हमारी आध्यात्मिक साधना में गुरु की भूमिका

श्री श्री परमहंस योगानन्द के लेखन के अंश

गुरु की भूमिका

गुरु गीता (श्लोक 17) गुरु की सही ढंग से व्याख्या करती है। “अन्धकार हटाने वाला” (गु, “अन्धकार” तथा रु, “हटाने वाला”)। एक सच्चा, ईश्वर प्राप्त गुरु वह होता है, जिसने आत्मनियंत्रण की उपलब्धि करने में सर्वव्यापी ब्रह्म के साथ एकरूपता प्राप्त कर ली है। ऐसा व्यक्ति विशेष रूप से किसी साधक को उसकी पूर्णता की ओर आन्तरिक यात्रा में सहायता प्रदान करने में समर्थ होता है।

“एक अंधा दूसरे अंधे को रास्ता नहीं दिखा सकता” परमहंसजी ने कहा। “केवल एक गुरु (सिद्ध पुरुष), जो ईश्वर को जानता है, दूसरों को सही ढंग से ईश्वर के प्रति शिक्षा दे सकता है। व्यक्ति को अपनी दिव्यता को पुनः पाने के लिए एक ऐसा ही सद्गुरु चाहिए। जो निष्ठापूर्वक सद्गुरु का अनुसरण करता है वह उसके समान हो जाता है, क्योंकि गुरु अपने शिष्य को अपने ही स्तर तक उठने में सहायता करता है।”

गुरु शिष्य सम्बन्ध मित्रता की उच्चतम अभिव्यक्ति है – क्योंकि यह नि:शर्त दिव्य प्रेम और बुद्धिमता पर आधारित होता है। यह सभी सम्बन्धों में सबसे उन्नत एवं पवित्र होता है। क्राइस्ट और उनके शिष्य ब्रह्म के साथ एक थे, जैसे कि मेरे गुरु (स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी) और मैं और वे सभी जो मेरे साथ समस्वर हैं, ईश्वर के दिव्य प्रेम के बंधन में बंधे होने के कारण….वह जो भी इस प्रकार के सम्बन्धों में भागीदार है बुद्धिमानी और मोक्ष की ओर बढ़ रहा है।

दैवीय खोज में सफल होने के लिए, जैसा कि जीवन के हर पहलू में होता है, ईश्वरीय नियमों का पालन करना अनिवार्य है। विद्यालय में उपलब्ध धर्मनिरपेक्ष ज्ञान को समझने के लिए तुम्हें उस शिक्षक से सीखना होगा जो उस विषय का ज्ञाता हो। उसी प्रकार आध्यात्मिक तथ्यों को समझने के लिए ईश्वर प्राप्त गुरु या आध्यात्मिक शिक्षक का होना आवश्यक है।

जब तुम जीवन की घाटी में से दृष्टिहीन, अंधेरे में ठोकर खाते हुए, आगे बढ़ रहे हो तब तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति की सहायता चाहिए जो देख सकता हो। तुम्हें एक गुरु की आवश्यकता होती है। संसार में फैली हुई अव्यवस्था से बाहर आने के लिए किसी प्रबुद्ध व्यक्ति का अनुसरण ही केवल एक रास्ता है। अपने गुरु को मिलने से पहले मैंने कभी भी सच्ची प्रसन्नता और स्वतंत्रता को नहीं पाया। मेरे गुरु मुझ में आध्यात्मिक तौर पर रुचि रखते थे और मेरा मार्गदर्शन कर पाने में समर्थ थे।

अपने हृदय से ईश्वर को निरंतर पुकारो। जब आप ईश्वर को यह विश्वास दिला देते हैं कि आप केवल उनके लिए लालायित हैं, तो वह आपके पास आपके गुरु को भेजते हैं जो आपको सिखाता है कि ईश्वर को कैसे जाना जाए। केवल वही जो ईश्वर को जानता है दूसरों को भी उसे जानना सिखा सकता है। जब मैंने ऐसे व्यक्ति को पाया, अपने गुरु श्री युक्तेश्वर जी को, तब मुझे समझ आया कि ईश्वर रहस्यमय तरीके से नहीं बल्कि उन्नत आत्माओं द्वारा सिखाते हैं। ईश्वर अदृश्य हैं किन्तु जो उनके साथ निरंतर संपर्क में है, उनकी बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिक अनुभवों के द्वारा वह दृष्टिगोचर होते हैं। किसी के जीवन में बहुत से शिक्षक हो सकते हैं, पर गुरु केवल एक ही होता है। गुरु शिष्य सम्बन्ध में एक दैवी नियम परिपूर्ण होता है जैसा कि जीसस के जीवन में भी दर्शाया गया है जब उन्होंने बैप्टिस्ट यूहन्ना को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया।

