योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की शब्दावली

महासमाधि : संस्कृत में महा, ‘महान्’ समाधि। अन्तिम ध्यान या सचेतन ईश्वरीय वार्तालाप, जिसके दौरान एक निपुण गुरु स्वयं को ब्रह्माण्डीय ओम् में विलीन करता है तथा अपने भौतिक शरीर का परित्याग करता है। गुरु निरपवाद रूप से पहले से ही यह जान जाते हैं कि ईश्वर ने उनके शरीर रूपी घर के परित्याग के लिये कौन सा समय निश्चित कर रखा है। देखें — समाधि

महावतार बाबाजी: अमर महावतार (‘महान् अवतार’) जिन्होंने सन् 1861 में लाहिड़ी महाशय को क्रियायोग की दीक्षा दी, तथा इस प्रकार संसार के लिए मुक्ति की प्राचीन प्रविधि को पुनःस्थापित किया। सदैव युवा, वे शताब्दियों से हिमालय में रहते हैं, और विश्व को निरंतर अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। उनका विशेष उद्देश्य अवतारों को अपने विशेष कार्यों को करने के लिए उनकी सहायता करना है। उन्हें उनके उत्कृष्ट आध्यात्मिक स्तर के अनुरूप अनेक उपाधियाँ दी गई हैं लेकिन महावतार ने सामान्यतः एक सरल ‘बाबाजी’ नाम को ग्रहण किया है। संस्कृत में बाबा ‘पिता’ तथा प्रत्यय ‘जी’ आदर को प्रदर्शित करते हैं। उनके जीवन के बारे में तथा उनके विशिष्ट आध्यात्मिक उद्देश्य (mission) के बारे में और अधिक जानकारी ‘योगी कथामृत’ (Autobiography of a Yogi) में दी गई है। देखें — अवतार

मन : यह शब्द संस्कृत के मूल शब्द मनस, मन से निकला है — तर्कसंगत विचार के लिए विशिष्ट मानवीय क्षमता। योग का विज्ञान अनिवार्य रूप से मानवीय चेतना के एकलिंगीय स्व (आत्मन) के दृष्टिकोण को सम्बोधित करता है। जैसा कि अंग्रेजी में कोई अन्य शब्दावली नहीं है जो इन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सच्चाइयों को अत्यधिक साहित्यिक बेढंगेपन के बिना व्यक्त करेगा, इस प्रकाशन में मन और सम्बन्धित शब्दों का उपयोग बरकरार रखा गया है — मनुष्य शब्द के संकीर्ण अनन्य अर्थ में नहीं, जो केवल आधी मानव जाति, को दर्शाता है, अपितु उसके व्यापक मूल अर्थ में।

मंत्र योग : मूल शब्द ध्वनियों का भक्तिपूर्ण, एकाग्रतापूर्ण जप जिसमें आध्यात्मिक रूप से लाभकारी स्पंदनों की क्षमता के द्वारा दिव्य सम्पर्क की प्राप्ति होती है। देखें — योग

मास्टर : जिसने आत्म संयम प्राप्त कर लिया है। परमहंस योगानन्दजी ने संकेत किया है कि, “ मास्टर की विशिष्ट योग्यताएँ भौतिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक होती हैं—कोई व्यक्ति मास्टर है, यह केवल उसकी इस क्षमता से मापा जा सकता है कि वह अपनी इच्छानुसार श्वासरहित अवस्था (सविकल्प समाधि) में प्रवेश तथा अचल परमानन्द की अवस्था (निर्विकल्प समाधि) को प्राप्त कर सकता है। देखें — समाधि

परमहंसजी आगे कहते हैं; “ सभी धर्मग्रन्थ यह घोषणा करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने सर्वशक्तिमान प्रतिबिम्ब के रूप में रचा है। विश्व पर नियन्त्रण अलौकिक प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में ऐसी शक्ति उस प्रत्येक व्यक्ति में, जो अपने दिव्य स्रोत की सच्ची स्मृति को पा लेता है, स्वाभाविक एवं अन्तर्निहित है। ईश्वर-प्राप्त मनुष्य अहंकार से तथा उससे बढ़ती व्यक्तिगत इच्छाओं से मुक्त हैं; सच्चे गुरुओं के कार्य बिना प्रयास के ही ऋत् (ईश्वरीय नियमानुसार), स्वाभाविक नैतिकता के अनुरूप होते हैं। इमर्सन के शब्दों में, सभी महान् व्यक्ति केवल सद्गुणी ही नहीं अपितु स्वयं सद्गुण बन जाते हैं; तब सृष्टि के लक्ष्य का उत्तर मिल जाता है तथा ईश्वर अति प्रसन्न हो जाते हैं।”

