क्रिसमस 2010 पर श्री श्री दया माता का संदेश

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क्रिसमस “क्राइस्ट के पृथ्वी पर अवतरित होने के शुभ अवसर का उत्सव मनाने के लिए आप जीसस में मूर्त रूप में विद्यमान दिव्य क्राइस्ट की चेतना का अनुभव, अपनी नवीन जागृत आध्यात्मिक चेतना के पालने में करें…”

—Paramahansa Yogananda

जिस समय हम प्रभु जीसस के रूप में क्राइस्ट की चेतना के अवतरित होने के सम्मान में आनंद मना रहे हैं, ईश्वर से प्रार्थना है कि इस पवित्र अवसर पर प्रबल रूप से अनुभव होने वाले उल्लास और आशा से आपका हृदय उर्ध्वगामी हो जाये। ईश्वर को प्रकट करने वाली इस प्रकार की महान आत्माओं का अवतरित होना जो विशुद्ध रूप से ईश्वर के प्रकाश को प्रतिबिंबित करती हैं, हमारे विश्वास को दृढ़ करता है कि इसी प्रकार हम भी भौतिकता में जकड़े अपने अस्तित्व का पुनर्जन्म अपनी आत्मा के असीम चैतन्य में अनुभव कर सकते हैं। हम स्वयं की चेतना के विस्तार की असीम क्षमता और ईश्वरीय प्रेम तथा साधुता प्राप्त कर स्वयं में तथा अन्य सभी संबंधों में उसे देख सकते हैं।

यद्यपि जीसस के जन्म को शताब्दियाँ बीत चुकी हैं, किन्तु आज भी उनके उदाहरण की शक्ति और सर्वव्यापी प्रेम से ग्रहणशील आत्माएं पूर्णरूप से रूपांतरित होती हैं। वह भी बहुत संघर्ष और उथल पुथल के समय में रहते थे, किन्तु उन्होंने हमारे सामने उदाहरण रखा कि दैवी रूप से किस प्रकार इन सब समस्याओं का सामना किया जाता है — और यह भी कि हम किस प्रकार अपने को ईश्वर से जोड़ें जिस से कि हम सभी के लिए उसी प्रकार सोच सकें जिस प्रकार ईश्वर हम सब के लिए सोचते हैं, कि किस प्रकार हम संसार के द्वंद्व से ऊपर उठें, स्वयं शांति प्राप्त करें और दूसरों को शांति और प्रेम दें।

क्राइस्ट के जीवन पर विचार करते हुए और अपने जीवन में उनके गुणों का अनुसरण करने की चेष्टा करते हुए, आप और अधिक अपने हृदय में उनके एवं अन्य ईश्वर-प्राप्त आत्माओं के प्रति ग्रहणशीलता के लिए अपने हृदय को खोलेंगे। विश्व का उन्नयन करने वाली शक्ति ईसा मसीह के अस्तित्व में समाहित थी; परन्तु उनकी विनम्रता उस से भी अधिक उदात्त थी, जिसे से वह ईश्वर के प्रेम और उसकी दिव्य इच्छा शक्ति को व्यक्त कर पाए। जब तक हम अपने अहंकार और उसकी आवश्यकताओं की परिधि में रहते है, हम आसानी से उन व्यवधानों को रच लेते हैं जो हमे ईश्वर से और एक दूसरे से अलग कर देते हैं। किंतु जब हम अपने स्वार्थी हितों के विषय मे कम सोचते हैं, तो हम सभी द्वारों से आने वाली ईश्वर प्रदत्त विवेक के प्रति अधिक ग्रहणशील हो जाते हैं और इस प्रकार करुणा और अपने बोध का विस्तार करते हैं। ईश्वरीय प्रेम में सुरक्षित, क्राइस्ट को किसी बाह्य मान्यता और पद की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने केवल सेवा ही करनी चाही, और इसी प्रकार सेवा भावना से हम लोग भी ‘देने’ के आनंद को जान सकते हैं। क्राइस्ट ने सभी में ईश्वर को देखा — उनमें भी जिन्होंने कुछ गलत किया था; क्योंकि वे मानवीय दुर्बलताओं से होने वाली भूलों से हट कर उनकी आत्माओं को देख सकते थे। जब हम “प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा” को देख पाते हैं तो हमारे अंदर भी किसी के प्रति आलोचनात्मक निर्णय लिए बिना सभी से प्रेम कर पाने की क्षमता आ जाती है।

प्रत्येक सीमातीत प्रयास हमारी चेतना को विस्तार देता है, किंतु ऐसा मौन के मंदिर में प्रवेश करने पर ही होता है, जहां पर अशांत विचार और भावनाएं विलीन हो जाते हैं और तब हम उस “शांति का अनुभव करते हैं जो समझ के परे है,” जिस अनंत प्रेम को क्राइस्ट ने अनुभव किया — जिस से सभी आत्माएं अंततः ईश्वर के पास लौट आती हैं। अंतःकरण का ईश्वर से सामंजस्य धीरे धीरे ही होता है, किंतु इस दिशा में किया गया प्रत्येक प्रयास हमारे जीवन में अधिक शांति, सहानुभूति और हमें ईश्वर के निकट लाता है। गुरुदेव ने कहा है कि यदि हम निरंतर प्रयासरत रहें तो “ईश्वर की कृपा से हमारे अंदर अनिर्वचनीय माधुर्य, अवर्णनीय गौरव और अनंत संरक्षण का संचार प्रवाहित हो सकता है।” यह वह उपहार है जो ईश्वर आपको इस क्रिसमस के अवसर पर प्रदान करते हैं। इस अवसर पर आपकी आनंदमय आत्म जागृति का आरंभ हो और आशीर्वाद है कि आप सब लोग ईश्वर के सर्वव्यापी प्रेम और बोध को आपस मे साझा करें।

आपको और आपके प्रियजनों को क्रिसमस की शुभकामनाएं।

श्री दया माता

कॉपीराइट © 2010 सेल्फ़-रियलाईज़ेशन फ़ेलोशिप। सर्वाधिकार सुरक्षित।

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