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विश्वास और समर्पण — अनंत प्रेम का मार्ग

(वाईएसएस संन्यासी द्वारा आध्यात्मिक प्रवचन)

रविवार, 23 मार्च, 2025

सुबह 11:00 बजे

– दोपहर 12:00 बजे

(भारतीय समयानुसार)

कार्यक्रम के विवरण

विश्वास एक ऐसे ईश्वर को प्रकट करता है जो कि अत्यंत घनिष्ठ रूप से हमारे निकट हैं, हमारे हृदय की धड़कन के ठीक पीछे, एक ईश्वर जो प्रार्थना के प्रत्येक शब्द को सुनते हैं। उनकी आँखें एवं कान सर्वव्यापी हैं, उनकी चेतना प्रत्येक विशिष्ट विचार तथा परिस्थिति से समस्वर है। जब उन्हें पूरे विश्वास से पुकारा जाए, तो वे योग्य समय पर प्रत्येक सच्ची प्रार्थना का प्रत्युत्तर देंगे — कोई सोच सके उससे भी अधिक तीव्र गति से।

— परमहंस योगानन्द

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया के संन्यासी स्वामी आद्यानन्द गिरि द्वारा “विश्वास और समर्पण — अनंत प्रेम का मार्ग” विषय पर प्रवचन रविवार, 23 मार्च को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे (भारतीय समयानुसार) तक नोएडा आश्रम में आयोजित किया गया।

स्वामी आद्यानन्द ने इस प्रेरणादायक प्रवचन में, परमहंस योगानन्दजी की शिक्षाओं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बताया कि हम प्रोत्साहन और दृढ़ संकल्प के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे कर सकते हैं, और अपने दैनिक जीवन में आने वाली विभिन्न चुनौतियों को अपने व्यक्तिगत आध्यात्मिक विकास के अवसरों के रूप में देख सकते हैं। इस प्रवचन में विश्वास को समर्पण के आधार के रूप में केन्द्रित किया। वे इच्छाओं तथा पसंद-नापसंद के समर्पण पर चर्चा करते हुए योगानन्दजी के मार्गदर्शन की ओर संकेत करते हैं, कि ध्यान में, हमारे दैनिक जीवन में, हमारे कार्यों में समर्पण की गुणवत्ता का अभ्यास करने के लिए इच्छाशक्ति और विवेक का उपयोग कैसे किया जाए, तथा अपने कार्यों, अपने विचारों, अपने अहंकार और अपने पूरे अस्तित्व के फलों को ईश्वर और गुरु को अर्पित करना कैसे सीखा जाए। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे परीक्षाओं और कठिनाइयों के समय गुरु के मार्गदर्शन में प्रेमपूर्ण और भक्तिपूर्ण समर्पण हमें हमारे आध्यात्मिक मार्ग पर दिव्य प्रेम और अनंत आशीर्वाद की ओर ले जाता है।

हिन्दी में यह प्रवचन वाईएसएस नोएडा आश्रम से लाइव-स्ट्रीम किया गया।

नए आगंतुक

परमहंस योगानन्दजी और उनकी शिक्षाओं के बारे में और अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर जाएँ :

ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी

विश्वभर में एक आध्यात्मिक उत्कृष्ट कृति के रूप में सराही जाने वाली इस पुस्तक के विषय में परमहंसजी प्रायः कहा करते थे, “जब मैं चला जाऊँगा यह पुस्तक मेरी सन्देशवाहक होगी।”

वाईएसएस पाठमाला

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