जिसे ईश्वर साक्षात्कार प्राप्त है और जिसे स्वयं ईश्वर ने आत्माओं को मुक्त कराने का आदेश दिया है, केवल वही गुरु है। केवल ‘मैं गुरु हूं’ यह सोचकर कोई गुरु नहीं बन सकता। जीसस ने कहा था कि सच्चा गुरु केवल ईश्वर द्वारा निर्देशित होता है, जब उन्होंने कहा कि “जिस परमपिता ने मुझे भेजा है उनके लाए बिना कोई मनुष्य मेरे पास नहीं आ सकता।” जीसस ने सारा श्रेय ईश्वरीय शक्ति को दिया। यदि कोई शिक्षक अहंकाररहित है, तो आप जान लें कि केवल ईश्वर उस गुरु के देह मन्दिर में वास करते हैं; और जब आप ऐसे गुरु के साथ तादात्मय बिठा लेते हैं तब आप ईश्वर के साथ अपना तादात्मय बिठा लेते हैं। जीसस अपने शिष्यों से बार-बार कहते थे “जो मुझे स्वीकार करेगा, वह मुझे नहीं बल्कि उसे स्वीकार करेगा जिसने मुझे भेजा है।”

जो गुरु लोगों की पूजा स्वयं स्वीकार करता है वह केवल अपने अहंकार का पुजारी है। कोई मार्ग सच्चा है या नहीं, यह जानने के लिए देखिए कि किस प्रकार का गुरु उस के पीछे है, कि उसके व्यवहार से क्या ऐसा लगता है कि वह भगवान द्वारा निर्देशित है, या केवल अपने अहंकार द्वारा निर्देशित है। जो गुरु ईश्वर प्राप्त नहीं है ईश्वर का साम्राज्य नहीं दिखा सकता, चाहे उसके कितने भी अनुयायी हों। सभी चर्चों ने अच्छा कार्य किया है,परन्तु धार्मिक अन्धविश्वास मनुष्यों को आध्यात्मिक रूप से अज्ञानी व प्रवाहहीन बनाता है। कई बार मैंने विशाल जनसमूहों को ईश्वर का गुणगान करते देखा पर ईश्वर उनकी चेतना से ऐसे दूर थे जैसे कि आकाश में तारे। केवल चर्च जाने भर से किसी का कल्याण नहीं हो सकता। स्वतंत्रता का सही मार्ग योग में निहित है, वैज्ञानिक आत्म-विश्लेषण में, और उसके अनुसरण में जिसने धर्मशास्त्र रूपी वन पार कर लिया है और तुम्हें सुरक्षित ईश्वर तक पहुँचा सकता है।

सत्य की जीवंत मूर्ति

ऐसा गुरु, जो लोगों की गहरी प्रार्थनाओं के उत्तर में उनकी सहायतार्थ ईश्वर द्वारा नियुक्त किया गया हो, कोई साधारण शिक्षक नहीं होता; बल्कि वह एक मानव रूपी माध्यम है जिसके शरीर, वाणी, मन तथा आध्यात्मिकता को ईश्वर भटकी हुई आत्माओं को वापस अपने परमधाम की ओर आकर्षित एवं मार्गदर्शित करने के लिए प्रयोग करते हैं। प्रारम्भ में हम सत्य को जानने की अपनी अस्पष्ट इच्छा द्वारा अनेक शिक्षकों से मिलते हैं। परन्तु एक गुरु शास्त्र-सम्मत सत्य की जीवन्त मूर्ति तथा मुक्ति का दूत होता है जिसे एक भक्त की, भौतिक बन्धनों से मुक्ति की निरन्तर याचनाओं के उत्तर में, ईश्वर नियुक्त करते हैं।

