अपने सच्चे आत्मस्वरूप को जाग्रत करने के लिये अनश्वर विचारों का उपयोग कैसे करें

श्री श्री परमहंस योगानन्द की ज्ञान विरासत में से उद्धृत

परमहंस योगानन्दजी ने लिखा है :

“यदि आप ईश्वरीय विचार से समस्वर होकर, सत्य के सही विचारों के हथौड़े से माया रूपी कील पर आघात करते हैं, तभी आप माया को जीत सकते हैं।

अनश्वरता के एक विचार से स्थानापन्न करके सभी नश्वर विचारों को नष्ट कर दीजिये।”

इस संकलन में गुरुजी के प्रवचन तथा रचनाओं से वे प्रतिज्ञापन तथा आत्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान — “अनश्वरता के विचार” — संकलित हैं जो उन्होंने अति महत्त्वपूर्ण माने हैं। इन्हें आप स्वयं में तथा सारी सृष्टि में व्याप्त शाश्वत, आनन्दपूर्ण सत्य को अधिक जागरूक होकर जानने के लिए प्रयुक्त कर सकते हैं।

जो आप वास्तव में हैं उसका दिन-रात, प्रतिज्ञापन करिये

निरन्तर अपने आप से इस सत्य को दोहराइये :

“मैं अपरिवर्तनशील हूँ, मैं शाश्वत हूँ, मैं अस्थिनिर्मित नश्वर शरीर नहीं हूँ, मैं अमर हूँ, मैं अपरिवर्तनीय अनन्त हूँ।”

यदि कोई शराबी राजकुमार अपनी वास्तविक पहचान भूलकर झुग्गी झोपड़ी में जाकर रोने चिल्लाने लगे कि, “मैं कितना गरीब हूँ” तो उसके मित्र उस पर हँसेंगे और कहेंगे, “जागो, और याद करो कि तुम एक राजकुमार हो” इसी प्रकार आप भ्रम की स्थिति में हैं। आप स्वयं को संघर्ष करने वाला, दुःखी असहाय प्राणी समझ रहे हैं। प्रतिदिन मौन बैठकर पूरे विश्वास के साथ प्रतिज्ञापन करिये :

“न जीवन न मृत्यु न जाति कोई मेरी पिता न कोई माता मेरी, दिव्य ईश्वर मैं हूँ “वह”, मैं अनन्त आनन्द हूँ।”

यदि आप बार-बार दिन-रात इन विचारों को दोहराएँगे तो अन्ततः समझ जाएँगे कि वास्तव में आप क्या हैं : एक अनश्वर आत्मा।

उन सभी सीमित विचारों के आवरण को उतार कर फेंक दें जो आपकी वास्तविक पहचान को ढंके रहते हैं

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि आप यह नहीं जानते हैं कि आप कौन हैं? कि आप अपने आप को ही नहीं जानते? आप अपने शरीर व नश्वर भूमिकाओं के अनुरूप स्वयं की परिभाषा अनेक नामों से देते रहते हैं।…आप अपनी आत्मा पर चढ़े इन आवरणों को उतारकर फेंक दीजिये।

“मैं सोचता हूँ परन्तु मैं विचार नही हूँ। मैं अनुभव करता हूँ परन्तु मैं अनुभूति नही हूँ। मैं इच्छा करता हूँ परन्तु मैं इच्छा नहीं हूँ।”

क्या शेष रह गया? वह आप जो यह जानता है कि आप हैं; वह आप जो यह अनुभव करता है कि आप हैं — यह प्रमाण अंतर्ज्ञान के माध्यम से प्राप्त होता है, जो आत्मा की आत्मनिर्भर जानकारी है अपने अस्तित्व के बारे में।

पूरे दिन आप निरन्तर शरीर के द्वारा कार्य करते रहते हैं अतः आप अपने आप की पहचान शरीर से बना लेते हैं। परन्तु प्रत्येक रात्रि ईश्वर आपके ऊपर से माया का बंधन हटा देते हैं। पिछली रात में गहरी स्वप्न रहित नींद में आप स्त्री थे या पुरुष अथवा एक अमरीकन थे या हिन्दू थे या गरीब थे? कोई भी नहीं, आप पवित्र आत्मा थे।…अर्धचेतन अवस्था की गहरी निद्रावस्था में ईश्वर आपके सभी नश्वर नाम वापस ले लेते हैं और आपको यह अनुभव कराते हैं कि आप शरीर से अलग हैं, आप शरीर की सभी सीमाओं से परे हैं। आप ब्रह्माण्ड में विश्राम करने वाली शुद्ध चेतना हैं। यही विस्तार आपका सच्चा स्वरूप है।

