श्री श्री मृणालिनी माता : गुरु के प्रेम और ज्ञान का एक पवित्र माध्यम

Sri Mrinalini Mata Ed

हमारी प्रिय संघमाता और अध्यक्ष, श्री मृणालिनी माता 3 अगस्त, 2017 को शांतिपूर्वक इस जगत् का त्याग कर परमात्मा में आनन्द एवं स्वतंत्रता के शाश्वत लोक में चली गयीं। परमहंस योगानन्द की शिक्षाओं द्वारा जिनके जीवन परिवर्तित हो गये हैं, ऐसे लाखों सत्यांवेशियों के लिये ज्ञान, प्रेम और समझ के एक मार्गदर्शक प्रकाशपुंज के रूप में, श्री मृणालिनी माता ने सत्तर साल से अधिक समय तक गुरु के आध्यात्मिक और धर्मार्थ कार्य में सेवा देने के लिये खुद को समर्पित कर दिया। हमारे गुरु के प्रति निःशर्त भक्ति और सेवा, और उनके ज्ञान एवं आदर्शों के साथ गहरी सामंजस्यता के एक आदर्श उदाहरण के रूप में, इस महान् आत्मा ने दुनिया भर में अनगिनत भक्तों के लिये, ईश्वर के प्रकाश और प्रेम में हमेशा बने रहने का मार्ग प्रशस्त किया।

परमहंस योगानन्द द्वारा चयनित एवं प्रशिक्षित

श्री मृणालिनी माता को सदा ही परमहंसजी द्वारा दीक्षित प्रमुख शिष्यों में से एक के रूप में याद किया जायेगा। वे उन चुनिंदा शिष्यों में से थीं, जिन्हें स्वयं उन्होंने योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के कार्य को आगे बढ़ाने के लिये व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षित किया था, और 2011 में वे वाईएसएस/एसआरएफ़ की चौथी अध्यक्ष बनीं।

उन्होंने श्री श्री दया माता का स्थान लिया, जिन्होंने इस भूमिका को 1955 से लेकर 2010 में अपने देहत्याग तक निभाया। मृणालिनी माता ने वाईएसएस/एसआरएफ़ प्रकाशनों के मुख्य संपादक के रूप में भी काम किया, जो परमहंस योगानन्द की शिक्षाओं को प्रकाशित करने के लिये ज़िम्मेदार होता है — एक भूमिका जिसके लिये उन्हें परमहंसजी द्वारा प्रशिक्षित किया गया था और जिसे अपने जीवन के अंत तक उन्होंने निभाया। अध्यक्ष पद संभालने से पहले, मृणालिनी माताजी ने पैंतालीस वर्षों तक एसआरएफ़ के उपाध्यक्ष के रूप में सेवा दी; वाईएसएस/एसआरएफ़ संन्यास परम्परा के समग्र मार्गदर्शन में और सोसाइटी की अनेक गतिविधियों में, तथा हर साल प्रदान की जाने वाली सेवाओं की देखरेख में श्री दया माता की निकटता से उन्होंने सहायता की।

गुरु से आत्मसात किए गए आध्यात्मिक प्रकाश और ज्ञान को प्रदान किया

जिस किसी भी भूमिका में उन्होंने गुरुदेव के कार्य में सेवा दी, उस कार्य को वे गुरुदेव की शिक्षाओं से — जो कि उनके रोम-रोम में समाये हुए थे — और अपनी निष्ठा और गुरुदेव पर पूर्ण विश्वास से मार्गदर्शित हो कर करती थीं। गुरु से व्यक्तिगत प्रशिक्षण प्राप्त करने के कारण, मृणालिनी माता आध्यात्मिक जीवन पर उनके निर्देशों और उच्च आदर्शों को संन्यासियों और गृहस्थों — दोनों को समान रूप से — व्यक्त करने के लिये आदर्श रूप से सक्षम थीं, और साथ-ही-साथ निष्ठावान् भक्तों को जिस तरह गुरुजी स्नेहमय प्रोत्साहन देते थे, उसे व्यक्त करने में भी।

