महावतार बाबाजी ने—जो एक महान् अमर योगी हैं—1861 में अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को क्रियायोग की दीक्षा देकर, मानव चेतना के उन्नयन हेतु आत्म-साक्षात्कार की इस युगों पुरानी प्रविधि, प्राचीन क्रियायोग विज्ञान, को पुनर्जीवित किया। वे वाईएसएस/एसआरएफ़ गुरुओं की गरिमामय परम्परा में सर्वोच्च गुरु हैं, एक दिव्य अवतार, जिनका ध्येय सदगुरुओं को उनके विशेष विधानों को सम्पन्न करने में सहायता करना रहा है।
बाबाजी मौन रूप से मानवता के आध्यात्मिक क्रम-विकास का मार्गदर्शन कर रहे हैं। उनसे मिलने वाले कहते हैं कि उनका स्वभाव शुद्ध प्रेम है और विनम्रता उनकी पहचान है। ऐसा कहा जाता है कि केवल उनके पवित्र नाम का श्रद्धापूर्वक उच्चारण करने मात्र से ही तत्क्षण आशीर्वाद प्राप्त होता है।
महावतार बाबाजी के बारे में
बद्रीनाथ के आसपास के उत्तरी हिमालय के पहाड़ आज भी लाहिड़ी महाशय के गुरु बाबाजी की जीवंत उपस्थिति से पावन हो रहे हैं। जन संसर्ग से दूर निर्जन प्रदेश में रहने वाले ये महागुरु शताब्दियों से, शायद सहस्राब्दियों से अपने स्थूल शरीर में वास कर रहे हैं। अमर बाबाजी एक “अवतार” हैं। इस संस्कृत शब्द का अर्थ है “नीचे उतरना।” यह “अव,” अर्थात् “नीचे” और “तृ” अर्थात् “तरण” शब्दों से बना है। हिन्दू शास्त्रों में “अवतार” शब्द का प्रयोग “ईश्वरत्व का स्थूल शरीर में अवतरण” के अर्थ में होता है।
— परमहंस योगानन्द योगी कथामृत
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परमहंस योगानन्दजी की योगी कथामृत के माध्यम से ही विश्व महावतार बाबाजी को जान पाया, जो वास्तव में एक विस्मयकारी आध्यात्मिक विभूति हैं। परमहंसजी अपनी योगी कथामृत में लिखते हैं, “बाबाजी के परिवार या जन्मस्थान के विषय में कभी किसी को कुछ पता नहीं चल पाया। इस मामले में इतिहास लेखकों को निराश ही होना पड़ेगा।” और वे आगे कहते हैं, “एक पूर्ण मुक्त सिद्ध पुरुष का कुल-गोत्र क्या कोई महत्त्व रखता है?”
“…साधारणतया वे हिन्दी में बोलते हैं, परन्तु किसी भी भाषा में आसानी से बोल लेते हैं। उन्होंने बाबाजी (पूज्य पिता) का सीधा-सादा नाम ले लिया है, हालाँकि शिष्य उन्हें महावतार (महान् अवतार), महायोगी, महान् योगी भी कहते हैं।“
महावतार बाबाजी के जन्म और जीवन से संबंधित कोई ऐतिहासिक अभिलेख (रिकॉर्ड) उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी योगानन्दजी ने अपनी योगी कथामृत में लिखा है कि अमर अवतार भारत के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में अनगिनत वर्षों से निवास कर रहे हैं, और वे स्वयं को बहुत कम ही कुछ सौभाग्यशाली व्यक्तियों के समक्ष प्रकट करते हैं।
अमर बाबाजी के शरीर पर आयु का कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होता। वे अधिक से अधिक पच्चीस वर्ष के युवक दिखते हैं। गौरवर्ण, मध्यम कद-काठी के बाबाजी के सुन्दर, बलिष्ठ शरीर पर सहज ही दिख पड़ने योग्य तेज है। नेत्र काले, शान्त और दयाद्र हैं। उनके लम्बे चमकीले केश ताम्रवर्ण के हैं।
जब बाबाजी की इच्छा होती है, तभी उन्हें कोई देख या पहचान पाता है।… ईश्वर ने बाबाजी को इस वर्तमान कल्प के अंत तक इस संसार में सशरीर रहने के लिए चुना है। युग पर युग आएंगे और जाएंगे, परन्तु मृत्युंजय महागुरु युगों के नाटक का अवलोकन करते हुए इस विश्व-रंगमंच पर उपस्थित रहेंगे।
