संन्यास: एक संन्यास-निष्ठ जीवन

Brother Anandamoy with new initiatesस्वामी आनंदमय गिरी (प्रथम पंक्ति, मध्य) नव दीक्षित स्वामी सन्न्यसिओं के साथ, स्वामी अचलानंद गिरी (बायीं ओर खड़े हुए) तथा स्वामी विश्वानंद गिरी (दाहिनी ओर खड़े हुए), एसआरएफ़ अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय, 2006

आज से सौ वर्ष पूर्व, जुलाई 1915 में, श्री श्री परमहंस योगानन्द ने संन्यास की प्राचीन स्वामी परंपरा में दीक्षा प्राप्त की थी, जब उन्होंने प. बंगाल के श्रीरामपुर में, अपने गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्‍वर से संन्यास ग्रहण किया। यह घटना बाईस वर्षीय मुकुन्द लाल घोष—जो उस समय स्वामी योगानन्द गिरि बन गये थे—के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। साथ ही अपनी स्थायी विरासत के एक अंग के रूप में उनके द्वारा स्थापित संन्यास परम्परा के कारण, 20वीं सदी और इसके बाद भी वैश्विक आध्यात्मिक जागरण पर पड़ने वाले उनके प्रभाव की यह पूर्वसूचना थी।

जिस प्राचीन स्वामी परम्परा से परमहंस योगानन्दजी संबन्धित थे, वह वर्तमान में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़ रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के मठवासी संन्यासियों के रूप में फल-फूल रही है। इसमें सारे विश्‍व के देशों से आये संन्यासी तथा संन्यासिनियाँ सम्मिलित हैं। यह संन्यास परम्परा वाईएसएस/एसआरएफ़ के वैश्विक विकास को कायम रखती है तथा सभी देशों में योग के विस्तृत प्रसार में सहायता करती है।

Brother Anandamoy with new initiatesस्वामी श्रद्धानंद गिरी गुरु शिष्य सम्बन्ध पर मातृ मंदिर, रांची में संन्यासियों को सत्संग देते हुए

उनके द्वारा स्थापित संन्यास परंपरा के बारे में समझाते हुए परमहंसजी ने लिखा है: “मेरे लिये, स्वामी संप्रदाय के संन्यासी के रूप में किसी भी सांसारिक बंधन में न बंधते हुए, इस तरह का पूर्ण त्याग ही अपना जीवन पूर्णत: ईश्‍वर को समर्पित करने की मेरे हृदय की प्रबल इच्छा का एकमात्र संभव समाधान था।…“एक संन्यासी के रूप में, मेरा जीवन ईश्‍वर की पूर्ण सेवा और उनके संदेश से हृदयों को आध्यात्मिक रूप से जागृत करने के लिये समर्पित है। जो लोग मेरे पथ का अनुसरण कर रहे हैं और जो योग साधना के ध्यान तथा कर्तव्यपरायणता के आदर्शों के माध्यम से ईश्‍वर की खोज एवं सेवा का पूर्ण त्याग का जीवन जीना चाहते हैं, उनके लिये मैंने आदि शंकराचार्य के संप्रदाय में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप/योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की संन्यास परंपरा प्रारम्भ की है, जिसमें मैंने अपने गुरु से संन्यास दीक्षा लेकर प्रवेश किया था। जो संगठनात्मक कार्य ईश्‍वर और मेरे गुरु तथा परमगुरुओं ने मेरे माध्यम से प्रारम्भ किया है उसे आगे बढ़ाया जा रहा है।…उन लोगों द्वारा जिन्होंने त्याग और ईश्‍वर प्रेम के उच्चतम उद्देश्यों के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया है।”

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“मेरा संन्यास ग्रहण: स्वामी संस्थान के अंतर्गत”

परमहंस योगानन्द द्वारा
(योगी कथामृत से उद्धरण)