अनेक लोगों ने उनकी वार्ताओं और लेखों से प्रेरणा ली है, जिसमें उन्होंने गुरुदवे के साथ बिताए वर्षों के अपने अनुभवों को साझा किया है। आश्रम जीवन में प्रवेश करने वालों को परमहंसजीके आदर्शों में दृढ़ता से स्थापित करने के लिए जो संन्यासी प्रशिक्षण कार्यक्रम अभी आश्रमों में मौजूद है, उसे तैयार करने में और गुरुदवे से प्राप्त प्रशिक्षण को उसमें शामिल करने में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

अनेक वर्षों पहले, जब वे अभी एक बालिका ही थीं, परमहंसजी ने उनसे कहा था : “किसी दिन, तुम्हें अनेकानेक लोगों को प्रशिक्षित करना होगा।” चूंकि वे मार्ग पर स्वयं नई थीं, उनका यह सुनकर चकित होना यद्यपि स्वाभाविक था, कालांतर में गुरु की दूरदर्शी भविष्यवाणी की पूर्ति से हज़ारों लोगों ने आशीर्वाद प्राप्त किया है। संन्यासियों और गृहस्थ सदस्यों, दोनों के लिए उनका प्रोत्साहनकारी संदेश एक समान था। वे कहती थीं कि अपने ध्यान में और स्वयं को बदलने के दैनिक कोशिशों में धैर्य के साथ किया गया प्रयास, आध्यात्मिक प्रगति के लिये उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना की ईश्वर एवं गुरु, और आत्मा की दिव्य क्षमता में विश्वास। कितनी बार उन्होंने भक्तों को स्वयं में उस असीमित क्षमता को देखने और अपने जीवन में उसे प्रकट करने के लिये प्रेरित किया था।

उन्होंने कहा है : “इस क्षण आप जो भी हैं उसमें आपको छोड़कर और किसी का हाथ नहीं है। अपनी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति से आप जो कुछ निर्माण कर रहे थे उसमें ईश्वर ने हस्तक्षेप नहीं किया। और किसी अन्य मनुष्य ने निर्धारित नहीं किया कि आप क्या हैं। आप आज जो हैं वह अपने सही या ग़लत कार्यों और विचारों और उद्देश्यों और इच्छाओं के द्वारा आपने स्वयं निर्मित किया है। और यदि हमने ही अपनी नियति बनाई है, तो अपनी नियति को बदलने की शक्ति भी हमारे पास है। श्रीयुक्तेश्वरजी ने कहा है : ‘यदि आप अभी आध्यात्मिक प्रयास कर रहे हैं तो भविष्य में सब कुछ सुधर जायेगा।’ इन सब से भी महत्वपूर्ण जो एक बात मैं आपके जेहन में डालना चाहती हूँ, वह है सचेत आध्यात्मिक प्रयास की बात — आपके जीवन में जो भी अपूर्णता या कमी हो, उसे स्वीकार न करना।”

प्रारंभिक जीवन और एसआरएफ़ पथ से प्रथम परिचय

श्री मृणालिनी माता का जन्म 1931 में अमेरिका के कान्सास राज्य के विचिटा शहर में हुआ था। संन्यास से पूर्व उनका नाम मेरना ब्राउन था। अपने किशोर जीवन का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने दक्षिणी कैलिफोर्निया में बिताया। अत्यधिक धार्मिक और शर्मीले बच्चे के रूप में दूसरों के द्वारा वर्णित, वे परमहंसजी से पहली बार चौदह वर्ष की उम्र में एसआरएफ़ के सैन डिएगो मंदिर में मिली थीं। उनकी माँ ने सैन डिएगो मंदिर में परमहंसजी की कक्षाओं में जाना शुरू किया था क्योंकि उनकी बड़ी बेटी गुरु की शिक्षाओं में रुचि लेती थी, और गुरु के साथ अनेक व्यक्तिगत साक्षात्कार भी हुए थे। परमहंसजी ने भविष्य की मृणालिनी माता से मिलने के पहले ही उन में गहरी रुचि ली थी, और उनकी माँ से उन्हें मंदिर में लाने के लिये प्रोत्साहित किया था। अनेक प्रकार से बहलाने-फुसलाने के बाद, वे रविवार की एक सेवा में मृणालिनी माता को अपने साथ जाने के लिये मना पायीं थीं। जिस चर्च में वे बड़ी हुई थीं उसके प्रति वफादारी की भावना से, मृणालिनी माता एक दूसरे धर्म के सत्संगों में भाग लेने के लिये अनिच्छुक थीं, लेकिन अंततः वे एसआरएफ़ मंदिर जाने के लिये सहमत हुईं क्योंकि उनकी माँ ने बताया कि परमहंसजी की शिक्षायें उसी दर्शन को प्रतिबिंबित करती हैं जैसा क्राइस्ट ने सिखाया था।

