सिद्ध हो चुकी है। केवल राष्ट्रों के बीच भाईचारा तथा आवश्यक उद्योगों व उद्योगपतियों के बीच भाईचारे की भावना ही संसार में स्थाई समृद्धि ला सकते हैं।

वर्ष 1930 की भीषण मंदी ने अनेक करोड़पतियों को, जो अपनी संपत्ति को बनाए रखने की अपनी वित्तीय कुशाग्रता में बहुत विश्वास रखते थे, झुका दिया था। भाग्य व मंदी के दौर के हाथों में पड़कर सबसे अधिक चालाक व्यापारी लोग भी हताश बच्चे बन गए थे जो नहीं समझ पा रहे थे कि किस ओर जाएँ। “निःस्वार्थता” तथा “अपनी समृद्धि में सभी की समृद्धि को सम्मिलित करने” के आध्यात्मिक नियम तोड़े गए थे। अतः विश्वव्यापी स्तर पर औद्योगिक अर्थव्यवस्था चरमरा कर गिर गई। मनुष्य के सोने के प्रति घातक लोभ ने औद्योगिक स्वार्थ को बढ़ा दिया जिसमें अन्याय पूर्ण आत्मघाती प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगी को बर्बाद करने के लिए दामों में भारी गिरावट लाने की कुटिल नीति का प्रयोग किया गया। जब भौतिकतावादी व्यापारी का मस्तिष्क लालच से भर जाता है तब उसकी बुद्धि ऐसी योजनाएं बनाती है जो एक के बाद एक असफल होती जाती हैं। यही वह कीमत है जो सभी भौतिकतावादी, ईश्वर को भुला चुके अभिमानी व्यक्तियों को कभी-न-कभी चुकानी ही पड़ती है।

औद्योगिक उत्पादों की कृत्रिम कीमत लगाकर मनुष्य मालिक व श्रमिकों के बीच संघर्ष का सृजन कर देता है जिससे एक के बाद एक मुद्रास्फीति व मंदी की लहर आती रहती हैं। मालिक व श्रमिक दोनों को, मस्तिष्क व हाथ-पैरों की तरह, राष्ट्र के शरीर व आत्मा के कल्याण के लिए सहयोग करना चाहिए न कि एक दूसरे से लड़ना चाहिए जिससे दोनों का ही विनाश सुनिश्चित हो जाता है। शरीर को बनाए रखने के लिए मस्तिष्क व हाथ एक दूसरे के साथ सहयोग करते हैं और दोनों ही उदर में भोजन से पोषित होते हैं। इसी तरह पूंजीपति जो समाज का मस्तिष्क है, और श्रमिक जो हाथ-पैर की तरह है, दोनों को परस्पर सहयोग देना चाहिए, जीवन को समृद्ध बनाने और अपने उत्पादों को साझा करने के लिए। न पूंजीपति को और न ही श्रमिक को विशेष प्राथमिकता मिलनी चाहिए अगर हम सरकार की दोनों शैलियों – साम्राज्यवादी व समाजवादी – की कमज़ोरियों से बचना चाहते हैं। पूंजी और श्रम प्रत्येक की अपनी निश्चित भूमिका है और दोनों को अपना कर्तव्य समान रूप से निभाना चाहिए । राष्ट्रीय संपदा को साझा करके प्रत्येक व्यक्ति को भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा तथा चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिए या प्रत्येक देशवासी को गरीबी का बोझ मिलजुलकर वहन करना चाहिए यदि ऐसा प्राकृतिक प्रकोप के कारण अपरिहार्य हो जाता है। एक प्रगतिशील भौतिक, मानसिक व आध्यात्मिक जीवन के लिए मूलभूत आवश्यकताओं का असमान वितरण नहीं होना चाहिए। गरीबों व संपन्न लोगों के बीच की खाई ही अपराध, लालच, स्वार्थ व अन्य अनगिनत सामाजिक बुराइयों का मूल कारण है।

यदि परिवार का कोई सदस्य बीमार या असहाय हो जाता है, तो वह परोपकार का पात्र नहीं बन जाता, बल्कि अपने परिवार से सम्मान सहित भोजन तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करता है। वैश्विक परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए भी यही लागू होता है। बेरोज़गारी, बुढ़ापे या अपंगता के कारण कोई भूखा नहीं मरना चाहिए। यदि पृथ्वी के राष्ट्र परमात्मा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उन्हें जीसस के बताए नियमों के अनुसार विश्व के सयुंक्त राज्य में भाईचारे के साथ रहना होगा, वस्तुओं का आदान प्रदान करते हुए, ताकि कोई भी व्यक्ति अभाव, अकाल, या दरिद्रता से कष्ट न भोगे।