सत संगति, संतों का साथ और ईश्वर के दूतों के प्रति भक्तिभाव माया के भ्रम को नष्ट कर देता है। संतों के विचार मात्र से ही माया का पर्दा हटने में आपकी सहायता होती है। माया का पर्दा व्यक्तिगत संपर्क से अधिक ईश्वर के दूत के साथ मानसिक रूप से समस्वर होने से हटता है। सच्चे गुरु के मन में दूसरों के हृदय पर शासन करने की नहीं बल्कि उनकी चेतना में ईश्वर की चेतना जागृत करने की अभिलाषा होती है। मेरे गुरु (स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी) वैसे ही थे — वह कभी अपना बड़प्पन नहीं दिखाते थे। यदि आश्रम में किसी को मान्यता व उच्च पद प्राप्त करने की चाह होती, गुरुजी वह पद उसे दे देते थे। परन्तु मुझे उनके हृदय में स्थान चाहिए था, जहां दैवी चेतना का साम्राज्य था; परिणामस्वरुप, वह सदा मेरे हृदय में बसे हुए हैं। इस तरह की समस्वरता महापुरुषों के साथ होनी चाहिए।

मेरे गुरु ने मुझे कहा था, “मैं अब से अनन्तकाल तक तुम्हारा मित्र रहूँगा चाहे तुम निम्नतम मानसिक स्तर पर रहो अथवा ज्ञान के उच्चतम स्तर पर, यदि तुम भूल भी करोगे तो भी मैं तुम्हारा मित्र बना रहूँगा, क्योंकि उस समय तुमको मेरी मित्रता की, किसी अन्य समय की अपेक्षा अधिक आवश्यकता होगी।”

जब मैंने अपने गुरु की बिना शर्त मित्रता को स्वीकार कर लिया तो उन्होंने कहा, “क्या तुम भी मुझे वह निःस्वार्थ प्रेम दोगे?” उन्होंने एक बच्चे की भाँति विश्वास करते हुए मेरी ओर देखा।

“गुरुदेव, मैं आपसे अनन्त काल तक प्रेम करूँगा!”

“साधारण प्रेम स्वार्थी होता है, जो गहरी अज्ञानता के कारण इच्छाओं तथा सन्तुष्टियों में सुदृढ़ है। दिव्य प्रेम में कोई शर्त, कोई सीमा, कोई परिवर्तन नहीं होता। मानव हृदय की चंचलता पवित्र प्रेम के स्तम्भनकारी स्पर्श से सदा के लिए समाप्त हो जाती है।” उन्होंने नम्रतापूर्वक कहा, “यदि तुम कभी मुझे ईश्वरानुभूति की अवस्था से गिरते हुए पाओ तो कृपया मेरे सिर को अपनी गोद में रखकर मुझे वापस उस परम प्रियतम के पास लाने की सहायता का वचन दो जिसे हम दोनों पूजते हैं।”

हमारी यह आध्यात्मिक सन्धि हो जाने के पश्चात् ही मैं एक शिष्य के लिए एक गुरु का महत्त्व पूर्णरूप से समझने लगा। जब तक मैंने अपने गुरु की दिव्य चेतना के साथ बिना शर्त, निष्ठा तथा भक्ति से अन्तर्सम्पर्क नहीं किया, मैंने पूर्ण सन्तुष्टि, सुख तथा ईश्वर सम्पर्क कदापि नहीं पाया।

सर्वोत्तम दाता

संसार से ईश्वर केवल अपने प्रबुद्ध भक्तों के माध्यम से ही बोलते हैं। इसलिए, सबसे बुद्धिमता का कार्य ऐसे गुरु की इच्छा के साथ अन्तर्सम्पर्क में हो जाना है जिसे ईश्वर ने आपकी आत्मा की पुकार के प्रत्युत्तर में आपके पास भेजा है। स्वघोषित गुरु, गुरु नहीं होता है, इसलिए गुरु वह है जिसे ईश्वर दूसरों को उनके पास वापस लाने के लिए कहते हैं। जब थोड़ी-सी आध्यात्मिक इच्छा होती है, तो ईश्वर आपको और अधिक प्रेरित करने के लिए पुस्तकें तथा शिक्षकों को भेजते हैं, और जब आपकी इच्छा प्रबल हो जाती है, तो वे एक सद्गुरु को भेज देते हैं।…