“गुरुदेव! मेरे पिताजी मुझसे बंगाल-नागपुर रेलवे में एक अधिकारी का पद ग्रहण करने के लिये आग्रह करते रहे हैं। परंतु मैंने साफ मना कर दिया है।” फिर मैंने आशा के साथ आगे कहा: “गुरुदेव! क्या आप मुझे स्वामी परम्परा की संन्यास दीक्षा नहीं देंगे?” मैं अनुनयपूर्वक अपने गुरु [स्‍वामी श्रीयुक्तेश्‍वर गिरि] की ओर देखता रहा। विगत वर्षों में मेरे निश्चय की गहराई की परीक्षा लेने के लिये उन्होंने मेरे इसी अनुरोध को कई बार ठुकरा दिया था। परंतु आज अनुग्रहपूर्ण मुस्कान उनके मुखमंडल पर आ गई।

“ठीक है, कल मैं तुम्हें संन्यास दीक्षा दे दूँगा।” फिर शांत भाव से वे कहते गये: “मुझे खुशी है कि संन्यास ग्रहण करने की इच्छा पर तुम अटल रहे। लाहिड़ी महाशय प्राय: कहा करते थे: ‘अपने जीवन के वसंत में यदि तुम ईश्‍वर को आमंत्रित नहीं करोगे, तो तुम्हारे जीवन के शिशिर में वे तुम्हारे पास नहीं आयेंगे।’”

“प्रिय गुरुदेव! मैं आप ही की भाँति स्वामी परम्परा में शामिल होने की अपनी इच्छा को कभी नहीं छोड़ सकता था।” असीम स्नेह के साथ उनकी ओर देखते हुए मैं मुस्कराया।…

प्रभु को अपने जीवन में द्वितीय श्रेणी का स्थान देने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। वे ही तो समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं जो जन्म-जन्मांतर में मनुष्य पर वरदानों की वर्षा करते आ रहे हैं। और इस कृपावर्षा के बदले में मनुष्य उन्हें केवल एक ही चीज़ दे सकता है—अपना प्रेम, जो देने या न देने की उसे पूर्ण छूट है।…

अगला दिन मेरे जीवन का सबसे अविस्मरणीय दिन था। मुझे याद है कि कॉलेज से ग्रेज्यूएट होने के कुछ सप्ताह बाद ही, यह सन 1915 के जुलाई महीने का एक गुरुवार था। अपने श्रीरामपुर आश्रम के भीतर के एक बरामदे में श्रीयुक्तेश्‍वरजी ने एक श्‍वेत रेशमी वस्त्र को संन्यास धर्म के परंपरागत गेरुए रंग में डुबाया। जब वस्त्र सूख गया, तो मेरे गुरु ने उसे एक संन्यासी के वस्त्र के तौर पर मेरे बदन पर लपेट दिया।…

श्रीयुक्तेश्‍वरजी के चरणों में सिर नवाते हुए जब प्रथम बार उनके मुँह से अपना नया नाम सुना, तो मेरा हृदय कृतज्ञता से भर उठा। कितने प्रेमपूर्वक उन्होंने अथक परिश्रम किया था ताकि बालक मुकुन्द एक दिन स्वामी योगानन्द में परिणत हो सके! मैं आह्लादित होकर श्री शंकर (शंकराचार्य) के एक लंबे स्तोत्र के कुछ श्लोक गाने लगा:

मनोबुद्ध् यहंकारचित्तानि नाहं
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु:;
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्‌।
न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म:;
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम्‌ शिवोऽहम्‌।
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेंद्रियाणां;
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न बन्ध:
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम्‌ शिवोऽहम्।

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श्री श्री परमहंस योगानन्द जी, अपने हाथ उठा कर, अपने प्रिय शिष्य जेम्स जे लिन्न को आशीर्वाद देते हुए, जिनको उन्होंने तभी संन्यास दीक्षा प्रदान की थी, और संन्यास का नाम राजर्षि जनकानन्द रखा था; एसआरएफ़-वाईएसएस अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय, लॉस एंजेलिस, अगस्त 25, 1951

1920 में परमहंस योगानन्दजी के अमेरिका जाने से पहले, भारत से वहाँ पहुँचने वाले अन्य अग्रगामी स्वामीगणों, जैसे स्वामी राम तीर्थ एवं स्वामी विवेकानन्द, ने अमेरिका का कम समय के लिए दौरा किया था तथा पश्चिम में योग एवं वेदान्त पर व्याख्यान दिये थे। स्वामी विवेकानन्द एवं रामकृष्ण-वेदान्त सोसाइटी के उनके गुरु-भाइयों ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ पश्चिमी लोगों को व्यक्तिगत तौर पर संन्यास की दीक्षा भी दी थी। परंतु ये परमहंसजी थे जिन्होंने 20वीं सदी में संन्यासियों के प्रशिक्षण, उत्तराधिकार, तथा आश्रमों में एक से दूसरी पीढ़ी में प्रसारण की एक ऐसी व्यवस्थित प्रणाली विकसित की जैसी पहले कभी नहीं देखी गयी थी।