अपनी बाइबिल को अपनी बगल में दबाये, दृढ़-संकल्प वाली किशोरी मेरना ने 1945 में दिसम्बर के एक दिवस को एसआरएफ़ के सैन डिएगो मंदिर में प्रवेश किया। परमहंस योगानन्दजी को पहली बार देखने पर, उन्होंने बाद में बताया कि वे “शांति की एक शक्तिशाली भावना” और “मानो एक चिरपरिचित” भावना से भर गई थीं।

परमहंस योगानन्दजी के सान्निध्य में

परमहंसजी ने तुरंत पहचान लिया कि यह लड़की आने वाले वर्षों में उनके कार्य में एक अहम भूमिका निभाएगी। वर्षों पश्चात, अपने शरीर छोडने से कुछ ही दिन पहले, परमहंसजी ने उस पहली मुलाक़ात के संबंध में उनसे कहा, “जानती हो, जब तुम सैन डिएगो के मंदिर में उस दिन आई थी, और मैंने तुम्हें इस जन्म में पहली बार देखा था, तब मैंने बीत चुका वह सारा इतिहास देखा जब हम दोनों साथ थे, और मैंने भविष्य भी देखा।…जो मैंने उस दिन देखा, और जो कुछ हुआ, दोनों में थोड़ा भी अंतर नहीं है।”

परमहंसजी से मिलने के कुछ ही समय बाद, छोटी मेरना के मन में यह प्रबल भाव जगा कि उसे एसआरएफ़ की संन्यास परंपरा में प्रवेश करना चाहिए और ईश्वर तथा गुरु की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देना चाहिए। गुरुजी ने सुझाव दिया कि तुम पहले अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी कर लो। उसे पूरा करने के बाद, अपने माता-पिता की अनुमति लेकर, 10 जून 1946 के दिन, चौदह वर्षीय मेरना ने एसआरएफ़ के कैलिफोर्निया में स्थित एन्सिनीटस आश्रम में प्रवेश किया। एन्सिनीटस में रहते हुए उन्होंने हाई स्कूल पूरा किया और साथ-ही-साथ परमहंस जी का व्यक्तिगत मार्गदर्शन तथा आश्रम प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। गुरुदेव की उन्नत शिष्या, श्री ज्ञानमाता, उस समय एन्सिनीटस आश्रम का कार्यभार संभालती थीं। उन वर्षों के दौरान वे मृणालिनी माता की प्रिय और प्रभावशाली मार्गदर्शिका बनीं और साथ में एक आध्यात्मिक माँ भी। (दो साल बाद, मृणालिनी माता की माँ ने भी आश्रम में प्रवेश लिया, और संन्यास दीक्षा के बाद उनका नाम मीरा माता पड़ा।)

परमहंसजी अच्छी तरह जानते थे कि पिछले जन्मों की उनकी यह छोटी-सी शिष्या, असाधारण आध्यात्मिक परिपक्वता वाली आत्मा है, और इसीलिए उन्होंने मृणालिनी माता को आश्रम में प्रवेश लेने के एक वर्ष बाद ही 1947 में स्वयं संन्यास की दीक्षा दी। गुरुजी ने ही उनके लिए “मृणालिनी” का संन्यास नाम चुना, जिसका अर्थ है निर्मल कमल, जो कि आध्यात्मिक प्रस्फुटन का एक प्राचीन चिह्न है।

गुरु की शिक्षाओं को प्रकाशित करने में उनकी भूमिका

2004 में लॉस एंजेलिस में एसआरएफ़ वर्ल्ड कॉनवोकैशन के दौरान गॉसपल्स पर परमहंस योगानन्दजी की पांडित्यपूर्ण टिप्पणी, द सेकंड कमिंग ऑफ़ क्राइस्ट का अनावरण करते हुए