ऐसे भी शिक्षक होते हैं जो सदा अपने अनुयायियों से आशा रखते हैं, कि वे उनके ही इशारे पर नाचें, तुरन्त आज्ञापालन के लिए तैयार रहें; और यदि वे ऐसा नहीं करते, तो शिक्षक नाराज़ हो जाते हैं। परंतु एक आध्यात्मिक शिक्षक, जो ईश्वर को जानता है और वास्तव में एक सद्गुरु है, वह स्वयं को एक शिक्षक के रूप में बिल्कुल नहीं सोचता। वह प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर की विद्यमानता को देखता है, और यदि कुछ शिष्य उसकी इच्छाओं की अवहेलना करते हैं तो वह बुरा नहीं मानता। हिन्दू धर्मशास्त्र कहते हैं कि जो भक्त एक सद्गुरु के ज्ञान के साथ अपना अन्तर्सम्पर्क कर लेते हैं, गुरु के द्वारा उनकी सहायता करना संभव हो जाता है। “हे अर्जुन! तू (गुरु के द्वारा प्राप्त) उस ज्ञान को समझ कर फिर दोबारा मोह में नहीं पड़ेगा।”

गुरु और शिष्य के बीच मित्रता शाश्वत होती है। जब कोई शिष्य गुरु के प्रशिक्षण को स्वीकार कर लेता है, तो उसमें पूर्ण समर्पण होता है, कोई बाध्यता नहीं होती।

Sri Yukteswar and Paramahansa Yogananda

मुझे कोई भी सम्बन्ध इस संसार में इतना महान नहीं लगा जितना मेरा अपने गुरु के साथ था। गुरु शिष्य सम्बन्ध प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है। मैं एक बार उनके आश्रम को छोड़कर चला गया, यह सोचकर कि मैं अधिक सफलतापूर्वक हिमालय में ईश्वर को खोज पाऊंगा। मैं गलत था; और मुझे शीघ्र ही पता चल गया कि मैंने गलती की है। फिर भी जब मैं लौटा उन्होंने ऐसे दिखाया जैसे मैं कभी गया ही नहीं था। डांट डपटने की जगह, स्वभाविक तरीके से स्वागत किया और शांति से कहा, “चलो देखें सुबह के भोजन में क्या बनेगा।”

“लेकिन गुरुदेव,” मैंने कहा, “क्या मेरे चले जाने से आप नाराज़ नहीं हैं?”

“मैं क्यों नाराज़ होऊंगा?” उन्होंने कहा। “मैं दूसरों से कोई अपेक्षा नहीं रखता, अतः उनके कार्य मेरी इच्छाओं के विरुद्ध नहीं हो सकते। मैं तुम्हारा अपने लाभ के लिए प्रयोग नहीं करूँगा; मैं केवल तुम्हारी सच्ची प्रसन्नता में ही प्रसन्न हूँ।”

जब उन्होंने ऐसा कहा, तो मैं उनके चरणों पर गिर कर रो पड़ा, “पहली बार कोई है जो मुझसे सचमुच प्रेम करता है!”…

जबकि मैं ईश्वर को खोजने के लिए आश्रम से भाग गया था फिर भी उनका प्रेम मेरे लिए पहले जैसा ही था। उन्होंने मुझे डांटा भी नहीं….मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि कोई मेरा इतना हितैषी हो सकता है। वह केवल मुझसे मेरे लिए प्रेम करते थे। वह मुझमें निपुणता चाहते थे। वह मुझे सम्पूर्ण रूप से प्रसन्न देखना चाहते थे। वही उनकी खुशी थी। वह चाहते थे कि मैं ईश्वर को जान सकूं; जगन्माता के साथ तादात्मय में हो जाऊं जिसके लिए मेरा हृदय लालायित था।

क्या यह दिव्य प्रेम नहीं था जो उन्होंने मेरे प्रति अच्छाई और प्रेम के रास्ते पर निरंतर मार्गदर्शन करते हुए व्यक्त किया? जब इस प्रकार का प्रेम गुरु शिष्य के बीच में विकसित होता है तब शिष्य के मन में गुरु के साथ चालाकी करने की इच्छा नहीं होती न ही गुरु शिष्य पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। सर्वोत्तम तर्क और निश्चय उनके सम्बन्धों को आगे ले जाते हैं; इस प्रकार का प्रेम कहीं नहीं है। और ऐसा स्वाद मैंने अपने गुरु के प्रेम में चखा था।