भारत में बाबाजी का कार्य रहा है, जिन विशेष कार्यों के लिए अवतार इस जगत् में आते हैं, उन कार्यों की पूर्ति में उनकी सहायता करना। इस प्रकार शास्त्रीय वर्गीकरण के अनुसार वे एक महावतार हैं। उन्होंने स्वयं बताया है कि संन्यास आश्रम के पुनःसंगठक एवं अद्वितीय तत्त्वज्ञानी जगद्गुरु आदि शंकराचार्य तथा सुप्रसिद्ध मध्ययुगीन सन्त कबीर को उन्होंने योग दीक्षा दी थी। 19वीं शताब्दी के उनके मुख्य शिष्य, जैसा कि हम जानते हैं, लाहिड़ी महाशय थे, जिन्होंने लुप्त क्रियायोग विद्या का पुनरुद्धार किया।
“बाबाजी की आध्यात्मिक अवस्था मानवी आकलनशक्ति से परे है। मनुष्यों की अल्प बुद्धि को उनकी परात्पर अवस्था का ज्ञान कभी नहीं हो सकता। इस अवतार के योगैश्वर्य की केवल कल्पना करने का प्रयास भी व्यर्थ है। यह अकल्पनीय है।”
— स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी योगी कथामृत
“जब भी कोई श्रद्धा के साथ बाबाजी का नाम लेता है…उसे तत्क्षण आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त होता है।”
— लाहिड़ी महाशय योगी कथामृत
हम आपसे परमहंसजी के आध्यात्मिक ग्रन्थ योगी कथामृत का वह अध्याय पढ़ने का आग्रह करते हैं, जिसमें महावतार बाबाजी की आध्यात्मिक गरिमा और विशेष भूमिका का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस महान् आत्मा के बारे में और जानें, जो संसार के उत्थान के लिए कार्य करते हैं और जिन्होंने क्रियायोग मार्ग के साधकों की निरंतर सहायता करने का वचन दिया है।
महावतार बाबाजी के जीवन और शिक्षाओं के बारे में अधिक जानने के लिए, हम आपको योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया के संन्यासियों के ऑनलाइन सत्संग देखने के लिए आमंत्रित करते हैं, जो छह भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हैं : अंग्रेज़ी, हिन्दी, बंगाली, कन्नड़, तमिल और तेलुगु।
अमर क्रियायोग गुरु : महावतार बाबाजी
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क्रियायोग विज्ञान का पुनरुद्धार
क्रियायोग मानवजाति को प्रदान की गई ईश्वर-साक्षात्कार की सर्वाधिक प्राचीन और व्यावहारिक प्रविधियों में से एक है। यह सीधे मेरुदण्ड में प्राण-शक्ति (प्राण) पर कार्य करती है, जो आध्यात्मिक विकास को इस तरह से गति देता है कि साधारण विधियाँ उसकी बराबरी नहीं कर सकतीं। गुरुदेव ने इसे ईश्वर तक पहुँचने का सर्वोच्च मार्ग बताया है। क्रियायोग सभी मानवीय दुःखों का रामबाण है। इसका गुणगान पूर्व युगों में भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में और पतंजलि ने योगसूत्र में किया है।

भगवद्गीता में भगवान् ने अर्जुन से कहा :
“यह अविनाशी योग मैंने विवस्वत (सूर्य-देव) को दिया था; विवस्वत ने यह ज्ञान मनु (हिन्दू विधान देने वाले) को दिया; मनु ने इसे इक्ष्वाकु (क्षत्रियों के सूर्यवंश के संस्थापक) को बताया। इस प्रकार क्रमशः उत्तरोतर आते हुए, इसे राजर्षियों ने जाना था। परन्तु, हे परन्तप! कालान्तर में, यह योग धरती से लुप्त हो गया था।“ — IV:1–2
किन्तु कालांतर में यह पावन विज्ञान लुप्त हो गया। भौतिकवाद के दीर्घ अंधकारमय युगों के दौरान यह साधना-विधि या तो गुप्त रखी गई अथवा विस्मृत हो गई। परिणामस्वरूप, सच्चे साधकों की अनेक पीढ़ियाँ मुक्ति की इस अमूल्य कुंजी से वंचित रह गईं।
फिर, इस युग में कुछ असाधारण घटित हुआ।
बाबाजी ने इस प्रविधि को पुनर्जीवित किया। उन्होंने इस पुनरुद्धार का प्रारम्भ करने के लिए एक महान् गृहस्थ-योगी को अपना साधन चुना, ताकि क्रियायोग सभी तक पहुँच सके — विवाहितों और संन्यासियों दोनों तक।
वे गृहस्थ-योगी लाहिड़ी महाशय थे।