मृणालिनी माता के आश्रम जीवन की शुरूआत से ही, गुरुजी दूसरे शिष्यों को प्रायः बताया करते थे कि आगे चलकर मृणालिनी माता की भूमिका क्या होगी — विशेषकर उनके योगदा सत्संग/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप पाठमाला, लेखनों, और व्याख्यानों के संपादक के रूप में भविष्य में जिम्मेदारी के बारे में। 1950 में एक हस्तलिखित पत्र में उन्होंने राजर्षि जनकानन्द को लिखा, “वह इस कार्य के लिये पूर्वनिर्दिष्ट थी। जब पहली बार मैंने उसकी आत्मा में झाँका तो ईश्वर ने मुझे यह दिखा दिया था।”

श्री दया माता ने लिखा था, “गुरुदेव ने हम सभी को स्पष्ट कर दिया था कि वह किस भूमिका के लिये [मृणालिनी माँ को] तैयार कर रहे थे। वे अपनी शिक्षाओं के हर पहलू के विषय में, और अपने लेखनों और व्याख्यानों की तैयारी और प्रस्तुति के लिये अपनी इच्छाओं के विषय में उन्हें व्यक्तिगत निर्देश दिया करते थे।”

उसके बाद के वर्षों के दौरान और अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक, परमहंसजी ने मृणालिनी माता के आध्यात्मिक प्रशिक्षण पर हर दिन ध्यान केंद्रित किया, और उनके देहत्याग के बाद उनकी पांडुलिपियों और व्याख्यानों के प्रकाशन के लिये संपादन किस प्रकार करना है, इसके बारे में व्यक्तिगत निर्देश देते रहे।

परमहंस योगानन्द की अनेक पुस्तकों को उनके निर्देशों के अनुसार प्रकाशित किया गया है, और साथ ही अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है, जिसमें समीक्षकों द्वारा प्रशंसित श्रीमद्भगवद्गीता का अनुवाद और टीका, God Talks With Arjuna; गॉसपल्स पर उनकी पांडित्यपूर्ण टिप्पणी, The Second Coming of Christ: The Resurrection of Christ Within You; उनकी कविताओं और प्रेरणात्मक लेखन के कई संस्करण; और उनके संग्रहित व्याख्यानों एवं निबंधों के तीन संस्करणों में उनके 150 से अधिक व्याख्यान। निकट भविष्य में हम अन्य प्रमुख प्रकाशनों की घोषणा करने की आशा करते हैं, जिन पर उन्होंने अपने देहत्याग के ठीक पहले कार्य समाप्त किया था।

भारत के अनेक दौरे

अपने जीवन काल में, परमहंस योगानन्द के योगदा सत्संग सोसाइटी के विकास और उस के मार्गदर्शन में श्री दया माता की सहायता के लिये श्री मृणालिनी माता ने भारत के छह दौरे किये। उन्होंने वाईएसएस आश्रमों में काफी समय बिताया और उस के प्रमुख शहरों में उनकी शिक्षाओं पर व्याख्यान दिये। गुरु-शिष्य संबंध समेत विभिन्न विषयों पर उनके व्याख्यान, योगदा सत्संग पत्रिका में, पुस्तक के रूप में, और ऑडियो और वीडिओ रिकॉर्डिंग में प्रकाशित किये गये हैं।

सदस्यों को परामर्श एवं प्रेरणा देते हुए लिखे गए पत्रों के कारण, और उनके व्यक्तित्व में पाये जाने वाले गहन ज्ञान, करुणा एवं हास्य के अनूठे मिश्रण के कारण मृणालिनी माताजी दुनिया भर के वाईएसएस/एसआरएफ़ सदस्यों की सनेहमय श्रद्धा और गहरी कृतज्ञता की पात्र बनीं।

श्री मृणालिनी माता 1973
राँची में योगदा विद्यालयों के प्रावीण्यता प्राप्त छात्रों को पारितोषिक वितरित करते हुए, 1973