प्रत्येक प्रातःकाल जैसे ही आप जागें, स्वयं को इस सत्य की याद दिलाइये :

“मैं अपने स्वरूप के आन्तरिक अन्तर्ज्ञान से बाहर आया हूँ। मैं शरीर नहीं हूँ। मैं अदृश्य हूँ। मैं आनन्द हूँ। मैं प्रकाश हूँ। मैं विवेक हूँ। मैं प्रेम हूँ। मैं स्वप्न शरीर में वास करता हूँ जिसके द्वारा इस सांसारिक जीवन का स्वप्न देख रहा हूँ; परन्तु मैं सदा अमर रहने वाली आत्मा हूँ।”

सफलता के बीज बोने के लिए असफलता का मौसम सर्वोत्तम समय होता है। परिस्थितियों की मार से आप घायल हो सकते हैं, परन्तु अपना मस्तक ऊँचा रखिये। सदैव एक बार और प्रयास कीजिये, भले ही आप अनेक बार असफल हो चुके हों। जब आपको लगे कि आप और संघर्ष नहीं कर सकते या जब आप सोचें कि आप हर सम्भव प्रयास कर चुके हैं, या जब तक आपके प्रयासों को सफलता का मुकुट नहीं बन्ध जाता, संघर्ष करते ही रहिये।

विजय के मनोविज्ञान का प्रयोग करना सीखें। कुछ लोग परामर्श देते हैं, “असफलता के बारे में कोई चर्चा बिलकुल मत करो।” परन्तु केवल इसीसे लाभ नहीं होगा। सर्वप्रथम, अपनी असफलता और इसके कारणों का विश्लेषण करें, अनुभव का लाभ उठाएँ, और फिर इसके विषय में सोचना बंद कर दें। जो व्यक्ति संघर्षरत रहता है, जो भीतर से अपराजित है, यद्यपि वह बहुत बार असफल रहा हो, तो भी वह वास्तव में विजयी व्यक्ति है।

चाहे जीवन अंधकारमय हो, चाहे कठिनाइयां आएँ, चाहे सुअवसरों का उपयोग न कर पाएँ, लेकिन अपने अन्तर में यह कदापि न कहें : “मैं बर्बाद हो चुका हूँ। इश्वर ने मुझे त्याग दिया है।” ऐसे व्यक्ति के लिए कौन कुछ कर सकता है? आपके परिवार के लोग आपको त्याग सकते हैं, आपका अच्छा भाग्य आपको धोखा देता दिखाई दे सकता है, मनुष्य और प्रकृति की सभी शक्तियाँ आपके विरुद्ध हो सकती हैं, परन्तु आपके अन्दर विद्यमान कार्य आरम्भ करने की दिव्य शक्ति के गुण के द्वारा, आप अपने बीते हुए ग़लत कार्यों द्वारा उत्पन्न भाग्य के प्रत्येक हमले को विफल कर सकते हैं, और विजयी बनकर स्वर्ग की ओर बढ़ सकते हैं।

जानिये कि आप इश्वर से कभी भी अलग नहीं हैं

आत्मज्ञान सर्वोच्च ज्ञान है — स्वयं को, आत्मा को जानना कि वह निरन्तर ईश्वर से पृथक नहीं है। ईश्वर ही समस्त अस्तित्व की गहराई में निहित हैं। “हे अर्जुन! मैं सभी प्राणियों के हृदय में निहित निजता हूँ : मैं उन सब का स्रोत हूँ, अस्तित्व हूँ, अन्त हूँ।” (ईश्वर-अर्जुन संवाद : श्रीमद्भागवद्गीता X:20.)