“गुरु एक जागृत ईश्वर है, जो शिष्य के भीतर सुप्त ईश्वर को जगा रहा है।” कितना सुंदर है न यह? “दया तथा गहन अंतर्दृष्टि द्वारा एक सद्गुरु शारीरिक, मानसिक, तथा आध्यात्मिक रूप से अभावग्रस्त व्यक्तियों में ईश्वर को दुःख भोगते हुए देखता है, और इसीलिए उनकी सहायता करना वह अपना आनंददायक धर्म मानता है। वह दरिद्रों के रूप में भूखे भगवान को भोजन देना, अज्ञानियों के रूप में निद्राग्रस्त ईश्वर को जगाना, शत्रुओं के रूप में अचेतन ईश्वर को प्रेम करना, तथा जिज्ञासु साधक के रूप में अर्ध-सुषुप्त ईश्वर को जगाने की चेष्टा करता है। और विकसित साधकों के रूप में लगभग पूर्ण जाग्रत ईश्वर को प्रेम के मृदु स्पर्श से वह तत्काल जगा देता है। गुरु ही, सभी मनुष्यों में सर्वोत्तम दाता है। ईश्वर के समान ही, उनकी उदारता की भी कोई सीमा नहीं।”

गुरु का वचन

जो योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया के पास वास्तव में आन्तरिक आध्यात्मिक सहायता प्राप्त करने के लिए आए हैं, वे ईश्वर से वांछित फल प्राप्त कर लेंगे। चाहे वे मेरे जीवन काल में आएँ, अथवा बाद में, योगदा सत्संग गुरुओं की परम्परा के माध्यम से ईश्वर की शक्ति भक्तों में उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी, तथा उनके मोक्ष का कारण बनेगी…

सभी साधक जो योगदा सत्संग की शिक्षाओं के अभ्यास में नियमित तथा निष्ठावान हैं वे अपना जीवन पवित्र तथा रूपान्तरित होता हुआ पाएँगे। इस मार्ग के सच्चे साधक अपनी दृढ़ता तथा स्थिरता के द्वारा मोक्ष प्राप्त करेंगे। योगदा सत्संग की प्रविधियों एवं शिक्षाओं में योगदा सत्संग गुरुओं की परम्परा की सहायता तथा आशीर्वाद निहित है जो साधक योगदा सत्संग के सिद्धान्तों के अनुसार अपने जीवन को संचालित करेंगे वे योगदा सत्संग गुरु-परम्परा के गुरुओं के परोक्ष तथा अपरोक्ष मार्गदर्शन का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। अमर बाबाजी ने सभी सच्चे योगदा सत्संग/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन साधकों की प्रगति की रक्षा तथा मार्गदर्शन करने का वचन दिया है। लाहिड़ी महाशय और स्वामी श्रीयुक्तेश्वर, जो अपने भौतिक शरीर छोड़ चुके हैं; तथा मैं स्वयं, शरीर छोड़ने के बाद भी सभी योगदा सत्संग/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के सच्चे सदस्यों की सदा रक्षा तथा मार्गदर्शन करेंगे।

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ईश्वर नें तुम्हें मेरे पास भेजा है, और मैं तुम्हें पराजित नहीं होने दूंगा।…मेरे जाने के पश्चात् भी, यदि वे समस्वर रहें, तो सारे संसार में भक्तों को मेरी सहायता मिलती रहेगी। ऐसा कभी मत सोचें कि जब मैं यहाँ से भौतिक रूप से अनुपस्थित हूँ, मैं आपके साथ नहीं हूँ। मैं शरीर छोड़ने के बाद भी उतनी ही गहराई से आपकी आध्यात्मिक उन्नति के प्रति चिंतित रहूँगा जितना मैं अब हूँ। मैं सदा आप सब पर दृष्टि रखूंगा, और जब भी कोई सच्चा भक्त अपनी आत्मा की गहराई में मुझे याद करेगा, वह जान जायेगा कि मैं निकट ही हूँ।

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