परन्तु बाबाजी ने उन्हें यह प्राचीन नियम भी दिया था कि क्रिया केवल उन्हीं को प्रदान की जाए जो ईश्वर की खोज में सर्वस्व त्यागने की प्रतिज्ञा करते हैं। संसार के ऐसे सभी पीड़ित पुरुषों और स्त्रियों के लिए गहरी करुणा से प्रेरित होकर, जो तीनों प्रकार के दुखों से त्रस्त थे, और यदि उन्हें क्रिया प्रदान नहीं की जाती तो वे कदाचित् कभी भी मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो पाते, लाहिड़ी महाशय ने अपने गुरु से इन कठोर शर्तों को नरम करने की प्रार्थना की — जिससे कि सच्चे साधक भी, जो अभी पूर्ण आंतरिक वैराग्य के लिए तैयार नहीं थे, क्रियायोग की मुक्तिदायी कृपा प्राप्त कर सकें।
“तथास्तु,” बाबाजी ने कहा। “तुम्हारे माध्यम से ईश्वरीय इच्छा प्रकट हुई है। जो भी विनम्रता के साथ तुमसे सहायता की याचना करें, उन सबको क्रिया दे दो।”
बाबाजी ने कहा, “अपने प्रत्येक शिष्य को श्रीमद्भगवद्गीता का वह अमर वचन अवश्य बताना : स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। [इस धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु के चक्र में निहित महान् भय से तुम्हारी रक्षा करेगा।]”
क्रियायोग का विश्वव्यापी प्रसार
लाहिड़ी महाशय संसार में — अपने परिवार, अपने कार्यालय, अपने साधारण जीवन में लौट आए। बनारस स्थित अपने घर से, उन्होंने बिना किसी आडंबर और उद्घोषणा के, श्रद्धावान् भक्तों को चुपचाप क्रियायोग की दीक्षा देना आरम्भ कर दिया। उनके महानतम शिष्यों में श्री प्रियनाथ करार नामक एक युवा पुरुष थे, जिन्हें स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि के नाम से जाना जाने लगा।

श्रीयुक्तेश्वरजी गहन आत्म-साक्षात्कार के सिद्ध गुरु थे — एक ज्ञानावतार अथवा “ज्ञान के अवतार”, जैसा कि परमहंस योगानन्दजी ने बाद में उनका वर्णन किया — जिनकी भेदन करने वाली अंतर्दृष्टि और कठोर आध्यात्मिक अनुशासन ने अनेक मुमुक्षुओं का ईश्वर की ओर मार्गदर्शन किया।
सन् 1894 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में श्रीयुक्तेश्वरजी स्वयं बाबाजी से मिले। बाबाजी ने अपनी पहचान बताए बिना उनसे कहा :
“पूर्व और पश्चिम को कर्म और आध्यात्मिकता से मिलकर बना सुवर्णमध्य मार्ग स्थापित करना होगा। मैं अमेरिका और यूरोप में सन्त बनने योग्य अनेक लोगों को देख रहा हूँ, जिन्हें जगाये जाने भर की देर है। स्वामीजी, आपको भविष्य में होने वाले सौहार्द्रपूर्ण आदान-प्रदान में एक भूमिका निभानी है। कुछ वर्षों बाद मैं आप के पास एक शिष्य भेजूँगा, जिसे आप पश्चिम में योग का ज्ञान प्रसारित करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं।”
वह शिष्य मुकुंद लाल घोष थे, जो बाद में परमहंस योगानन्द बने।
और इस प्रकार क्रियायोग की पवित्र मशाल एक बार फिर — श्रीयुक्तेश्वरजी से उस युवा संन्यासी को हस्तांतरित हुई, जो इसे समुद्र पार ले जाते।
परमहंस योगानन्दजी ने श्रीयुक्तेश्वरजी के कठोर और प्रेमपूर्ण मार्गदर्शन में अपना प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्हें न केवल क्रियायोग में दीक्षा दी गई, बल्कि स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी द्वारा संन्यास भी दिया गया। उन्होंने गुरु परम्परा के माध्यम से हस्तांतरित आत्म-साक्षात्कार की अखंड धारा प्राप्त की।
1920 में एक दिन, अपने राँची आश्रम और विद्यालय में ध्यान करते हुए, योगानन्दजी को एक दिव्य दृष्टि हुई, जिसमें उन्हें यह दिखाया गया कि अब पश्चिम में अपना कार्य शुरू करने का समय आ गया है। वे तुरंत कलकत्ता के लिए रवाना हुए, जहाँ अगले दिन उन्हें उसी वर्ष बाद में बॉस्टन में आयोजित होने वाली धार्मिक नेताओं के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में भाग लेने के लिए भारत के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया। श्रीयुक्तेश्वरजी ने यह कहते हुए इस तथ्य की पुष्टि की कि उचित समय यही है : “तुम्हारे लिए सभी द्वार खुले हैं। अभी या कभी नहीं।”