माया : सृष्टि की संरचना में अंतर्निहित भ्रम शक्ति जिसके द्वारा एक (ईश्वर), अनेक दृष्टिगोचर होता है। माया सापेक्षता, विपर्यय, विरोधाभास, द्वैतता, विषमता का सिद्धान्त है; शैतान (शाब्दिक: हिब्रू में ‘विरोधी’) पुराने नियम (Old Testament) के नबियों के अनुसार, तथा शैतान जिसे क्राइस्ट ने चित्रवत ‘कातिल’ तथा एक ‘झूठा’ के रूप में वर्णन किया है, क्योंकि ‘उसमें कोई सत्य नहीं हैं’ (यूहन्ना 8 :44 बाइबल)।

परमहंस योगानन्दजी ने लिखा : “संस्कृत शब्द माया का अर्थ है ‘मापक’; यह सृष्टि में एक जादुई शक्ति है जिसके द्वारा अपरिमापकता तथा अभिन्नता में सीमाएँ एवं विभाजन आभासित होते हैं। माया स्वयं प्रकृति है — दृष्टिगोचर विश्व, दिव्य स्थिरता के विरोधाभास में सदैव परिवर्तनकारी प्रवाह के रूप में।” “ईश्वर की योजना एवं लीला में, शैतान या माया का मुख्य कार्य मनुष्य को परमेश्वर से हटाकर पदार्थ की ओर, सत्य से असत्य की ओर मोड़ने का प्रयास करना है। ‘ शैतान प्रारंभ से ही पापकर्मी है। इसी उद्देश्य से ईश्वर का पुत्र प्रकट हुआ था ताकि वह शैतान के कार्यों को नष्ट कर सके ‘ (I यूहन्ना 3 : 8, बाइबल)। अर्थात् मानव के अन्दर अपने कूटस्थ चैतन्य का प्रकटीकरण, शैतान के कार्यों या भ्रमों को बिना प्रयास समाप्त कर देता है।” “माया प्रकृति में अस्थिरता का परदा है, सृष्टि की अबाध रचना; प्रत्येक मनुष्य को इसके पीछे छिपे परमेश्वर, अपरिवर्तनीय, निर्विकार, शाश्वत वास्तविकता की झलक पाने हेतु इस परदे को अवश्य हटाना चाहिए।”

ध्यान : ईश्वर पर एकाग्रता। इस शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से एकाग्रता को अन्तर्मुखी करने तथा ईश्वर के किसी पक्ष पर एकाग्रता करने की किसी प्रविधि के अभ्यास को निर्दिष्ट करने हेतु होता है। विशेष अभिप्राय में ध्यान को ऐसी प्रविधियों के सफल अभ्यास के अन्तिम परिणाम के रूप में इंगित किया जाता है: अन्तर्ज्ञानात्मक बोध द्वारा भगवान् का प्रत्यक्ष अनुभव। पतंजलि के द्वारा वर्णित अष्टांग योग का यह सप्तम चरण (ध्यान) है, केवल वही व्यक्ति इसे पा सकता है जिसने अपने अन्तर में एकाग्रता को स्थिर कर लिया हो जिससे वह पूर्णतः बाहरी विश्व के ऐंद्रिक प्रभावों द्वारा विचलित नहीं होता। गहनतम ध्यान में व्यक्ति योग मार्ग के आठवें अंग: समाधि का, ईश्वर के साथ संपर्क एवं एकात्मता की अनुभूति करता है। (देखें — योग)

मेडुला : शरीर में प्राण शक्ति के प्रवेश का मुख्य द्वार, छठे मेरुदण्डीय चक्र का स्थान, जिसका कार्य है भीतर आने वाली ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के प्रवाह को ग्रहण करके उसे निर्देशित करना। प्राण शक्ति सातवें केन्द्र सहस्रार में एकत्रित होती है, जो कि मस्तिष्क का सबसे ऊपर का स्थान है। इसी संग्रह से यह पूरे शरीर में वितरित होती है। मेडुला में स्थित सूक्ष्म केन्द्र वह मुख्य बटन (स्विच) है जो जीवन शक्ति के प्रवेश, भण्डार, तथा वितरण को नियंत्रित करता है।

परमहंस : एक आध्यात्मिक उपाधि जिसका संकेत गुरु है। इसे केवल एक सच्चे गुरु द्वारा योग्य शिष्य को ही प्रदान किया जाता है। परमहंस का शाब्दिक अर्थ है ‘सर्वोच्च हंस’। हिन्दू धर्मग्रन्थों में हंस आध्यात्मिक विवेक का प्रतीक है। स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने अपने प्रिय शिष्य योगानन्द को यह उपाधि सन् 1935 में प्रदान की थी।

