सुख-समृद्धि की चेतना का सृजन करना

परमहंस योगानन्दजी की ज्ञान-विरासत से उद्धरण
योगदा सत्संग पत्रिका जुलाई – सितम्बर 2009 के एक लेख से कुछ अंश “सुख-समृद्धि की चेतना का सृजन करना” अच्छे और बुरे समयों में आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले प्रचुरता के नियम को क्रियान्वित करने के नौ आध्यात्मिक सिद्धांत।

विश्व के लिए ईश्वर की योजना समृद्धि और आनन्द की है
सांसारिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि रीत, अर्थात दिव्य नियम, या प्राकृतिक विधान की संरचनात्मक अभिव्यक्ति है…

परमसत्य की गहराईयों का अनुभव कर पाने वाले हर सन्त ने एक दिव्य ब्रह्माण्डीय योजना के बारे में बताया है, और यह भी बताया है कि यह अति सुन्दर तथा आनन्द से परिपूर्ण है।

ईश्वर के विधान के अनुसार, और इस पर आधारित ईसाई सम्प्रदाय के भाईचारे के नियम के अनुसार, समस्त मानव जाति को आश्रय देने एवं उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के उद्देश्य से इस पृथ्वी की रचना की गई थी खदानों की सम्पदा को, एवं अन्य संसाधनों को एक समान परिश्रम करने वाले लोगों के मध्य बराबर-बराबर बाँटा जाना इस विधान के अंतर्गत था। तथा ईश्वर ने दिव्य जन्मसिद्ध अधिकार का नियम स्थापित किया : वह यह कि चूँकि सभी नर एवं नारी ईश्वर के प्रतिरूप बनाए गए हैं, इस कारण वे वस्तुतः दिव्य हैं; और एक ही माता-पिता, अर्थात आदम और हौवा के वंशज होने के कारण सभी राष्ट्रों में एक ही रक्त वह रहा है।

यदि आप इस आधारभूत सम्बन्ध में विश्वास करते हैं, यदि आप विभिन्न बाह्य राष्ट्रीयताओं के बीच कोई आन्तरिक भेद जाने बिना संसार के सभी निवासियों के प्रति वैसा ही प्रेम अनुभव करते हैं। जैसा आप अपने परिवार के प्रति महसूस करते हैं, तो आप पृथ्वी की संपदा में अपने हिस्से के प्रति एक विधि-संगत दिव्य अधिकार स्थापित करते हैं।

जो लोग केवल अपने लिए ही सुख-समृद्धि पाना चाहते हैं, उन्हें अंततः दरिद्रता या मानसिक अशान्ति से पीड़ित होना ही पड़ता है परन्तु जो लोग समस्त जगत् को अपने ही घर के रूप में देखते हैं, और जो वास्तव में जन-समूह या संसार की सुख-समृद्धि की करते हैं, तथा उसके लिए काम करते हैं, वे उन सूक्ष्म शक्तियों को क्रियान्दित करते हैं जो उन्हें अंततः उस स्थान पर पहुँचा देती है जहाँ वे उस व्यक्तिगत सुख-समृद्धि को पा सकते हैं जो विधि-संगत रूप से उनकी है। यह एक अचूक एवं गुप्त विधान है।

कोई व्यक्ति सुखी और समृद्ध बन पाता है या नहीं, यह केवल उसके रचनात्मक सामर्थ्य पर ही निर्भर नहीं करता, अपितु उसके पूर्व कर्मों तथा कार्य-कारण के सूक्ष्म नियम को क्रियान्वित करने के लिए किए जा रहे उसके वर्तमान प्रयासों पर भी निर्भर करता है। यदि समूची मानव-जाति निःस्वार्थता से आचार-व्यवहार करे, तो कार्य-कारण के नियम की शक्ति बिना किसी अपवाद के सभी में समान रूप से सुख-समृद्धि बिखेर देगी। जो लोग अपने प्रबल सद्विचारों तथा सद्कर्मों द्वारा इस सूक्ष्म शक्ति को सकारात्मक सम्पन्नता का सृजन करने के लिए जाग्रत करते हैं, वे जहाँ कहीं भी जाते हैं सफलता पाते हैं, फिर चाहे वे सुख-समृद्ध परिवेशों में हों या चाहे दरिद्रता के आघात से पीड़ित परिवेशों में ही क्यों न हो।

कार्य-कारण के नियम का उपयोग कर सुख-समृद्धि का निर्माण करें
मनुष्य को सारी सुख-समृद्धि कार्य-कारण के नियम के अनुसार ही दी जाती है। यह नियम उसके वर्तमान जीवन को ही नहीं बल्कि सभी पिछले जन्मों को भी नियन्त्रित करता है। इसी कारण मेघावी लोग दरिद्र अथवा अस्वस्थ पैदा हो सकते हैं, और एक औसत दर्जे की बुद्धि वाला व्यक्ति स्वस्थ एवं धनवान पैदा हो सकता है। मूल रूप से सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र थे जो ईश्वर के ही प्रतिरूप बनाए गए थे, तथा सभी के पास स्वतंत्र इच्छा-शक्ति और लक्ष्य प्राप्ति की समान क्षमता थी। परन्तु अपनी ईश्वर-प्रदत्त तर्क बुद्धि एवं इच्छा-शक्ति के दुरोपयोग द्वारा मनुष्य कार्य-कारण के प्राकृतिक विधान के नियंत्रणाधीन हो गया है और इस प्रकार उसने जीवन को सफल बनाने की अपनी स्वतंत्रता को सीमित कर दिया है। मनुष्य की सफलता केवल उसकी बुद्धिमत्ता और उसके कार्य कौशल पर ही नहीं वरन उसके पिछले कर्मों पर भी निर्भर करती है।