अपने प्रस्थान से कुछ समय पहले, योगानन्दजी से महावतार बाबाजी मिलने आए थे, वे मृत्युहीन गुरु जिन्होंने इस युग में क्रियायोग के प्राचीन विज्ञान को पुनर्जीवित किया। बाबाजी ने योगानन्दजी से कहा, “तुम ही वह हो जिसे मैंने पाश्चात्य जगत् में क्रियायोग का प्रसार करने के लिए चुना है। बहुत वर्ष पहले मैं तुम्हारे गुरु युक्तेश्वर से एक कुम्भ मेले में मिला था और तभी मैंने उनसे कह दिया था कि मैं तुम्हें उनके पास शिक्षा ग्रहण के लिए भेज दूँगा। ईश्वर-साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रणाली क्रियायोग का अन्ततः सब देशों में प्रसार हो जाएगा और मनुष्य को अनन्त परमपिता का व्यक्तिगत इंद्रियातीत अनुभव कराने के अलावा यह राष्ट्रों के बीच सौमनस्य-सौहार्द्र स्थापित कराने में सहायक होगा।”
सितम्बर 1920 में, युवा स्वामी बॉस्टन पहुँचे। वे एक ऐसे देश गए थे जो क्रियायोग के विषय में नहीं जानता था, जो भारत के प्राचीन ज्ञान के आध्यात्मिक ख़ज़ाने को अभी तक नहीं समझता था—और उन्होंने बाबाजी के पवित्र कार्य को एक विश्वव्यापी मिशन में बदल दिया, जो आज तक फल-फूल रहा है।
योगानन्दजी का पहला भाषण, जो धार्मिक उदारतावादियों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन (International Congress of Religious Liberals) में दिया गया था, यह “धर्म विज्ञान” पर था, और उसे अत्यधिक उत्साहपूर्वक सुना गया। उसी वर्ष उन्होंने भारत के प्राचीन विज्ञान और योग-दर्शन, तथा इसकी कालजयी ध्यान परम्परा की शिक्षाओं का विश्वव्यापी प्रसार करने के लिए सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की।
परमहंस योगानन्दजी ने विश्व में बाबाजी के अभियान को पूरा करने के लिए योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (वाईएसएस) और सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप (एसआरएफ़) को जुड़वाँ माध्यमों के रूप में स्थापित किया। वाईएसएस भारत और पड़ोसी देशों में परमहंसजी के कार्य को आगे बढ़ाता है; जबकि एसआरएफ़ उनके कार्य को शेष विश्व तक पहुँचाता है।
पश्चिम में अपने मिशन के शुरुआती वर्षों से ही, परमहंसजी ने योग सिद्धांतों और प्रविधियों में एक व्यवस्थित शिक्षा पाठ्यक्रम विकसित करना शुरू कर दिया था, जो गंभीर साधकों को बाबाजी द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं के अनुसार क्रियायोग दीक्षा के लिए तैयार करेगा। उन्होंने योगदा सत्संग/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप पाठमाला का सृजन किया—एक व्यापक गृह-अध्ययन पाठ्यक्रम, जिसमें क्रियायोग ध्यान की वैज्ञानिक प्रविधियाँ और संतुलित जीवन के सिद्धांत, दोनों शामिल हैं, जिसे दुनिया में कहीं भी किसी भी सच्चे साधक तक पहुँचने के लिए तैयार किया गया है।
पाठमाला केवल पत्राचार सामग्री नहीं है। इसमें गुरु-परंपरा के सजीव स्पंदन समाये हैं। उनके माध्यम से, महावतार बाबाजी द्वारा पुनरुज्जीवित क्रियायोग की प्रविधि को उसके मूल, अविरल रूप में—विकृति से सुरक्षित, और निष्ठा के साथ संरक्षित—प्रसारित किया जाता है। हमारे गुरु, योगानन्दजी ने इस प्रकार साधक और गुरु-परम्परा के बीच एक सीधा, व्यक्तिगत संबंध स्थापित किया, जिसके लिए प्रत्यक्ष मुलाकात की आवश्यकता नहीं।
इस पाठमाला के माध्यम से, गुरुदेव परमहंस योगानन्दजी ने क्रियायोग की आत्म-मुक्तिदायिनी प्रविधि को हर सच्चे आध्यात्मिक साधक के लिए विश्वव्यापी रूप से उपलब्ध कराया है।
