गुरु पूर्णिमा 2018 पर स्वामी चिदानन्द गिरि का संदेश

इस वर्ष 27 जुलाई को मनाई जा रही गुरु पूर्णिमा के लिये हमारे आदरणीय अध्यक्ष का विशेष सन्देश

प्रिय आत्मन्,

गुरु पूर्णिमा के इस पावन दिवस पर, गुरु-पूजा की इस प्राचीन परंपरा में हम भारत एवं विश्व भर के भक्तों के साथ शामिल हैं। गुरु, वह दिव्य मित्र एवं सखा होते हैं जिन्हें ईश्वर गहनता से अपनी खोज में लगे भक्तों की आत्म-जागृति के लिये अपने प्रेम और ज्ञान के एक विशुद्ध माध्यम के रूप में उनका कार्य करने के लिये भेजते हैं। हमारे प्रिय गुरुदेव श्री श्री परमहंस योगानन्द के चरणों में अपना प्रेम एवं कृतज्ञता अर्पित करते हुए, उनकी आध्यात्मिक प्रचुरता के लिये अपने हृदय को पूरी तरह खोल दें। हम आध्यात्मिक मार्ग पर एक ऐसी ईश्वर से युक्त आत्मा की ओर आकर्षित किये जाने से बड़ा और कोई उपहार प्राप्त नहीं कर सकते जो हमारी माया-बद्ध प्रकृति से हमें ईश्वर के आनन्द-चैतन्य की असीमित स्वतंत्रता तक ले जा सके।

आपके जीवन में गुरु के आने के साथ ही, आपका आत्मिक मुक्ति का द्वार खुल जाता है, क्योंकि गुरु एवं उनकी शिक्षाओं के माध्यम से, ईश्वर स्वयं आपका हाथ थाम कर उस यात्रा में आपका मार्गदर्शन करते हैं। क्रियायोग विज्ञान में, हमारे गुरु ने हमें अपने चंचल मन को शान्त करने की पवित्र प्रविधियों दी है। उनकी ईश्वर-प्रेरित शिक्षाओं तथा उनके जीवन-ग्रंथ में, उन्होंने हमें यह दिखाया है कि प्रेम एवं सत्य के ईश्वरीय विधानों के साथ समस्वर होकर कैसे रहा जा सकता है। और सदा हमारे साथ रहने के लिये उन्होंने हमें अपना निःशर्त प्रेम दिया है। गुरुजी के इन शब्दों को याद रखिये, “तुम्हें ईश्वर ने मेरे पास भेजा है, और मैं कभी तुम्हें निराश नहीं करूंगा।” इस पूरे मार्ग पर चलते हुए इस वचन को प्रत्येक कदम पर अपने हृदय में बनाये रखिये। गुरु आप में विश्वास रखते हैं, क्योंकि दोषयुक्त मानवीय प्रकृति के आवरण के नीथे, ये वास्तविक “आप” — ईश्वर के दिव्य गुणों को अभिव्यक्त करने की क्षमता से भरी आपकी आत्मा, को देखते हैं। यदि आप मानवीय अपूर्णताओं एवं पिछली त्रुटियों पर ही सोचते रहने के स्थान पर, अपनी सहायता के लिये गुरु की असीम शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो आदतों एवं कर्म की कोई भी बाधा आपकी प्रगति की राह में खड़ी नहीं हो सकती। गुरुजी ने हमें आश्वासन दिया है, “किसी के कर्म से भी अधिक शक्तिशाली प्रभाव एक ईश्वर-प्राप्त गुरु की सहायता एवं आशीर्वाद है। एक गुरु मार्गदर्शन का श्रद्धापूर्वक पालन करने से, व्यक्ति स्वयं को अपने अन्तर् में पैठी गत कर्मों की सभी बाध्यताओं से मुक्त कर सकता है।”

गुरु वास्तव में सर्वोत्तम दाता हैं, क्योंकि उनके आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहते हैं, परन्तु उनकी आध्यात्मिक विपुलता के प्रति अपनी चेतना को पूरी तरह ग्रहणशील बनाने के लिये उनकी उपस्थिति की आभा में रहने के हमारे सच्चे प्रयास भी आवश्यक है। जब आप उनकी शिक्षाओं का गहनता से अध्ययन करते हैं, और उनके द्वारा दी गई प्रविधियों एवं सिद्धान्तों का इच्छा-शक्ति तथा उत्साह के साथ अभ्यास करते हैं, तब आप उनकी दिव्य चेतना और इसकी रूपान्तरकारी शक्ति के स्पंदन को आत्मसात् कर रहे होते हैं। और जब आपके प्रयास भक्ति से पूर्ण होते हैं, तथा उनके प्रेम में आपका विश्वास बढ़ता है, तब आप अधीरता एवं हठधर्मिता की अहं की बाधाओं को धराशायी होतें पायेंगे, जिससे वे आपकी प्रगति को निर्देशित कर सकें।

गुरु के साथ अटूट समस्वरता आपके नित्य गहन होते ध्यान से ही प्राप्त होगी, क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ उनकी उपस्थिति अत्यधिक स्पष्ट से अनुभव होती है। आप सब के लिये मेरी यह प्रार्थना है की उनके द्वारा हमें दिये गये आध्यात्मिक खजाने का, विशेषकर ईश्वर–सम्पर्क की उनकी विधियों का उपयोग ही हमारे प्रिय गुरु के प्रति आपकी कृतज्ञता का उपहार हो। जब आप नित्य अपनी आत्मा के प्रशान्त मन्दिर में प्रवेश करें, तो आप उनके असीमित प्रेम को अपना आलिंगन करते एवं आपको अपने दिव्य लक्ष्य — ईश्वर से एक रूप, अपने अनन्त स्वरूप का बोध — के और निकट लाते अधिकाधिक अनुभव करें।

ईश्वर एवं गुरुदेव आप पर निरन्तर अपने रूपान्तरकारी आशीर्वादों की वर्षा करते रहें।

स्वामी चिदानन्द गिरि

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