इस वर्ष थैंक्सगिविंग [अमेरिका में मनाया जाने वाला आभार प्रकट करने का दिवस] से पहले के सप्ताहों में ईश्वर के आशीर्वादों से भरी भारत-यात्रा पूर्ण कर मेरा हृदय गुरुदेव परमहंस योगानन्द द्वारा हमारी आध्यात्मिक मातृभूमि से लाई गई जीवन-रूपान्तरकारी शिक्षाओं के प्रति, और उन आदर्शों को इतने सुन्दर ढंग से अपने दैनिक जीवन में अभिव्यक्त करते आप सब — गुरुदेव का अत्यंत प्रिय दिव्य भक्त-परिवार — के प्रति भी विशेष आभार की भावना से भर गया है।
जब अनेक वर्षों पहले गुरुजी अमेरिका आए, तो वे यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए कि अपने परिवार, मित्रों, और — इन सबसे अधिक — उस ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के लिए जोकि हमारे जीवन में सभी अच्छाईयों के स्रोत हैं, एक राष्ट्रीय अवकाश रखा गया है। आभार प्रकट करने के इस अवकाश का हमारे गुरु द्वारा एक आध्यात्मिक प्रथा के रूप में मनाया जाना शीघ्र ही उनके आश्रमों में एक आनन्दपूर्ण परंपरा बन गई। उनके द्वारा स्थापित किये गए उदाहरण से, हम सीखते हैं कि कैसे आन्तरिक रूप से कृतज्ञता की भावना में रहने का अभ्यास हमारी चेतना के उत्थान एवं स्थाई रूपांतरण की एक शक्तिशाली प्रविधि बन सकता है।
आभार प्रकट करना ईश्वर की सर्वव्यापकता — प्रकृति में उनके जटिल हस्तशिल्प के पीछे, उनके द्वारा अपने अद्वितीय प्रतिबिम्ब में निर्मित प्रत्येक आत्मा में, और उस प्रत्येक वस्तु में उन्हें देखना जो उत्तम एवं सुन्दर है — के प्रति अपने हृदय एवं मन को नए सिरे से खोलने का एक दिव्य अवसर लाता है। जैसा की गुरुदेव ने हमें बताया है, “ईश्वर अपनी सृष्टि से दूर नहीं हैं; वे हमेशा हमारे साथ हैं।…सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनकी उपस्थिति से स्पंदित हो रहा है।” वे, हमें भी, यह स्मरण कराते हैं कि ईश्वर हमारे भी अन्तर् में हैं। हम उनके बिना कुछ भी सोच या महसूस नहीं कर सकते, या एक साँस भी नहीं ले सकते। फिर भी दैनिक जीवन के दबावों में, हम कितनी आसानी से अपने परम हितैषी पर से अपना ध्यान हटा लेते हैं और उनके उपहारों का महत्त्व नहीं समझते। एक आभारपूर्ण हृदय विकसित करके ही हम माया के परदे के पार देखने में सक्षम हो पाते हैं और उनके अनेक रूपों के पीछे उन्हें महसूस कर पाते हैं। कृतज्ञता एवं प्रशंसा के विचार — छोटी-छोटी बातों के लिए भी — हमारे हृदयों को बोझमुक्त कर हमारी चेतना का उत्थान करते हैं, हमें ईश्वर के और निकट ले जाते हैं, तथा हमारे जीवन में उनके आशीर्वादों को अप्रतिबंधित रूप से प्रवाहित होने देने के लिए मार्ग को और अधिक अच्छी तरह से खोल देते हैं।
जबकि ईश्वर हमारे धन्यवाद की अपेक्षा के बिना हमें सब कुछ देते हैं, और जब हम भी स्वेच्छा से अपना आभार प्रकट करते हैं, तो उनके साथ हमारा सम्बन्ध कितना अधिक मधुर एवं कितना अधिक व्यक्तिगत हो जाता है। उनमें हमारा विश्वास बढ़ता है, और हम एक अलग ही जगत् — हमारा अत्यधिक ध्यान रखती उनकी शाश्वत उपस्थिति की वास्तविकता से दीप्त — को देखना प्रारम्भ करते हैं। हम केवल उनके उपहारों में नहीं, अपितु दाता के प्रेम में आनंद एवं सुरक्षा प्राप्त करते हैं। उनके ज्ञान एवं सदा-विद्यमान सहायता में विश्वास रखकर, हम चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी गहरी समझ तथा आध्यात्मिक बल के गुप्त रत्नों को खोज पाते हैं।
ऐसा आवश्यक नहीं कि आभार की भावना में रह पाना हमारी इच्छाओं की पूर्ति पर निर्भर करता है। यह एक ऐसा विकल्प है जिसे हम प्रत्येक दिन चुन सकते हैं, इस ज्ञान के साथ कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों एक सर्वोच्च आशीर्वाद सदा हमारे पास रहेगा — प्रभु का शाश्वत प्रेम। उस सत्य का तब सबसे अधिक गहनता से अनुभव किया जा सकता है जब ध्यान के मंदिर में उनकी स्निग्ध शान्ति आपके अस्तित्त्व में प्रवेश करती है, और उनका दिव्य प्रेम आपके विस्तृत होते हृदय को भर देता है। मैं प्रार्थना करता हूँ आपके अपने जीवन में उस उपहार की रूपान्तरकारी शक्ति के लिए ईश्वर के प्रति आपकी कृतज्ञता दूसरों के प्रति आपकी सदयता एवं सेवा बनकर प्रवाहित हो, ताकि वे भी आपके माध्यम से ईश्वर की स्नेहपूर्ण देखभाल का अनुभव कर सकें।
आपको और आपके प्रियजनों को एक दिव्य आशीर्वादों से पूर्ण थैंक्सगिविंग,
स्वामी चिदानन्द गिरि, अध्यक्ष
