वाईएसएस/एसआरएफ़ पाठमालाएँ एक प्रामाणिक द्वार प्रदान करती हैं। वे क्रियायोग की पवित्र शिक्षाओं को प्रस्तुत करती हैं, जैसा कि गुरुजनों—महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, स्वामी श्रीयुक्तेश्वर और परमहंस योगानन्दजी—की परम्परा के माध्यम से संरक्षित और प्रसारित किया गया है। यह किसी संगठनात्मक दावे के कारण नहीं है, बल्कि इसलिए है कि यह वह माध्यम है जिसके द्वारा बाबाजी ने इन शिक्षाओं को विश्व को प्रदान करने का आदेश दिया था।
“एक विशेष ईश्वरीय विधान के रूप में, श्रीकृष्ण, क्राइस्ट, महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, और स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी के माध्यम से, मुझे क्रियायोग विज्ञान को संसार भर में प्रसारित करने के लिए चुना गया था, जो श्रीकृष्ण द्वारा बताये गए मूल योग एवं क्राइस्ट द्वारा बताये गए मूल ईसाई धर्म की एकता द्वारा सम्पादित होना था, जैसा कि योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की शिक्षाओं में प्रस्तुत किया गया है।”
— परमहंस योगानन्द
बाबाजी ने पहले ही देख लिया था कि वह समय आ रहा है जब दुनिया को अपनी विघटनकारी प्रवृत्ति, सांप्रदायिक घृणा एवं नास्तिक विचारधारा को त्यागना ही होगा तथा इस आरोही युग में वैज्ञानिक ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ मानवजाति को भाईचारे के साथ रहना सीखना होगा; नहीं तो वह स्वयं को नष्ट कर लेगी। क्रियायोग को पश्चिम में भेजने से परम सत्य का सार—वह ज्ञान जिसे सदा ही आध्यात्मिक मातृभूमि भारत द्वारा संजोकर रखा गया है—कालांतर में एक महान् प्रकाश की तरह पूरे विश्व में व्याप्त होगा और इस तरह धीरे-धीरे शांति, आपसी समझ, एकता, सद्भावना एवं भाईचारा फैलेगा।
वाईएसएस/एसआरएफ़ ने भारत में और पूरे विश्व में बड़ी संख्या में आश्रम, ध्यान केन्द्र और रिट्रीट स्थापित किए हैं, जो आध्यात्मिक आश्रय स्थलों के रूप में कार्य करते हैं, क्रियायोग की प्राचीन वैज्ञानिक प्रविधियों का प्रसार करते हैं, और लाखों लोगों को आत्म-साक्षात्कार की अपनी यात्रा में मार्गदर्शन दे रहे हैं।
वाईएसएस और एसआरएफ़ मिलकर 175 से अधिक देशों में भक्तों की सेवा करते हैं। परमहंस योगानन्दजी की योगी कथामृत — जिसके माध्यम से दुनिया ने पहली बार बाबाजी के बारे में जाना — का 50 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया गया है और इसे 20वीं सदी की सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक पुस्तकों में माना जाता है। अनगिनत क्रियायोगी प्रतिदिन अपने घरों में, अथवा दुनिया भर में वाईएसएस/ एसआरएफ़ के ध्यान केन्द्रों और आश्रमों में इस पवित्र प्रविधि का अभ्यास करते हैं।
“यह कार्य ईश्वर द्वारा बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, तथा मेरे गुरुदेव, श्रीयुक्तेश्वरजी के माध्यम से भारत, अमेरिका, और सारे विश्व के लिए भेजा गया है। तुम देखोगे कि यह एक मन्द पवन की भाँति प्रारम्भ होगा। फिर यह और शक्तिशाली पवन बन जायेगा। समय के साथ यह एक अत्यंत वेगवान वायु बन जायेगा, एक ऐसी शक्ति जो इस माया जगत् की अशुद्धियों को दूर करने में आश्चर्यजनक कल्याण करेगी।”
— परमहंस योगानन्द
महावतार बाबाजी की गुफा
महावतार बाबाजी द्वारा 1861 में क्रियायोग का पुनरुद्धार आधुनिक युग के आध्यात्मिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। यह दिव्य घटना हिमालय के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित सुरम्य दूनागिरी पर्वतों की गोद में एक छोटी गुफा में घटी थी। इस पवित्र गुफा में, महावतार बाबाजी ने अपने अत्यंत उन्नत शिष्य, लाहिड़ी महाशय को क्रियायोग के प्राचीन विज्ञान की दीक्षा प्रदान की। सभी क्रियायोगी अपनी गुरु-परम्परा को इसी घटना से जोड़ते हैं।
