जन्माष्टमी 2015 पर श्री श्री मृणालिनी माता का संदेश

जन्माष्टमी 2015
भगवान श्रीकृष्ण की जयंती

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ।।

श्रीमदभगवद्गीता अध्याय: 6,30

प्रिय आत्मन्,

इस समय जब हम सारे विश्व में एक साथ भगवान् श्रीकृष्ण के जन्मदिवस, जन्माष्टमी, का उत्सव मना रहे हैं, मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप दिव्य प्रेम के इस महान् अवतार के आत्म-जागृति के गान को अपने हृदय में सुनें। श्रीकृष्ण की बांसुरी की मनमोहक धुन ईश्वर की आन्तरिक पुकार का प्रतीक है जो हमारे आत्मा के क्रमविकास में हमें आगे बढ़ाती है, तथा शाश्वत जीवन एवं आनन्द के हमारे खो चुके राज्य के लिये हममें एक गहरी तड़प पैदा करती है। इसके साथ ही, श्रीकृष्ण का जीवन और अर्जुन को दिया उनका ज्ञानपूर्ण-मार्गदर्शन हमें स्मरण कराता है कि उस राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिये, हमें एक ऐसे सच्चे आध्यात्मिक योद्धा के शौर्य, अनुशासन एवं अटूट संकल्प को विकसित करना होगा, जो हमें उस लक्ष्य से हटाने का प्रयास करती सभी भीतरी एवं बाहरी परिस्थितियों द्वारा भी भयभीत न हो।

ऐसा लग सकता है कि आज की दुनिया में सब कुछ — दैनिक तनाव एवं ज़िम्मेदारियाँ, तथा परिवर्तन की बढ़ी हुई गति — हमारे अवधान को बाहर खींचने का षड्यंत्र कर रहा है। मानव स्वभाव की प्रवृत्ति हमारा ध्यान खींचने वाली उन माँगों पर निरुत्साहित होने या विद्रोह करने की, तथा यह सोचने की होती है, कि जीवन यदि और सरल होता तो हम अधिक शीघ्र उन्नति करते। परन्तु जैसा कि गुरुदेव परमहंस योगानन्दजी ने हमें बताया है, “गीता में श्रीकृष्ण का संदेश आधुनिक युग, या किसी भी युग के लिये आदर्श उत्तर है : आवश्यक कर्त्तव्य, अनासक्ति, और ईश्वर-प्राप्ति के लिये ध्यान का योग।” ईश्वर तथा हमारे कर्म ने हमें जिस युद्धक्षेत्र में रखा है, वहाँ संतुलित रहने की कला को सीखना ही हमारा उद्देश्य है, जो कि माया पर विजय प्रदान करती है। परमात्मा हमें आदर्श बाहरी परिस्थितियों का वचन नहीं देते हैं। इसके बदले वे हमें कुछ इससे भी बड़ा देते हैं — शक्ति एवं आत्म-स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिये आवश्यक अवसर। जब जीवन की विभिन्न परिस्थितियाँ ध्यान करने की आपकी क्षमता को कम कर देती हैं या आपके मार्ग में बाधायें डालती प्रतीत होती हैं, तो उन परिस्थितियों का उपयोग ईश्वर के लिये अपने अन्तर् में अधिक ललक उत्पन्न करने के लिये करें। ईश्वर के साथ आन्तरिक रूप से रहने — कार्यों के दौरान उनकी उपस्थिति का अभ्यास करने, एवं अपने मन को इस तरह प्रशिक्षित करने के तरीकों को खोजने के लिये अपने दृढ़ संकल्प को जगायें, कि आन्तरिक एकात्मता की संक्षिप्त अवधियों में भी आप स्वयं को पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित कर सकें। बाहरी परिस्थितियाँ हमें नहीं बांध सकतीं। हमारे अहं का प्रतिरोध तथा बाहरी परिस्थितियों के साथ हमारा भावनात्मक जुड़ाव हमें माया के जगत् में फँसाता है। पसंद और नापसंद, तथा हमारे कर्मफलों के प्रति आसक्ति से उत्पन्न चिंतायें प्रायः सबसे बड़े विक्षेप होते हैं। जब हम उन आसक्तियों का त्याग करना, और हमारे प्रेम की एक सरल भेंट के रूप में अपने सर्वोत्तम प्रयासों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करना प्रारम्भ करते हैं, तब हम स्वतंत्रता और मन की शान्ति, तथा आन्तरिक संतुलन की एक अनुभूति प्राप्त करते हैं — चाहे हमारी परिस्थितियाँ कुछ भी हों।

प्रत्येक परिस्थिति को ईश्वर के अधिक निकट आने के एक साधन के रूप में देख कर, हम अपने जीवन के ताने-बाने में ईश्वर के निरन्तर विचार को बुन लेंगे, और अन्ततः यह बोध कर लेंगे कि एक क्षण के लिये भी हम उनसे अलग नहीं रह सकते। जैसा भगवान् ने अर्जुन से कहा है: “जो व्यक्ति मुझे सर्वत्र देखता है तथा प्रत्येक वस्तु को मुझमें देखता है, मैं उसकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होता, न ही वह मेरी दृष्टि से कभी ओझल होता है।”

मैं प्रार्थना करती हूँ कि अपने जीवन के सभी अनुभवों के दौरान आप उस दिव्य आश्वासन को अपना पोषण करते एवं शक्ति प्रदान करते अनुभव करें।

ईश्वर एवं गुरुदेव के दिव्य प्रेम तथा अनवरत् आशीर्वादों के साथ,



श्री श्री मृणालिनी माता

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