वास्तव में, क्रियायोग ध्यान के प्राचीन विज्ञान का पश्चिम तथा समग्र विश्‍व में प्रसार करने का परमहंसजी का विशिष्ट मिशन अमेरिका में उनके द्वारा किये गये स्वामी परम्परा के ऐतिहासिक विस्तार के साथ अभिन्न रूप से संबन्धित था। योगानन्दजी के क्रियायोग मिशन के संन्यास संप्रदाय की जड़ें उनके गुरु, स्वामी श्रीयुक्तेश्‍वर गिरि की, आधुनिक समय में क्रियायोग की गुरु-परम्परा के संस्थापक, महावतार बाबाजी, के साथ हुई मुलाक़ात तक जाती हैं। सदियों से लुप्त हो चुके क्रिया विज्ञान को जन-सामान्य को सिखाने की प्रक्रिया शुरू करने के उद्देश्य से, बाबाजी ने सर्वप्रथम लाहिड़ी महाशयजी को क्रियायोग की दीक्षा प्रदान की, जो कि एक गृहस्थ थे। 1894 के इलाहाबाद कुम्भ मेले में महावतार बाबाजी से मिलने तक, श्रीयुक्तेश्‍वरजी भी, अपने गुरु, लाहिड़ी महाशयजी की तरह ही, एक गृहस्थ थे (यद्यपि उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था)। श्रीयुक्तेश्‍वरजी ने उस मुलाक़ात का वर्णन इस प्रकार किया है:

Brother Anandamoy with new initiatesश्री दया माता जी मदर सेण्टर में 1970 में स्वामी श्यामानंद जी को संन्यास का गेरुआ वस्त्र ओढ़ाते हुए

“स्वामीजी, आपका स्वागत है,” बाबाजी ने अत्यंत प्रेम से कहा।

“मैं स्वामी नहीं हूँ, महाराज।” मैंने ज़ोर देते हुए कहा।

“ईश्‍वर की आज्ञा से मैं जिसे स्वामी की उपाधि प्रदान करता हूँ, वह कभी उस उपाधि का त्याग नहीं करता।” उस संत ने अत्यंत सरल भाव से मुझसे यह कहा परंतु उनके शब्दों में गहरा सत्य ध्वनित हो रहा था; मैं तत्क्षण आध्यात्मिक आशीर्वाद की लहरों में हिलोरें लेने लगा।

बाबाजी ने नये स्वामी से कहा: “अब से कुछ वर्षों बाद मैं आपके पास एक शिष्य भेजूँगा, जिसे आप पश्चिम में योग का ज्ञान प्रसारित करने के लिये प्रशिक्षित कर सकते हैं।” नि:संदेह, वह शिष्य परमहंसजी ही थे, जैसा कि बाद में स्वयं महावतार द्वारा परमहंसजी को बताया गया था। योगानन्दजी को उनके पास प्रशिक्षण के लिये भेजने से पहले, श्रीयुक्तेश्‍वरजी को स्वामी बनाकर बाबाजी ने इस प्रकार सुनिश्चित कर लिया कि पश्चिम एवं समग्र विश्‍व में क्रियायोग का मुख्य प्रसार भारत की प्राचीन संन्यास परम्परा के समर्पित संन्यासियों द्वारा ही किया जायेगा।