महावतार बाबाजी और लाहिड़ी महाशय के आशीर्वाद इस पवित्र गुफा और आसपास के क्षेत्र में अब भी व्याप्त हैं।
इस गुफा में लाहिड़ी महाशय की अपने दिव्य गुरु से पहली मुलाकात और उनके पूर्व जीवन की स्मृतियों के पुनः जागृत होने की अद्भुत कहानी को जानने के लिए, और इस गुफा के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए, यह सुझाव दिया जाता है कि पाठक योगी कथामृत से अध्याय 34, “हिमालय में महल का सृजन” को पढ़ें।
यदि आप हिमालय में महावतार बाबाजी की गुफा में यात्रा की योजना बनाना चाहते हैं, तो कृपया द्वाराहाट स्थित योगदा सत्संग शाखा आश्रम से संपर्क करें।
महावतार बाबाजी का आशीर्वाद
सन् 1963-64 में महावतार बाबाजी की गुफ़ा की अपनी यात्रा के दौरान, श्री दया माता (जो 1955 से 2010 में अपने देहत्याग तक वाईएसएस/एसआरएफ़ की तीसरी अध्यक्ष और संघमाता थीं) को महान् गुरु के साथ एक दिव्य अनुभव हुआ, जिसका उन्होंने अपनी पुस्तक केवल प्रेम में सजीव वर्णन किया है। उसका एक अंश नीचे साझा किया गया है :
“…अचानक संपूर्ण कक्ष सुनहरे प्रकाश से जगमगा उठा। फिर वह प्रकाश चमकीला नीला हो गया, और एक बार फिर हमारे प्रिय बाबाजी की उपस्थिति का आभास होने लगा! इस बार उन्होंने कहा, “मेरी बच्ची, यह जान लो कि मुझे खोजने के लिए भक्तों को इस स्थान पर आने की आवश्यकता नहीं है। जो कोई भी मुझमें विश्वास करते हुए और मुझे पुकारते हुए गहन भक्ति-भाव के साथ अपने अंतर् में जाएगा, उसे मेरा प्रत्युत्तर प्राप्त होगा।”
फिर मैंने कहा, “बाबाजी, मेरे प्रभु, हमारे गुरुजी ने हमें सिखाया कि जब कभी हम ईश्वर के ज्ञान स्वरूप को अनुभव करना चाहें तो हमें श्रीयुक्तेश्वरजी से प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि वे ज्ञान के मूर्त रूप हैं; और जब कभी हम परमानन्द का अनुभव करना चाहें, तो लाहिड़ी महाशय के साथ समस्वरित स्थापित करना चाहिए। आपकी प्रकृति क्या है?” जैसे ही मैंने यह कहा, ओह, मैंने अनुभव किया कि जैसे मेरा हृदय प्रेम से फटा जा रहा है, इतना प्रेम मानो हज़ारों लाखों प्रेम एक में ही समाहित हो गए हों! वे केवल प्रेम हैं; उनका पूरा स्वरूप ही दिव्य प्रेम है।
यद्यपि यह मौन वार्तालाप था, तथापि इससे अधिक सारगर्भित उत्तर की मैं कल्पना नहीं कर सकती थी; परंतु बाबाजी ने इसे और अधिक मधुर एवं अर्थपूर्ण बना दिया जब उन्होंने इसमें ये शब्द जोड़ दिए : “मेरा स्वरूप प्रेम है; क्योंकि यह केवल प्रेम ही है जो इस संसार को बदल सकता है।”
महावतार बाबाजी से सम्बंधित विवरण (योगी कथामृत से)
परमहंस योगानन्दजी ने अपनी पुस्तक योगी कथामृत के अध्याय 33 में महावतार बाबाजी के जीवन से जुड़ी कुछ रुचिकर कहानियाँ बताई हैं। उनमें से तीन कहानियाँ नीचे दी गई हैं। पहली दो कहानियाँ स्वामी केवलानन्द ने सुनाई थीं, जो परमहंस योगानन्दजी के संस्कृत शिक्षक थे और जिन्होंने हिमालय में बाबाजी के साथ कुछ समय बिताया था। तीसरी कहानी योगानन्दजी को श्री राम गोपाल मुजुमदार ने सुनाई थी, जिन्हें योगी कथामृत में “विनिद्र सन्त” के रूप में वर्णित किया गया है।
केवलानन्दजी ने परमहंसजी से कहा :
“बाबाजी के जीवन की दो विस्मयकारी घटनाएँ मुझे ज्ञात हैं। एक रात उनके शिष्य वैदिक होम के लिए जल रही विशाल अग्नि ज्वालाओं को घेर कर बैठे थे। अचानक महागुरु ने एक जलती लकड़ी उठा ली और अग्नि के पास ही बैठे एक शिष्य के नंगे कंधे पर उससे हल्का-सा प्रहार किया।
“यह तो क्रूरता है, गुरुदेव!” वहाँ उपस्थित लाहिड़ी महाशय ने अपना विरोध प्रकट किया।
“‘अपने गतकर्मों के फलस्वरूप तुम्हारी आँखों के सामने वह पूरा जलकर राख हो जाता, तो क्या वह तुम्हें अच्छा लगता?’