सभी महान गुरुओं ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस नश्वर शरीर के अन्दर अनश्वर आत्मा विद्यमान है जो उस ईश्वर का अग्निकण है जो सबको संचालित करते हैं। वह व्यक्ति जो अपनी आत्मा को जानता है वही इस सत्य को जानता है :

“मैं प्रत्येक नश्वर वस्तु से परे हूँ।…मैं नक्षत्रगण हूँ, मैं तरंगे हूँ, मैं सभी का जीवन हूँ; मैं सभी के हृदयों में स्थित हँसी हूँ। मैं सभी फूलों के मुख पर विद्यमान मुस्कान हूँ। मैं प्रत्येक आत्मा की मुस्कराहट हूँ। मैं सम्पूर्ण सृष्टि को संचालित करने वाली शक्ति एवं ज्ञान हूँ।”

अपनी दिव्य प्रकृति को जानिये, उसका प्रतिज्ञापन करिये और उस पर विचार करिये

सदियों से चले आ रहे गलत विचारों को नष्ट कर दें — कि हम कमज़ोर मानव हैं। हमें विचार, ध्यान, प्रतिज्ञापन, विश्वास और प्रतिदिन अनुभव करना चाहिये कि हम ईश्वर की सन्तान हैं।

आप कह सकते हैं कि, “यह तो विचार मात्र है” विचार क्या है? जो कुछ आप देखते हैं वह एक विचार का ही परिणाम है अदृश्य विचार ही सभी वस्तुओं को उनकी वास्तविकता प्रदान करते हैं।…अतः, यदि आप अपने विचारों की प्रक्रिया को नियंत्रित कर लें, तो आप किसी भी वस्तु को बना सकते हैं, अपनी एकाग्रता की शक्ति से उसे मूर्त रूप दे सकते हैं।…

गुरु द्वारा बताए ध्यान की वैज्ञानिक विधि से आप अपने विचारों को नियंत्रण में एवं मन को अंतर्मुखी करना सीख कर, आप धीरे-धीरे आध्यात्मिक भाव विकसित कर लेंगे : आपका ध्यान गहन हो जाएगा और आपका अदृश्य स्वरूप-आत्मा जो ईश्वर का आप के अंदर प्रतिरूप है आपके लिए सत्य हो जाएगा।

जिन विचारों को आप नष्ट करना चाहते हैं उन्हें रचनात्मक विचारों से स्थानापन्न करें। यही स्वर्ग की कुंजी है जो आपके हाथों में है।…

हम वही हैं जो हम सोचते हैं कि हम हैं।…अपनी चेतना को नश्वर से, एक अमर दिव्य जीव में परिवर्तित करें।

“मैं अनन्त हूँ, मैं स्थान से परे हूँ, मैं थकान से ऊपर हूँ; मैं शरीर की सीमा से परे हूँ, मैं विचार तथा वाक्शक्ति से परे हूँ; सभी भौतिक वस्तुओं व मन से परे हूँ। मैं अनन्त आनन्द हूँ।”

मन को निरन्तर दैवी सत्य से प्रभवित करिये

मानवीय सीमा में आने वाले किसी भी सुझाव से मन को दूर रखें : जैसे रोग, वृद्धावस्था, मृत्यु। इसके स्थान पर निरन्तर अपने मन में यह सत्य अंकित करें :

“मैं अनन्त हूँ जो शरीर बना है। ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में शरीर परम पूर्ण, सदा युवा आत्मा है।”

कमज़ोरी या आयु के संकीर्ण विचारों से अपने को प्रभावित मत होने दीजिये। किसने आपसे कहा कि आप वृद्ध हैं? आप वृद्ध नहीं हैं। आप आत्मा हैं अतः सदा युवा हैं। इस विचार को अपनी चेतना पर अंकित कर दें :

“मैं आत्मा हूँ, चिरयुवा ईश्वर का प्रतिबिम्ब हूँ। मैं युवावस्था, महत्त्वाकांक्षा एवं सफलता प्राप्ति की शक्ति से स्पन्दनशील हूँ।”

स्वयं को ब्रह्माण्डीय शक्ति के साथ समस्वर करिये, चाहे आप फ़ैक्टरी में कार्यरत हों, व्यवसाय की दुनिया में लोगों के साथ मिल-जुल रहे हों, सदैव प्रतिज्ञापन करिये :

“मुझमें अनन्त सृजन शक्ति है। मैं कुछ उपलब्धि किये बिना नहीं मरूँगा। मैं ईश्वर का प्रतिरूप एक तर्कशील प्राणी हूँ। मैं ईश्वर की शक्ति हूँ जो मेरी आत्मा का सक्रिय स्रोत हैं। मैं व्यवसाय, विचार तथा ज्ञान की दुनिया में नई क्रान्ति लाऊँगा। मैं और मेरे पिता एक हैं। मैं अपनी किसी भी इच्छित वस्तु को बना सकता हूँ, बिलकुल अपने सृजनशील पिता की तरह।”