1925 में, लॉस एंजेलिस में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय की स्थापना करने के बाद परमहंसजी ने धीरे-धीरे ऐसे पुरुषों एवं महिलाओं को प्रशिक्षण के लिये स्वीकार करना प्रारम्भ किया जो अपना जीवन पूरी तरह से ईश्‍वर की खोज में समर्पित करने की अभिलाषा से आये थे। श्री दया माता, श्री ज्ञान माता, तथा अन्य पूरी तरह से समर्पित कुछ प्रारम्भिक शिष्यों के आने के साथ ही माउंट वाशिंगटन के शिखर पर बना आश्रम संन्यासियों के स्थिर रूप से बढ़ते परिवार का घर बन गया। इन संन्यासियों में उन्होंने संन्यास जीवन की वह भावना तथा वे आदर्श स्थापित किए, जिन्हें उन्होंने स्वयं अपनाया था तथा जिनका वे परिपूर्ण उदाहरण थे। गुरुदेव ने अपने निकटतम शिष्यों को—जिन्हें उन्होंने अपने मिशन की भावी ज़िम्मेदारी सौंपी थी—अपनी शिक्षाओं के प्रसार तथा उनके द्वारा विश्‍व भर में प्रारंभ किये गये आध्यात्मिक एवं मानव कल्याण के कार्यों को जारी रखने के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देश दिये। आज भी, वही आध्यात्मिक शिक्षायें एवं अनुशासन जो उन्होंने अपने जीवनकाल में आश्रमवासियों को दिया था, अपने पूर्ण रूप में संन्यासियों तथा संन्यासिनियों की नई पीढ़ी को हस्तांतरित किया जा रहा है।

Brother Anandamoy with new initiatesभारत में स्वामी संप्रदाय के वरिष्ठ आध्यात्मिक प्रमुख—पुरी के शंकराचार्य, स्वामी श्री भारती कृष्ण तीर्थ श्री दया माता के साथ सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय, लॉस एंजेलिस, मार्च 1958

इस प्रकार, परमहंस योगानन्द के माध्यम से, भारत की संन्यास की प्राचीन स्वामी परम्परा ने अमेरिका में गहरी और स्थायी जड़ें जमाईं। योग्य पश्चिमी लोगों को दीक्षा देने के अतिरिक्त, परमहंसजी ने परंपरागत प्रथा को एक और तरीके से भी संशोधित किया: उन्होंने महिलाओं तथा पुरुषों को समान रूप से संन्यास की पवित्र दीक्षा एवं आध्यात्मिक नेतृत्व के पद प्रदान किये, जो कि उनके समय में एक असाधारण प्रथा थी। वास्तव में, एसआरएफ़ के जिस प्रथम संन्यासी शिष्य को उन्होंने संन्यास की दीक्षा दी, वह एक महिला थी—श्री दया माता, जिन्होंने बाद में पचास से भी अधिक वर्षों तक वाईएसएस/एसआरएफ़ की आध्यात्मिक प्रमुख के रूप में अपनी सेवायें दीं।

श्री दया माता की अध्यक्षता के दौरान, भारत में स्वामी संप्रदाय के वरिष्ठ आध्यात्मिक प्रमुख—पुरी के शंकराचार्य, स्वामी श्री भारती कृष्ण तीर्थ—1958 में अपनी अभूतपूर्व तीन माह की अमेरिका यात्रा में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के अतिथि रहे। भारत के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब किसी शंकराचार्य ने पश्चिम की यात्रा की थी। संत सदृश शंकराचार्य के मन में श्री दया माता के प्रति अत्यधिक आदर था, और उन्होंने श्री दया माता को वाई.एस.एस./एस.आर.एफ़. के आश्रमों में परमहंस योगानन्दजी द्वारा बाबाजी के आदेश पर प्रारम्भ किये गये स्वामी संप्रदाय का आगे और विस्तार करने के लिये अपना औपचारिक आशीर्वाद प्रदान किया। भारत लौटने पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह वक्तव्य दिया: “मैंने सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप [योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया] में सर्वोच्च आध्यात्मिकता, सेवा, एवं प्रेम पाया। उनके प्रतिनिधि इन सिद्धांतों पर केवल प्रवचन ही नहीं देते हैं, बल्कि वे इनके अनुसार अपना जीवन भी जीते हैं।”

परमहंस योगानन्दजी के कार्य का विस्तार

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया के संन्यासी परमहंसजी के कार्य का विस्तार कई प्रकार से सेवा द्वारा कर रहे हैं—देश के कई भागों में भ्रमण द्वारा,शरद संगम में सत्संग दे कर, जनसाधारण को संबोधित करके, कार्यालय में काम द्वारा, तथा साधकों को अध्यात्मिक परामर्श द्वारा, इत्यादि।