“इन शब्दों के साथ ही बाबाजी ने शिष्य के आहत कंधे पर अपना आरोग्यप्रद वरद्हस्त रखा और कहा : ‘आज रात मैंने तुम्हें पीड़ादायक मृत्यु के हाथों से मुक्त कर दिया है। अग्निदाह की किंचित्-सी पीड़ा अनुभव करने से तुम्हारा कर्मभोग मिट गया है।’
“एक अन्य अवसर पर एक अपरिचित व्यक्ति के आगमन से बाबाजी की पवित्र टोली की शान्ति थोड़ी-सी भंग हो गई। वह व्यक्ति गुरु के डेरे के निकट ही स्थित एक दुर्लघ्य पर्वत शिखर पर विस्मयकारी निपुणता के साथ चढ़ आया था।
“‘महाराज, अवश्य आप ही महान् बाबाजी हैं।’ उस आदमी का चेहरा अवर्णनीय श्रद्धा और आदर से दमक रहा था। ‘इन दुर्गम पर्वतों में मैं महीनों से आपकी तलाश में भटक रहा हूँ। आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि आप मुझे शिष्य रूप में स्वीकार करें।’
“जब महागुरु ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया, तो उस आदमी ने पर्वत शिखर के नीचे पत्थरों से भरी गहरी खाई की ओर हाथ दिखाकर कहा : ‘आप यदि मुझे स्वीकार नहीं करेंगे, तो मैं इस पर्वत से कूद पड़ूँगा। ईश्वर तक पहुँचने के लिए यदि मैं आपका मार्गदर्शन नहीं पा सकता, तो मेरे जीवित रहने का कोई अर्थ नहीं है।’
“‘तो कूद पड़ो,’ बाबाजी ने निर्विकार रहते हुए कहा। ‘उन्नति की तुम्हारी वर्तमान अवस्था में मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता।’
“उस मनुष्य ने तुरन्त अपने आपको नीचे झोंक दिया। स्तब्ध हुए शिष्यों को बाबाजी ने उसके शरीर को उठा लाने का आदेश दिया। जब शिष्यों ने वह क्षत-विक्षत शव लाकर उनके सामने रख दिया, तो बाबाजी ने उस पर अपना हाथ रखा। परम आश्चर्य! उस आदमी ने आँखें खोलीं और सर्वशक्तिमान गुरु के चरणों में साष्टांग लोट गया।
“‘अब तुम शिष्य बनने के अधिकारी हो गए हो।’ पुनरुज्जीवित चेले की ओर देखकर अत्यंत स्नेह से मुस्कराते हुए बाबाजी ने कहा। ‘तुमने साहस के साथ इस कठिन परीक्षा में सफलता प्राप्त की है। अब मृत्यु कभी तुम्हारा स्पर्श नहीं करेगी। अब तुम हमारी अमर मंडली में शामिल हो गए हो।’ फिर उन्होंने सदा की तरह प्रस्थान का आदेश दिया : ‘डेरा डंडा उठाओ।’ पूरा दल तत्क्षण उस पर्वत से अदृश्य हो गया।”
जब मैं रणबाज़पुर में “विनिद्र सन्त” रामगोपाल के पास गया था, तब उन्होंने बाबाजी के साथ अपनी पहली भेंट की विस्मयजनक कहानी मुझे बतायी थी।
उन्होंने कहा था : “मैं कभी-कभी अपनी एकांत गुफा से बाहर निकल कर काशी में लाहिड़ी महाशय के चरणकमलों में जा बैठता था। एक दिन मध्यरात्रि को जब मैं उनके घर में उनके शिष्यों के बीच बैठकर चुपचाप ध्यान कर रहा था, तब गुरुदेव ने अचानक मुझे एक चकित कर देने वाला आदेश दिया।
“उन्होंने कहा : ‘रामगोपाल, तुरन्त, इसी क्षण दशाश्वमेध घाट पर चले जाओ।’
“मैं तुरन्त उस निर्जन घाट पर पहुँच गया। चंद्रमा के प्रकाश और तारों की जगमगाहट से रात उजली थी। थोड़ी देर ही मैं वहाँ चुपचाप धीरज के साथ बैठा था, कि मेरा ध्यान अपने पाँवों के पास स्थित एक विशाल शिला की ओर आकृष्ट हुआ। वह शिला धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी और उसके नीचे एक भूमिगत गुफा दिखायी देने लगी। जब वह शिला हवा में स्थिर हो गई, मानो किसी अज्ञात शक्ति ने उसे वहाँ पकड़ रखा हो, तब उस गुफा से एक अत्यंत लावण्यवती स्त्री बाहर आयी और हवा में ऊँची उठ गई। एक शान्तिप्रद तेज में वह नारी मूर्ति वेष्टित थी। धीरे-धीरे नीचे आकर वे मेरे सामने परमानन्द में मग्न, निश्चल खड़ी रहीं। आखि़र उनमें हलचल हुई और वे अत्यंत सौम्य वाणी में बोलने लगीं :
“‘मैं बाबाजी की बहन माताजी हूँ। मैंने बाबाजी को और लाहिड़ी महाशय को भी, आज रात एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिए अपनी गुफा में बुलाया है।’