वाईएसएस तथा एसआरएफ़ पाठमालाएँ आपको ब्रह्माण्डीय जीवन से सम्पर्क करना सिखाती हैं…जो ईश्वर की ब्रह्माण्डीय शक्ति का महासागर है। इसे प्राप्त करने का सबसे सशक्त तरीका यही है कि इस शक्ति को आन्तरिक स्रोत से सीधे ही प्राप्त किया जाए न कि बनावटी साधनों से जैसे दवाइयों या भावावेगों या अन्य किसी साधन से। तब आप कह सकते हैं :

“माँस के ठीक नीचे एक महान शक्ति धारा है। मैं उसे भूल गया था, परन्तु अब आत्मज्ञानरूपी कुदाल से खोद कर मैंने उस प्राण शक्ति को पुनः खोज लिया है। मैं केवल माँस नही हूँ। मैं ईश्वरीय विद्युत की आवेशित शक्ति हूँ जो इस शरीर में व्याप्त है।”

कष्ट एवं मुसीबतें आपकी आत्मा को हानि नही पहुँचा सकते

यह जानिये कि आप अविनाशी हैं — जिन्हें विनाशकारी संघर्षों से कुचला नहीं जा सकता, बल्कि उनसे कुछ सीख कर अपनी अनश्वरता को अभिव्यक्त करें और मुस्कुराएं। कहिये :

“मैं अविनाशी हूँ जिसे नश्वर स्कूल में अपनी अनश्वरता के बारे में सीखने व उसे पुनः पा लेने के लिए भेजा गया है। यद्यपि मुझे धरती की, सभी प्रकार की शुद्धीकरण करने वाली अग्नियों ने चुनौती दी, फिर भी मैं आत्मा हूँ और मुझे नष्ट नहीं किया जा सकता। अग्नि मुझे जला नहीं सकती; जल मुझे भिगो नहीं सकता; हवा मुझे उड़ा नहीं सकती; अणु मुझे बिखेर नहीं सकते। मैं अविनाशी हूँ, स्वप्न में अनश्वरता के पाठ सीख रहा हूँ — नष्ट हो जाने के लिये नहीं बल्कि मनोरंजित होने के लिये।”

आपने अनेक जन्मों में बहुत सी भूमिकाएं निभाईं हैं। परन्तु वे आपको मनोरंजन के उद्देश्य से प्रदान की गई थीं —भयभीत करने के लिये नहीं। आपकी अमर आत्मा को कोई छू भी नहीं सकता। जीवन के गतिशील ‘चलचित्र’ में आप रो सकते हैं, हँस सकते हैं बहुत तरह की भूमिकाएं निभा सकते हैं; परन्तु आन्तरिक रूप से आपको सदा कहना चाहिये मैं आत्मा हूँ।” इस आत्मज्ञान से अत्यधिक सान्त्वना मिलती है।

“मैं मधुर अनश्वरता की दिव्य संतान हूँ जिसे यहाँ पर जन्म मरण का नाटक खेलने के लिये भेजा गया है। परन्तु अपने अमर स्वरूप को याद रखता हूँ।

“आत्मा का महासागर मेरी आत्मा का लघु बुलबुला बन गया है। मैं जीवन का बुलबुला हूँ — जो ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ एकरूप है। मैं कभी मर नहीं सकता। मैं भले ही जन्म लेकर तैरता रहूँ या मरकर अदृश्य हो जाऊँ, मैं वह अविनाशी चेतना हूँ जो ईश्वरीय अनश्वरता के आन्तरिक आवरण में सुरक्षित है।”

किसी भी चीज़ से न डरें, क्योंकि आप ईश्वर की सन्तान हैं

जब आप ध्यान के समय अपनी आँखें बन्द करते हैं, तभी आप अपनी चेतना का विस्तार देखते हैं — आप देखते हैं कि आप अनन्त ब्रह्माण्ड के केन्द्र हैं। वहीं मन एकाग्र करिये; सुबह शाम केवल थोड़ी देर के लिये आँखें बन्द करके कहिये :

“मैं अनन्त हूँ; मैं ईश्वर की सन्तान हूँ; सागर की लहर उसी के जल का चढ़ाव है; मेरी चेतना भी महान ब्रह्माण्डीय चेतना का ही तरंगायित उन्नत रूप है। मुझे किसी का भय नहीं है, मैं ईश्वर रूप हूँ।”