परन्तु पिछले कर्मों के बुरे परिणामों को निरस्त करने का एक तरीका है। असफलता के कारणों को नष्ट करना होगा तथा सफलता के नए कारण का बीज बोना होगा।

सफलता एवं सुख-समृद्धि के अधिचेतन स्रोत के साथ सम्पर्क बनाएँ
मात्र चेतन मन (साधारण जाग्रत अवस्था में कार्यरत मन) सफलता प्रदान करने वाले एक नए कारण की शुरूआत नहीं कर सकता; परन्तु जब मानव मन अधिचेतन अवस्था में ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है तो वह सफलता के प्रति आश्वस्त हो सकता है; क्योंकि अधिचेतन मन ईश्वर की असीम शक्ति के साथ समस्वर होता है, इसलिए वह सफलता के एक नए कारण की रचना करने में सक्षम होता है।

पूर्ण सफलता का अभिप्राय है “अपनी अनन्त अधिचेतन शक्ति के संवर्द्धन द्वारा इच्छानुसार उस वस्तु का निर्माण करने की शक्ति होना जिसकी आपको आवश्यकता है।” भारत के ईश्वर प्राप्त गुरुओं द्वारा सिखाई गई ध्यान की विशिष्ट प्रविधि के ज्ञान द्वारा अधिचेतन शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है। इच्छानुसार और बिना किसी परिसीमितता के सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, सफलता, ज्ञान और ईश-सम्पर्क को कभी भी प्राप्त करने के लिए मन रूपी फैक्ट्री की मस्तिष्क-रूपी यन्त्रप्रणाली को नियन्त्रित करने की कला में भारत को दक्षता प्राप्त है।

पश्चिम के भाईयों और बहनों को यह जानने की ज़रूरत है कि मन अपने आविष्कारों से ऊपर है। मन को नियन्त्रित करने की कला को जानने पर अधिक समय दिया जाना चाहिए ताकि एक वैज्ञानिक तरीके से सर्वतोमुखी सफलता हासिल की जा सके। सब कुछ करने में सक्षम, सर्व-शक्तिमान मन के संवर्द्धन पर अधिक समय दिया जाना चाहिए तथा मन द्वारा जनित उत्पादों को अर्जित करने पर कम समय दिया जाना चाहिए।

ध्यान के द्वारा यह जानें कि स्वास्थ्य और शान्ति के बिना धन प्राप्त कर लेना सफलता नहीं है, और आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए पर्याप्त धन के अभाव में शान्ति और स्वास्थ्य का होना भी जीवन को पूर्ण या सफल नहीं बनाता। भारत द्वारा दिखाए मार्ग का अनुसरण करें अधिचैतन्य स्थिति को प्राप्त करें तथा मन पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित करें; तब आप इच्छानुसार अपनी हर आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं।

प्रतिज्ञापन की इच्छापूर्ति की शक्ति का उपयोग करें
ईश्वर की असीम प्रचुरता से ही सभी आध्यात्मिक एवं भौतिक उपहार प्रवाहित होते हैं। ईश्वर के उपहारों को प्राप्त करने के लिए आपको अपने मन से अल्पता और दरिद्रता के सभी विचारों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। ईश्वर की सर्वव्यापी चेतना सर्व-सम्पन्न है तथा उसमें अभाव का कोई स्थान नहीं है; उस अनन्त भण्डार तक पहुँचने के लिए आपको समृद्धि की चेतना को बनाए रखना होगा। अकिंचन अवस्था में यदि आपको यह न भी पता हो कि आपके पास पैसा अब कहाँ से आएगा, तो भी आशंका एवं व्याकुलता को अस्वीकार कर दें। जब आप अपना पूरा-पूरा प्रयास करेंगे और ईश्वर पर आश्रित होकर उन्हें उनका कार्य करने देंगे, तब आप पायेंगे कि गुप्त शक्तियाँ आपकी सहायता के लिए आयेंगी और आपकी रचनात्मक इच्छाएँ शीघ्र ही साकार रूप धारण कर लेंगी। यह दृढ़ विश्वास और समृद्धि की इस चेतना को ध्यान द्वारा प्राप्त किया जाता है।

प्रतिज्ञापन : “ईश्वर मेरा अपना अक्षय दिव्य बैंक हैं। मैं सदा समृद्ध हूँ क्योंकि मुझे उस दिव्य भण्डार में प्रवेश प्राप्त है। मैं सर्वव्यापी सत् की शक्ति में इस दृढ़ विश्वास के साथ आगे बढूँगा कि मुझे जिस समय जो आवश्यकता हो वह उसे पूरा करेगी।”

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