परम गुरु : शाब्दिक अर्थ में ‘पूर्ववर्ती गुरु’, अथवा गुरु का गुरु। योगदा/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन के सदस्यों के (परमहंस योगानन्दजी के शिष्यों के लिए) परम गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी हैं। परमहंसजी के लिए परम गुरु लाहिड़ी महाशय हैं। महावतार बाबाजी परमहंसजी के परम-परम गुरु हैं।

पतंजलि : योग के प्राचीन व्याख्याकार, जिनके योग सूत्र यौगिक पथ के सिद्धान्तों की रूप रेखा हैं, जिसे वे आठ अंगों में विभक्त करते हैं: 1. यम, नैतिक आचरण; 2. नियम, धार्मिक विधान का पालन; 3. आसन, शारीरिक चंचलता को शान्त करने के लिए उचित अंग स्थिति; 4. प्राणायाम, सूक्ष्म जीवन तरंगों, प्राण का नियंत्रण; 5 . प्रत्याहार, अंतर्मुखी होना; 6. धारणा, एकाग्रता; 7. ध्यान तथा 8. समाधि, अधिचेतन अनुभव। देखें — योग

प्रकृति : ब्रह्माण्डीय प्रकृति; सामान्य तौर पर, वह बुद्धिमान, आत्मा से प्रक्षेपित/निकलती हुई सृजनात्मक स्पन्दनशील शक्ति, जो दोनों, मूर्तरूप में और ब्रह्माण्ड की त्रिगुण अभिव्यक्ति (कारण, सूक्ष्म और भौतिक) और मनुष्य के सूक्ष्म जगत के रूप में व्यक्त होती है।

विशेष रूप से निर्दिष्ट : महा-प्रकृति ईश्वर की अभिन्न आदिकालीन सृजनात्मक बुद्विमत्ता है, सृजनात्मक मातृ प्रकृति अथवा पवित्र आत्मा, जो कि स्वयं के ब्रह्माण्डीय स्पन्दन के माध्यम से पूरी सृष्टि को अभिव्यक्त करती है। परा-प्रकृति (शुद्ध प्रकृति) और अपरा-प्रकृति (अशुद्ध प्रकृति), ईसाई शब्दावली से पवित्र आत्मा और शैतान के साथ सहसम्बधी—क्रमशः, सृजनात्मक शक्ति जो सृष्टि में ईश्वर की स्पन्दनात्मक उपस्थिति को दृढ़ करती है, और ब्रह्माण्डीय माया की अनैतिक शक्ति जो दिव्य सर्वव्यापकता को अस्पष्ट करती है।

प्राण : आण्विक ऊर्जा से सूक्ष्म सुबोध ऊर्जा की चिंगारियाँ जो जीवन का निर्माण करती हिन्दू धार्मिक लेखों में सामूहिक रूप से ‘प्राण’ कहा जाता है, जिसका परमहंस योगानन्दजी ने ‘लाइफट्रॉन’ (जीवनाणुओं) के रूप में अनुवाद किया है। मूल रूप में, ईश्वर के सघनित विचार; सूक्ष्म जगत् का मूल पदार्थ तथा भौतिक ब्रह्माण्ड का जीवन सिद्धान्त। भौतिक विश्व में दो प्रकार के प्राण हैं: 1. ब्रह्माण्डीय स्पन्दनशील ऊर्जा, जो विश्व में सर्वव्यापक है और सभी चीजों की संरचना एवं पोषण करती है। 2. विशिष्ट प्राण या ऊर्जा जो प्रत्येक मानव शरीर में व्याप्त है और उसका पाँच विद्युत धाराओं या कार्यों से पालन करती है। प्राण धारा करती है क्रिस्टलीकरण (crystallization); व्यान रक्त संचारण (circulation); समान परिपाचन (अच्छी तरह पचाना) (assimilation); उदान उपपाचन क्रिया (रुपान्तरण करना) (metabolization); और अपान धारा निष्कासन (elimination)।

प्राणायाम : प्राण का सचेतन नियंत्रण (प्राण, वह सृजनात्मक स्पंदन या ऊर्जा जो शरीर में जीवन को सक्रिय तथा पोषित करती है)। प्राणायाम का योग विज्ञान सचेतन रूप से मन को जीवन के कार्यों तथा ऐन्द्रिक बोधों से, जो कि मनुष्य को शारीरिक चेतना से बाँधे रखते हैं, अलग करने का सीधा मार्ग है। इस प्रकार प्राणायाम मनुष्य की चेतना को ईश्वर से संपर्क करने हेतु मुक्त कर देता है। सभी वैज्ञानिक प्रविधियों को, जो आत्मा एवं परमात्मा को मिलाती हैं, योग के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है तथा प्राणायाम इस दिव्य एकता की महानतम यौगिक विधि है।

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