Swamis Shantananda and Nityananda during prabhat pheri
स्वामी शांतानंदजी तथा स्वामी नित्यानंदजी गुरुग्राम केंद्र के उद्घाटन के अवसर पर प्रभात फेरी के समय
Swamis Krishnananda, Bhavananda and Smaranananda with Sri Sri Daya Mata
स्वामी कृष्णानन्द जी, स्वामी भावानन्द जी तथा स्वामी स्मरणानन्द जी, श्री श्री दया माता जी के साथ,माउंट वाशिंगटन, मदर सेण्टर पर
Swamis Shraddhananda, Suddhananda, Lalitananda, Smaranananda,  Madhavananda and Ishwarananda
ऊपर दाहिने से क्रम में, स्वामी श्रद्धानंद जी, स्वामी शुद्धानंद जी, स्वामी ललितानंद जी, स्वामी स्मरणानन्द जी, स्वामी माधवानंद जी तथा स्वामी इश्वारानंद जी नए प्रशासनिक भवन, ‘सेवालय’ के समर्पण के अवसर पर, रांची मार्च 2015
स्वामी श्रद्धानंद जी भक्तों के एक समूह को आध्यात्मिक परामर्श देते हुए
स्वामी शुद्धानंद जी (दाहिने) तथा स्वामी इश्वारानंद जी (मध्य) SRF से भ्रमण पर आए संन्यासी बंधुओं के साथ

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के आश्रमों में सामुदायिक जीवन में आत्मीय बंधुओं के साथ आनंदमय संगति के कई अवसर मिलते हैं।

स्वामी निर्वाणानन्द जी द्वाराहाट आश्रम में अभावग्रस्तों को सौर्य लैंप प्रदान करते हुए
स्वामी कृष्णानंद जी कुम्भ मेले, हरिद्वार में प्रभात फेरी का नेतृत्त्व करते हुए

आमंत्रण

अविवाहित पुरुष जो पारिवारिक दायित्वों से मुक्त हैं, और जिन्हें स्वयं को, ईश्वर की खोज और योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के संन्यास समुदाय में एक संन्यासी के रूप में सेवा हेतु, समर्पित करने की इच्छा है, उन्हें वाईएसएस मुख्यालय से संपर्क करने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

जो वाईएसएस आश्रमों में दैनिक जीवन में रुचि रखते हैं वे Monastic Order page को देखें।

 “सर्वप्रथम ईश्‍वर, सदैव ईश्‍वर, केवल ईश्‍वर”

श्री श्री मृणालिनी माता
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की संघमाता तथा अध्यक्ष द्वारा एसआरएफ़ के संन्यासी एवं संन्यासिनियों के लिए दिए गए सत्संग की टिप्पणी से उद्धृत

प्रिय आत्मन्, पिछले कुछ वर्षों में हमारे दिव्य गुरु की योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप को इतनी तीव्रता से बढ़ते हुए देखा है; उसके कार्य का विस्तार एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। हम अपने गुरुदेव के शब्दों को बार-बार याद करते हैं जो उन्होंने अनेक वर्ष पूर्व कहे थे जब हम संन्यासी के रूप में अपना जीवन समर्पित करने आए थे: “जब मैं अपने शरीर का त्याग करूँगा तब यह संस्था मेरा शरीर होगी, तुम सब लोग मेरे हाथ-पाँव एवं वाणी होगे।” समर्पण का यह जीवन कितना पवित्र अवसर है और कितना मुक्तिप्रदायक अनुभव है। प्रत्येक, जो हृदय से इसे अपनाता है वह गुरुदेव के अस्तित्व के प्रकाशमान परमाणु के समान हो जाता है। हर कोई एक आवश्यक योगदान संस्था को करता है, जिसके द्वारा गुरुदेव की संस्था निरंतर उनके दैवी प्रेम की भावना में दूसरों तक पहुँच सके।