“एक प्रकाशपुंज गंगा के ऊपर तेजी से उड़ता हुआ आता दिखायी दिया। अपारदर्शी पानी में उसका प्रतिबिंब दिखायी दे रहा था। वह प्रकाश हम लोगों की ओर बढ़ता गया और कौंध कर चकाचौंध करता हुआ माताजी के पास आकर रुक गया और तुरन्त लाहिड़ी महाशय के मानव रूप में परिवर्तित हो गया। लाहिड़ी महाशय ने अत्यंत विनम्रता के साथ माताजी के चरणों में प्रणाम किया।
“मैं इस आश्चर्य से उभरा भी नहीं था, कि आश्चर्य का दूसरा धक्का मुझे लगा। गोल-गोल घूमता एक विस्मयकारी प्रकाशपुंज आकाश मार्ग से आते हुए मैंने देखा। तीव्र गति से नीचे आता हुआ अग्निगोले के समान वह तेजोपुंज हम लोगों के समीप आया और उसने एक अत्यंत सुन्दर युवक का रूप धारण कर लिया। मैं तुरन्त ही समझ गया कि वे बाबाजी थे। उनका चेहरा लाहिड़ी महाशय जैसा ही था; परन्तु बाबाजी अपने शिष्य से कहीं अधिक युवा दिख रहे थे और उनके लम्बे, तेजस्वी केश थे।
“लाहिड़ी महाशय, माताजी और मैंने गुरुदेव के चरणों में प्रणाम किया। उनके दिव्य शरीर का स्पर्श करते ही मेरे शरीर का रोम-रोम स्वर्गीय अनुभूति एवं अवर्णनीय आनन्द से झंकृत हो उठा।
“बाबाजी ने कहा : ‘हे कल्याणी, मैं अपने स्थूल शरीर को त्याग कर “अनन्त प्रवाह” में विलीन हो जाने का विचार कर रहा हूँ।’
“‘पूज्य गुरुदेव, मैं आपके मन्तव्य का आभास पा चुकी हूँ और इसीलिए आज रात मैं इस पर आपके साथ विचार-विमर्श करना चाहती थी। आपको शरीर त्यागने की क्या आवश्यकता है?’ यह कहते हुए वह स्वर्गीय तेजस्वितापूर्ण स्त्री उनकी ओर अनुरोध भरी दृष्टि से देखती रही।
“‘अपने ब्रह्मसागर में मैं दृश्य या अदृश्य तरंग को धारण करूँ, इससे क्या फर्क पड़ता है?’
“माताजी ने विलक्षण वाक् पटुता का परिचय देते हुए कहा : ‘मृत्युंजय गुरुदेव, यदि कोई फर्क नहीं पड़ता, तो कृपा करके अपने शरीर का त्याग मत कीजिये।’
“‘तथास्तु!’ बाबाजी ने शान्त स्वर में कहा। ‘मैं अपने स्थूल शरीर का त्याग कभी नहीं करूँगा। इस पृथ्वी पर कम-से-कम कुछ लोगों के लिए तो यह शरीर सदैव दृश्यमान रहेगा। तुम्हारे मुख से प्रभु ने अपनी इच्छा व्यक्त की है।’
“मैं विस्मयविभोर होकर इन दिव्य विभूतियों का संवाद सुन रहा था। मुझपर अपनी कृपादृष्टि डालते हुए अमर महागुरु ने कहा :
“‘डरो मत, रामगोपाल, इस अमर वचन के साक्षी बन कर तुम धन्य हो गए हो।’
“मधुर संगीत-सा लगता बाबाजी का स्वर जब वातावरण में लीन हो गया, तो उनका और लाहिड़ी महाशय का शरीर धीरे-धीरे हवा में ऊपर उठ गया और गंगा के ऊपर से दोनों शरीर पीछे जाने लगे। दीप्तिमान प्रकाश के गोलों ने उनके शरीरों को घेर लिया और वे रात के आकाश में अदृश्य हो गए। माताजी का शरीर हवा में उठकर गुफा के पास गया और अन्दर उतर गया; शिला नीचे आ गई और गुफा के मुँह पर बैठ गई, जैसे किन्हीं अदृश्य हाथों ने उसे वहाँ रख दिया हो।
“असीम प्रेरणा से ओतप्रोत होकर मैं लाहिड़ी महाशय के घर वापस गया।“
महावतार बाबाजी स्मृति दिवस
महावतार बाबाजी स्मृति दिवस प्रत्येक वर्ष 25 जुलाई को मनाया जाता है। यह उस पवित्र मिलन का स्मरण कराता है जब महावतार बाबाजी ने परमहंस योगानन्दजी को क्रियायोग की शिक्षाओं को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित करने का दायित्व सौंपा था।
इस पवित्र दिन को चिह्नित करने के लिए वाईएसएस आश्रमों और केन्द्रों में एक विशेष स्मरणोत्सव (जिसमें ध्यान, प्रेरणादायक पठन और चैंटिंग के सत्र होते हैं) आयोजित किया जाता है। भक्तों के ऑनलाइन भाग लेने के लिए वाईएसएस के किसी एक आश्रम से इसका सीधा प्रसारण भी किया जाता है।
















