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गुरु पूर्णिमा – 2017

24 मई, 2017

इस वर्ष 9 जुलाई को मनाई जा रही गुरु पूर्णिमा के लिये हमारी पूजनीय संघमाताजी का विशेष सन्देश्

प्रिय आत्मन्,

गुरु पूर्णिमा के दिन, गुरु को श्रद्धांजलि देने की प्राचीन एवं पवित्र परंपरा में हम सम्पूर्ण भारत एवं सारे विश्व के भक्तों के साथ हैं। गुरु, माया का अँधकार मिटाने वाले, तथा हमें ईश्वर तक वापिस ले जाने के लिये उनके द्वारा भेजे गये मार्गदर्शक होते हैं। योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की स्थापना के इस विशेष शताब्दी वर्ष में, यह देखकर हमारे हृदय आनन्द से सराबोर हो रहे हैं कि कैसे हमारे प्रिय गुरुदेव श्री श्री परमहंस योगानन्द की सार्वभौमिक शिक्षायें उनकी मातृभूमि तथा सारे विश्व में निरंतर फैल रही हैं, और इस द्वन्द्वात्मक जगत् के निरंतर परिवर्तन के बीच आध्यात्मिक आधार खोज रहीं असंख्य आत्माओं का कल्याण कर रही हैं। आइये, गुरु पूर्णिमा के इस पावन दिवस को एक ऐसा अवसर बनायें कि जब हम एक ईश्वर-प्राप्त गुरु के पास लाये जाने के हमें प्राप्त सर्वोच्च आशीर्वाद के प्रति पुन: कृतज्ञ हों, तथा इस दिव्य उपहार का अधिकतम लाभ लेने का संकल्प लें।

गुरुजी ने कहा है, “आध्यात्मिक पथ पर स्वयं के बल पर प्रगति करना अत्यंत कठिन है, किन्तु यदि आपके पास एक ऐसे सद्गुरु हैं जिनके प्रति आप स्वयं को समर्पित कर दें और जिनकी एकमात्र रुचि आपके आध्यात्मिक कल्याण में ही हो, तो यह अत्यंत सरल हो जाता है।” एक ऐसी आत्मा के माध्यम से, जो कि ईश्वर के प्रेम एवं ज्ञान का विशुद्ध माध्यम है, ईश्वर स्वयं शाश्वत परमानन्द की चेतना के हमारे सच्चे निवास में हमें सुरक्षित रूप से ले जाने हेतु हमारा मार्गदर्शन करने के लिये आते हैं। गुरु हमें प्रोत्साहित करते हैं और वह प्रत्येक वस्तु प्रदान करते हैं जिसकी हमें उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिये आवश्यकता होती है। परन्तु अपने विकल्पों को चुनने की हमारी स्वतंत्रता का वे आदर भी करते हैं; और उनके परामर्श का अनुसरण करने में हमारी तत्परता तथा दृढ़ बने रहने की प्रेरणा यह निर्धारित करती है कि हम उनकी असीमित आध्यात्मिक उदारता से कितना ग्रहण करते हैं। जब सब कुछ ठीक चल रहा हो—जब हमारी इच्छा उनकी इच्छा के अनुरूप हो, और जब हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर मिल रहे हों—तब गुरु के साथ समस्वर होना सरल होता है। परन्तु हमारी आध्यात्मिक यात्रा में ऐसे भी अवसर होते हैं जब उनकी ज्ञान-निर्देशित इच्छा, जो हमारी आवश्यकता को स्पष्ट रूप से देखती है, हमारी मानवीय प्रकृति की इच्छाओं के साथ संघर्ष करती है, और “क्षुद्र अहं” विद्रोह कर उठता है। यदि ऐसे अवसरों पर आप उनमें अपना विश्वास रखने के विकल्प को चुनते हैं, और अहं की प्राथमिकताओं में नहीं, तथा अपनी इच्छा को छोड़ देते हैं, तो आप आत्मा की स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण क़दम उठा रहे हैं। इस प्रकार से समर्पण करने का अर्थ रचनात्मक कर्म का त्याग नहीं है, बल्कि गुरु के साथ सहयोग करना है, जो केवल आपका परम हित ही चाहते हैं। यह समझने में अपने लिये उनसे सहायता की याचना कर कि वे आपको क्या सिखाना चाहते हैं, आप चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी उनके जीवन-रूपान्तरकारी आशीर्वादों के रत्नों को प्राप्त करेंगे।

जैसे-जैसे आप अपने जीवन में गुरु की निरंतर विद्यमानता बनाये रखते हैं उनमें आपका विश्वास बढ़ता है। अपने ध्यान की बढ़ती गहराई के साथ आप अपने हृदय में शान्ति, प्रेम, या आनन्द के रूप में उनकी निकटता का अनुभव करेंगे। और उनकी शिक्षाओं का नियमित रूप से अध्ययन कर—उनके मार्गदर्शन तथा उनकी ईश-चेतना के स्पंदन को आत्मसात् कर—आप पायेंगे कि जब आपको आवश्यकता होगी तब उनके शब्द आपकी सहायता के लिये आयेंगे। जैसा की गुरुजी ने वचन दिया है, “आप मेरे साथ जितने अधिक समस्वर होंगे मैं आत्मिक रूप से उतना ही अधिक आपके साथ रहूँगा।” गुरु की सहायता एवं ईश्वर के अनुग्रह से कई जन्मों के कर्मों को मिटाया जा सकता है, और यदि आप सच्चे मन से एवं भक्तिपूर्वक उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारते हैं, तो वे आपको नित्य-नवीन आनन्द के लोक में ले जायेंगे जहाँ वे स्वयं निवास करते हैं।

आप पर सदा ईश्वर एवं गुरु के प्रेम और आशीर्वादों की छत्रछाया बनी रहे,

श्री श्री मृणालिनी माता

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