उनके जीवन की विरासत की स्थायी प्रेरणा

वाईएसएस/एसआरएफ़ सदस्य और समग्र रूप से यह दुनिया, ईश्वर प्रेरित ज्ञान और सत्य की अनमोल विरासत — परमहंस योगानन्द की शिक्षाओं — से सदा आशीर्वाद प्राप्त करती रहेंगी, जिन्हें मृणालिनी माता के कई दशकों के निस्वार्थ एवं ईश्वर से समस्वर सेवा के माध्यम से प्रकाशन में लाया गया है। जैसे-जैसे वर्ष बीतेंगे, इस तरह से गुरु की इच्छाओं को पूरा करने के द्वारा उन्होंने जो विराट् योगदान दिया है, वह आंतरिक और बाह्य दैवीय उपलब्धि से भरे उनके जीवन का एक स्थायी स्मारक होगा।

सदैव ईश्वर की चेतना में स्थापित, श्री मृणालिनी माता भक्तों को यह सलाह देती थीं :

“जिस किसी व्यक्ति ने भी वास्तव में ईश्वर की एक संक्षिप्त झलक भी पा ली है वह फिर कभी पहले जैसा नहीं रह सकता है — कभी भी पहले की तरह सीमित सांसारिक चेतना से संतुष्ट नहीं हो सकता है। आप दुनिया या इसके हितकारी सुखों का आनन्द लेना बंद नहीं कर देते हैं; बस आपका बोध बाहर की ओर से सत्य के भीतर की ओर पलट जाता है। भौतिक रूपों और सीमाओं, आसक्तियों और इच्छाओं, पसंद और नापसंद, सुख और दु:ख के साथ पहचान बनाने के बदले, आप समग्र जीवन को ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। आप बोध करते हैं कि सब कुछ ईश्वर के अनन्त प्रकाश और चेतना से निर्मित है। आप अपने परिवार के प्रेम और सहानुभूति का आनन्द लेते हैं क्योंकि आप स्वयं में ईश्वर के प्रेम को प्रवाहित होते अनुभव करते हैं, जिसे उन्होंने उस परिवार से प्रेम करने के लिये आपको दिया है। और बदले में जो प्रेम आप उनसे प्राप्त करते हैं, उसमें आप न केवल एक स्वार्थी, शारीरिक, सीमित मानव भावना को महसूस करते हैं, परन्तु ईश्वर के अनन्त प्रेम का अनुभव करते हैं। जब आप गुलाब को देखते हैं, या ईश्वर द्वारा निर्मित असंख्य सुंदर वस्तुयें देखते हैं, तो आप पंखुड़ियों की सुंदरता के पीछे अनंत प्रकाश और सृष्टिकर्ता की चेतना को देखते हैं जो इस सुंदरता का निर्माण करते हैं और उसे बनाये रखते हैं।

“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाह्य रूप से आप किन अनुभवों से गुज़रते हैं, या उन अनुभवों के माध्यम से आप किन शिक्षाओं को सीख रहे हैं, अपनी चेतना को सदैव उस एकमेव वास्तविकता पर केन्द्रित रहने दें — वह चीज़ जो कभी भी आप को धोखा नहीं देगी, जो कभी नहीं बदलेगी, जो शाश्वत है — ईश्वर, और उनके साथ आपका संबंध।”

2015 में लॉस एंजेलिस में एसआरएफ़ वर्ल्ड कॉनवोकैशन के दौरान एसआरएफ़ सदस्यों और मित्रों के साथ सत्संग

हम सदा ही उनकी स्नेहमय उपस्थिति अनुभव करते रहें और उनके इस परामर्श से मार्गदर्शन प्राप्त करते रहें कि हमें “ईश्वर रूपी उस एकमेव शाश्वत वास्तविकता” पर अपनी चेतना को सदा बनाए रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।

हमारी परमप्रिय श्री मृणालिनी माता को अपने हृदय का प्रेम और कृतज्ञता अर्पित करने में आप कृपया हमारा साथ दें। निःस्वार्थ सेवा, मैत्री और निष्ठा का उनका जीवन आपको प्रेरित करे और जैसा कि उन्होंने परामर्श दिया, “भगवान और गुरु को आपके जीवन को इस प्रकार ढालने की अनुमति दें जिससे कि आपके भीतर की दिव्य छवि पूरी तरह व्यक्त हो सके।”

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