ईश्वर की अदृश्य सर्वभूत उपस्थिति पर अपनी चेतना केन्द्रित रखिये। अपना मन शान्त रखिये और कहिये :

“मैं निर्भय हूँ; मैं ईश्वरीय तत्व से निर्मित हूँ। मैं ईश्वर की अग्नि की एक चिंगारी हूँ। मैं ब्रह्माण्डीय लपट का एक अणु हूँ। मैं ईश्वर के विस्तृत सार्वभौमिक शरीर का एक कण हूँ। ‘मैं और मेरे पिता एकरूप हैं।

इस चेतना में निर्भय रहिये :

“जन्म और मृत्यु दोनों में, मैं सदैव ईश्वर में समाहित हूँ।”

जब आप प्रविधियों का अभ्यास करेंगे तो दिन प्रतिदिन यह चेतना आप पर प्रभाव डालेगी। ध्यान करते समय जब आप गहन आन्तरिक शान्ति में प्रवेश करते हैं तब शरीर के बंधन से मुक्त होते हैं। तब मृत्यु आपके लिये क्या है? भय कहाँ है? किसी में भी आपको भयभीत करने की शक्ति नहीं है। इसी अवस्था को तो आप खोज रहे हैं। ओम् पर ध्यान केन्द्रित करिये, गहन ध्यान के समय ओम् में विलय हो जाइये; ब्रह्माण्डीय स्पन्दन में ईश्वर की व्याप्ति के ज्ञान के द्वारा, आप “ईश्वर परमपिता के निकट आ जाएँगे”— यही अनन्त लोगोत्तर सम्पूर्ण ईश्वर की आनन्द चेतना है। आप कहेंगे :

“मैं और मेरे आनन्दस्वरूप प्रभु एक ही हैं। इस विश्व में मेरे पास सब कुछ है। मृत्यु, रोग, दुःख, अग्नि, कोई भी मेरे उस आनन्द को नहीं छीन सकते हैं।”

आप आत्मा हैं : अपने आत्मिक गुणों का प्रतिज्ञापन करिये

अपने जीवन के सभी सुन्दर तथा सकारात्मक गुणों को याद करिये तथा उन पर मन को केन्द्रित करिये, अपनी कमियों का प्रतिज्ञापन मत करिये।

लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले योगी को सदा मन में ध्यान रखना चाहिये, जब उसे क्रोध आए तो वह यह सोचे, “वह मैं नहीं हूँ !” जब कामनाएँ व लोभ उस पर हावी होने लगे तब उसे स्वयं से कहना चाहिये, “वह मैं नहीं हूँ !” जब अवांछित भावावेगों का मुखौटा पहन कर घृणा उसके सच्चे स्वभाव को छिपाने लगे, उसे उससे अलग होकर कहना चाहिये : “वह मैं नहीं हूँ!” वह अपनी चेतना का द्वार उन सभी के लिये बंद करना सीख लेता है जो अवांछित आगन्तुक बन कर उसके अन्दर प्रवेश करके आवास करना चाहते हैं। और जब कभी उस भक्त को दूसरों द्वारा बुरा भला कहा जाता है और तब भी वह अपने हृदय में क्षमा तथा प्रेम जैसे पवित्र भावों को अनुभव करता है तब वह दृढ़ता एवं विश्वास सहित कह सकता है, “वह मैं हूँ! वही मेरा सच्चा स्वभाव है।”

ध्यान योग व्यक्ति को वास्तविक प्रकृति को विकसित करने और स्थाई बनाने की प्रक्रिया के प्रति जागरूकता उत्पन्न करता है। व्यक्ति निश्चित आध्यात्मिक तथा मनोशारीरिक प्रविधियों व नियमों को अपना कर, उसके द्वारा संकीर्ण अहं तथा दोषपूर्ण पैतृक मानवीय चेतना को, आत्मिक चेतना से स्थानापन्न कर लेता है।

प्रिय आत्मन्, आप किसी को भी आपको यह न बताने दें कि आप पापी हैं। आप ईश्वर की सन्तान हैं क्योंकि उन्होंने आपको अपने ही प्रतिरूप में बनाया है।…अपने आप से कहिये :