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संसार आध्यात्मिक गुणों एवं नैतिकता को बिलकुल खो चुका है। जो लोग संन्यास का पथ चुनते हैं वे अपनी आत्मा की इच्छानुसार तथा सामान्य भौतिक प्रतिमान से ऊपर उठकर जीवन जीते हैं। यद्यपि तुलनात्मक रूप से कुछ लोग ही संन्यास लेते हैं फिर भी ऐसे लोग दूसरों के समक्ष उच्चतर मूल्यों को प्रस्तुत करते हुए अनुशासित जीवन जीते हैं। जो केवल ईश्‍वर को जीवन अर्पित करते हैं, उसकी पवित्रता से कुछ अलग व विशेष अनुभव करते हैं। सादगी के व्रत का पालन, आज्ञाकारिता, शुचिता, निष्ठा, ध्यान में सतत लगन और विनम्रतापूर्वक प्रगति करने का प्रयास जैसे गुण साधक में आश्चर्यजनक बदलाव लाते हैं। यहाँ तक कि उसके शरीर का भी आध्यात्मीकरण हो जाता है। दूसरे लोग इस विषय में कुछ कह नहीं पाते हैं परन्तु वे इस साधक के आभामंडल को अनुभव करते हैं जो उन्हें उन्नत करता है और ईश्‍वर के बारे में बताता है। विनम्र साधक इसका दिखावा नहीं करता है; यह भी संभव है कि इसके विषय में वह जानता ही न हो।

अपने को आध्यात्मिक पथ पर समर्पित करने से उच्च कोई कार्य नहीं, न ही इससे महान् कोई सफलता है जिसे हासिल किया जा सकता हो और न ही अनन्त की दृष्टि में इससे अधिक कोई यश प्राप्त कर सकता है। इस पथ पर जो सफल है, जो अपनी आत्मा से सेवा करता है, ईश्‍वर व गुरु के सामंजस्य के साथ चुपचाप अनजाने ही संसार के हज़ारों लोगों को परिवर्तित कर देता है। एक दिन ईश्‍वर के समक्ष वह पीछे मुड़के देखकर कह सकता है, “अरे! जगन्माता और गुरुदेव ने इस तुच्छ जीवन के साथ क्या कर दिया!” इन अनेक वर्षों में गुरुदेव के कार्य की प्रगति इसी कारण है कि उनके आध्यात्मिक परिवार में ऐसे लोग हैं—संन्यासी समुदाय के साथ-साथ अनेक गृहस्थ भक्त भी हैं—जिन्होंने गुरुजी की शिक्षाओं और आदर्शों के अनुकूल जीवन्त उदाहरण बनने के लिए जीवन अर्पित कर दिया।

गुरुदेव योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का जीवन और हृदय हैं। उनके आदर्श, उनकी चेतना को हम लोग अपने आश्रम के दैनिक जीवन में अपने अन्दर उतारते हैं। गुरुदेव के संन्यासी और संन्यासिनी अपने आचरण, विचार एवं संपूर्ण चेतना में यही सीखते हैं कि भले ही उनके कर्त्तव्य उन्हें कहीं भी क्यों न ले जाएँ परन्तु उन्हें सदा याद रहे: “मैंने स्वयं को एक आदर्श के लिए समर्पित कर दिया है, वही मापदण्ड जो मेरे गुरु में है: सर्वप्रथम ईश्‍वर, सदैव ईश्‍वर, केवल ईश्‍वर।” वह भक्त जिसका जीवन सचमुच गुरुजी के आदर्शों के लिए समर्पित है; उसे गुरुजी का आशीर्वाद सदैव प्राप्त है, जिसको वे सबकी सेवा के लिए माध्यम बना कर प्रयुक्त कर सकते हैं। उसके जीवन के द्वारा वे ईश्‍वर प्रेम को, समझदारी व पोषण को, जीसस की क्षमा को, श्रीकृष्ण के ज्ञान को, व अन्य दैवी गुणों को जिन्हें उन्होंने अत्यन्त सुन्दरता व प्रसन्नता से अपने निजी जीवन में अभिव्यक्त किया है, व्यक्त करवा सकते हैं। हम सब लोग अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि हमें उनके द्वारा स्थापित किए गए आश्रमों में सुअवसर उपलब्ध हैं न केवल अपनी मुक्ति के लिए साधना करके, परन्तु ऐसा प्रयास करके उस दैवी व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने के लिए जिसे गुरुदेव ने सब की मुक्ति एवं मानवता के उन्नयन हेतु प्रस्तुत किया है।

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