अब यह अनिवार्य हो चला है कि व्यक्ति व राष्ट्र स्वार्थ को त्याग दें और कपड़े तथा भोजन कि व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करें। राष्ट्र के नागरिकों को अपनी स्वार्थपरता त्याग कर ज्ञान प्राप्त करने की विधि सीखनी चाहिए, और यह भी कि ध्यान के अभ्यास द्वारा अनंत सत्ता से कैसे समस्वर रह सकें, ताकि वे सभी मिलजुल कर सम्पूर्ण आनंद के द्वारा राष्ट्र की आत्मा का पोषण कर सकें। परमात्मा व उनके सिद्धांतों — भाईचारा तथा शांति — का अनुसरण करने वाले राष्ट्र, शतकों तक अपना अस्तित्व बनाए रखेंगे, बिना युद्ध या भुखमरी की यातना सहे, स्थाई समृद्धि तथा आध्यात्मिक सुख शांति के साथ। वे देश जो आर्थिक रूप से तो समृद्ध हैं किंतु ज्ञान व परमात्मा के आनंद से विहीन हैं, अपनी असंतुलित भौतिक सफलता को ग्रह युद्ध, पूँजीपतियों व श्रमिकों के संघर्ष, तथा उनकी संपन्नता से जलने वाले ईर्ष्यालु पड़ोसियों के साथ युद्ध में खो बैठेंगे। जहाँ एक राष्ट्र संपन्न है और उसका पड़ोसी देश भुखमरी से मर रहा है, ऐसा फ़ॉर्मूला कभी भी पृथ्वी पर शांति स्थापित नहीं कर सकता।

राष्ट्रों को एक दूसरे का ध्यान रखना चाहिए अन्यथा वे सभी विनाश को प्राप्त करेंगे । इसलिए जीसस पृथ्वी के राष्ट्रों से कहते हैं: “हे राष्ट्र गण! स्वार्थी मत बनो। भाईचारा और सब कुछ देने वाले परमात्मा को भुलाकर केवल भोजन, उद्योग और कपड़ों पर ही सीमित सोच मत रखो, अन्यथा तुम अपनी अज्ञानता के कारण अपने लिए स्व-निर्मित आपदाओं को निमंत्रण दोगे, और उसके फ़लस्वरूप होने वाले युद्ध, महामारी, व अन्य दुख-दर्द भी भोगोगे।”

संपन्नता अक्सर सामाजिक अंतरात्मा को कुंठित कर देती है: “हम दूसरे देशों की देखभाल क्यों करें: हमने अपनी समृद्धि के लिए परिश्रम किया ताकि हम संपन्नता का सुख ले सकें! उन्हें भी ऐसा ही क्यों नहीं करना चाहिए?” संवेदनाविहीन घमंड अदूरदर्शी होता है। दीर्घकालीन राष्ट्रीय समृद्धि केवल प्राकृतिक संसाधनों और देशवासियों के आत्मनिर्भरता के प्रयासों पर ही निर्भर नहीं करती बल्कि मूल रूप से देशवासियों की नैतिकता, मैत्री व आध्यात्मिक जीवन शैली पर निर्भर करती है। कोई राष्ट्र चाहे कितना ही सफल हो चुका हो, यदि वह चरित्र से व्यभिचारी, स्वार्थी और विसंगत हो जाता है तो वह गृह युद्ध, जालसाज़ी, तथा विदेशी आक्रमण का शिकार हो जाता है और अपना आत्मसंतोष तथा समृद्धि खो देता है।

इसी लिए जीसस ने चेतावनी दी है कि किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र को स्वार्थी नहीं होना चाहिए और केवल भोजन या वस्त्र या भौतिक संपत्ति जोड़ने तक ही विचार केंद्रित नहीं रखने चाहिए, बल्कि विनम्र होना चाहिए, ज़रूरतमंद मनुष्यों लोगों के साथ अपनी संपन्नता साझा करनी चाहिए, और केवल परमेश्वर को पृथ्वी के दिए हुए सभी उपहारों का स्वामी व दाता मानकर उन्हें धन्यवाद देना चाहिए।

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