“कोई बात नहीं यदि मेरे पाप महासागर के समान गंभीर हैं तथा तारों के समान ऊँचे हैं, तब भी मैं अविजित हूँ क्योंकि मैं स्वयं ईश्वर का प्रतिरूप हूँ।”

आप प्रकाश हैं, आप आनन्द हैं

एक गुफा में अंधकार का साम्राज्य हज़ारों वर्ष तक हो सकता है परन्तु जैसे ही प्रकाश अन्दर लाएंगे अंधकार इस तरह से अदृश्य हो जाएगा जैसे वह कभी वहाँ पर था ही नहीं। उसी प्रकार भले ही आप में कितने ही दोष क्यों न हों, वे दोष नही रह पाएँगे जब आप गुणों का प्रकाश ले आएँगे। आत्मा का प्रकाश इतना महान होता है कि जन्म जन्मांतर की बुराइयाँ भी उसे नष्ट नहीं कर सकती हैं। परन्तु स्वयं ही निर्मित बुराई रूपी अंधकार आत्मा को दुःखी कर देता है, क्योंकि तब आप उस अंधकार में दुःख झेलते हैं। गहन ध्यान में अपनी दिव्य चक्षु खोल कर आप उसे दूर भगा सकते हैं क्योंकि तब आपकी चेतना सब कुछ प्रकट करने वाले दिव्य प्रकाश से परिपूर्ण हो जाएगी।

कोई और आपको बचा नहीं सकता। आप स्वयं अपने रक्षक हैं, जैसे ही आप यह समझ जाते हैं :

“मैं स्वयं प्रकाश हूँ। अंधकार कभी भी मेरे लिये नहीं था। वह मेरी आत्मा के प्रकाश को कभी भी नहीं ढंक सकता।”

वर्तमान सीमाओं के दुःस्वप्न को भूल जाइये। रात में सोने के पहले और सुबह जागने के बाद प्रतिज्ञापन करिये :

“जैसे जीसस तथा गुरुजन ईश्वर के पुत्र हैं वैसे ही मैं भी प्रभु की सन्तान हूँ। अज्ञानता के परदे के पीछे, मैं ईश्वर से छिपुंगा नहीं। मैं ज्ञान से प्रदीप्त रहूँगा जिससे कि मैं अपनी निरन्तर बढ़ने वाली आध्यात्मिक पारदर्शिता के द्वारा परमपूर्ण ईश्वर के प्रकाश को ग्रहण कर सकूँ। ईश्वर के प्रकाश को पूरी तरह आत्मसात करके, मैं स्वयं को ईश्वर की सन्तान के रूप में जानूंगा, जो उनके प्रतिरूप में बने होने के कारण मैं पहले से ही था।”

“मैं सदा से ईश्वर की सन्तान हूँ। मेरी शक्ति मेरे जीवन के सभी संघर्षों से कहीं बढ़कर है। अपने बीते हुए समय में मैंने जो कुछ गलत काम किये हैं उन्हें मैं अब सही कार्यों व ध्यान के द्वारा सुधार सकता हूँ। मैं उन्हें नष्ट करूँगा। मैं सदा अनश्वर हूँ।”

प्रत्येक रात तब तक ध्यान करिये जब तक सांसारिक विचार व इच्छाएँ मन से निकल न जाएँ।…अपने सभी बेचैन बना देने वाले विचारों तथा भावनाओं से परे हट कर अपनी आत्मा के मन्दिर में बैठिये जहाँ पर ईश्वरीय आनन्द फैल कर इस संसार को अपने में समा लेता है, और आप समझ जाएँगे कि ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। तब आप कहेंगे :

“मैं ईश्वर के शाश्वत प्रकाश के साथ एकरूप हूँ जो क्राइस्ट का शाश्वत आनन्द है। सृष्टि की सभी तरंगे मेरे हृदय में तरंगायित हो रही हैं। मैंने अपने शरीर-तरंग को ईश्वर के महासागर में विलीन कर दिया है। मैं आत्मा का सागर हूँ। अब मैं शरीर नहीं हूँ। मेरी आत्मा पत्थरों में सो रही है। मैं फूलों में स्वप्न देख रहा हूँ, मैं पक्षियों में गा रहा हूँ। मैं मानव में सोच रहा हूँ, मैं जानता हूँ कि महामानव में ‘मैं ही हूँ।’”

इस स्थिति में आप समझ जाते हैं कि अग्नि आपको नष्ट नहीं कर सकती है; कि धरती, घास और आकाश सभी आपके निकटतम संबंधी हैं। तब एक आत्मा के समान आप धरती पर सृष्टि की कोलाहलपूर्ण तरंगों से निर्भीक होकर चलते हैं।

आप प्रेम हैं

“मेरे परमपिता प्रेम हैं, और मैं उनके प्रतिरूप बना हूँ। मैं प्रेम का ऐसा मण्डल हूँ जिसमें सभी ग्रह, नक्षत्र, प्राणी, सम्पूर्ण सृष्टि टिमटिमा रहे हैं। मैं वह प्रेम हूँ जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।”

जब आप उस दिव्य प्रेम का अनुभव करेंगे, आपको फूल और पशु में, एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य में कोई अन्तर नहीं दिखाई देगा। आप सम्पूर्ण प्रकृति के साथ समस्वर रहेंगे और आप सम्पूर्ण मानवता से समान रूप से प्रेम करेंगे। आप सिर्फ एक ही जाति देखेंगे — ईश्वर की संतानें, आपके भाई बहन सब उन्हीं में हैं — आप, अपने आप से कहेंगे :

ईश्वर मेरे पिता हैं। मैं उनके विस्तृत मानवीय परिवार का एक हिस्सा हूँ। मैं उनसे प्रेम करता हूँ क्योंकि वे सब मेरे हैं। मैं अपने भाई सूरज एवं बहन चाँद से प्रेम करता हूँ और मैं सभी प्राणियों से प्रेम करता हूँ जिनका सृजन मेरे ‘पिता’ ने किया है, और जिनमें उनकी प्राण शक्ति प्रवाहित होती है।”

“मैं सभी जातियों — गेहुवें, श्वेत, श्याम, पीत और लाल — जो मेरे सहपूर्वज आदम एवं हव्वा से जन्मे, एवं जिनकी आत्मा परमपिता परमेश्वर से जन्मी है — उनको पृथ्वी पर, मेरे भाइयों की तरह, मेरे हृदय में, उनके निवास पर मेरे साथ रहने के लिये, स्वागत करता हूँ।

“मैं धरती, जल, पवन को अपने सगे संबंधियों के समान गले लगाता हूँ — एक ही सामान्य जीवन जो मेरी नसों में दौड़ रहा है वही सब जीवन के विभिन्न रूपों में है। मैं सभी पशुओं, पौधों, प्रिय अणुओं तथा शक्तियों को गले लगाता हूँ जो मेरे जीवन के मन्दिर में अवस्थित हैं; मैं ही प्रेम हूँ, मैं ही जीवन हूँ।”

“आप ‘वह’ हैं”

ज्ञान या सत्य का ज्ञान ही आत्मा का “अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ),” या “तत् त्वम् असि (आप ‘वह’ हैं)” का बोध है। और जब कोई व्यक्ति ध्यान मुद्रा में सीधा होकर बैठता है और प्राणशक्ति की धारा कूटस्थ (भौहों के मध्य) की ओर ले जाता है — वही सच्ची तपस्या, आध्यात्मिक आत्मानुशासन या अभ्यास है जो आन्तरिक दैवी शक्ति पर आधिपत्य करता है।

जब यह जान कर कि आप केवल शरीर या मन नही हैं, इस संसार की चेतना से परे चले जाते हैं, और पहले से अधिक, अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य हो जाते हैं — यही दिव्य चेतना है जो आप हैं। आप ‘वह’ हैं जिसमें ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु का मूल निहित है।

जो आपकी आत्मा को ईश्वर से अलग करे, उन सीमाओं की चौखटों को तोड़ दीजिये।

“क्या मैं महासागर हूँ? वह तो अत्यन्त लघु है,
अन्तरिक्ष की नीलवर्णी पंखुड़ियों पर एक स्वप्निल हिमबिन्दु।
क्या मैं आकाश हूँ? वह तो अत्यन्त लघु है,
अनन्तता के हृदय में एक झील। क्या मैं अनन्तता हूँ?
वह अत्यन्त लघु है, नाम में सीमित है।
बेनाम होने के विस्तृत साम्राज्य में निवास करना मुझे प्रिय है,
स्वप्नों, नामों, विचारों की सीमा से परे
मैं हूँ जो सदा से हूँ —
सदा-वर्तमान विगत में,
सदा-वर्तमान भविष्य में,
सदा-वर्तमान अब में।”

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