प्रिय आत्मन्
विश्व भर के लाखों भक्तों के साथ मिलकर भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मदिवस, जन्माष्टमी मनाते हुए हमारे ह्रदय उनकी शाश्वत शिक्षाओं तथा उनके जीवन के विशुद्ध माध्यम से प्रवाहित होते ईश्वरीय प्रेम एवं आनन्द की अत्यन्त सम्मोहक पुकार से नवीन प्रेरणा से भर उठते हैं। भगवद्गीता के स्वर्गीय गीत के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण हमें निरन्तर स्मरण करा रहे हैं कि हम अनेक जन्मों से जिस स्थायी प्रसन्नता की खोज कर रहे हैं उसे प्राप्त कर सकते हैं यदि हम अपने ध्यान को माया बद्ध अहं से हटाकर अपने अन्तर में निहित आत्मा की शाश्वत स्वतंत्रता एवं आनन्द पर पुनः केन्द्रित करें। हम अनिश्चित बाह्य जगत् में पूर्णता को खोजने के आदी हो चुके हैं, पर हमें बार-बार निराशा ही हाथ आती है परन्तु गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को तथा एक-के-बाद-एक आने वाले सुखों एवं दुःखों के ऊँचे-नीचे, घुमावदार रास्तों से थक चुके लोगों को बताते हैं कि अहं की स्वतः परिसीमनकारी, कर्म-बँधन उत्पन्न करने वाली आदतों पर विजय प्राप्त कर तथा हमारी आत्मा की समस्त अभिलाषाओं के परम स्रोत, ईश्वर का अनुसरण कर हम उस चक्र को तोड़ सकते हैं।
हमारी चेतना का वह पुनर्विन्यास हमारे अपने दूसरों के तथा इस जगत् के कल्याण के लिए हमारा सबसे बड़ा योगदान है। जैसा की श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्मरण कराया है, अहं पर विजय प्राप्त करने के लिए ध्यान का आध्यात्मिक कर्म तथा भौतिक जगत् में निःस्वार्थ कर्म, दोनों ही आवश्यक हैं। ध्यान की गहन निश्चलता में ईश्वर की वास्तविक रूपान्तरकारी उपस्थिति का अनुभव होता है, तथा अपने दैनिक कर्तव्यों में उनकी इस उपस्थिति को अपने साथ बनाये रख कर हम अहं के प्रभाव का प्रतिकार करने की शक्ति विकसित करते हैं।
आध्यात्मिक तथा भौतिक कर्मों का हमारा निहित प्रयोजन ही इनकी मुक्तिदायी शक्ति को प्राप्त करने की कुंजी है। जब तक अहं अधिक प्रभावी रहेगा और अपने कर्मफलों से आसक्त रहेगा, हम माया के उतारों और चढ़ावों से बंधे रहेंगे। परन्तु इसकी जगह जब हम ईश्वर में स्थित होते हैं और उनके लिए ही कार्य करते हैं तो हमारा जीवन कितना अधिक सरल एवं आनन्दपूर्ण हो जाता है। यदि आप व्यक्तिगत लाभ या दूसरों का सम्मान प्राप्त करने के उद्देश्य से कठिन परिश्रम करते हैं, तो इसके परिणाम के प्रति चिन्ताओं से आपका मन प्रायः घिरा होता है परन्तु यदि आप किसी भी अच्छे भौतिक या आध्यात्मिक प्रयास को अपनी भक्ति के उपहार स्वरूप आन्तरिक रूप से ईश्वर को अर्पित करते हैं, तो उस कार्य को करने का उत्साह तो वैसा ही बना रहेगा, किन्तु आप अपने मन की शान्त अवस्था बनाये रख कर अपने प्रयासों पर ईश्वर के आशीर्वाद प्राप्त करने के विश्वास के साथ कार्य कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के माध्यम से ईश्वर ने अर्जुन से कहा है “अपने सभी कर्म मुझे समर्पित : करो! अहंकार तथा अपेक्षा से रहित, पूरी तरह अपनी आत्मा पर एकाग्रचित्त, उत्तेजनाकारी चिन्ता से मुक्त रहकर (कर्म के) युद्ध में रत हो जाओ।” इसी तरह, यदि आप किसी आदत को बदलना चाहते हैं, तो सारे समय इसी पर न सोचते रहकर, इस पर विजय प्राप्त करने के अपने सच्चे प्रयासों के साथ इसे प्रभु के चरणों में रख दें, और आप उनकी सहायता के पात्र बन जायेंगे ध्यान में भी यदि आप इसके परिणामों के लिए बेचैन न होकर अपने सच्चे प्रयास अर्पित करते हैं, तो आप उनकी ओर से आते आशीर्वादों के प्रति अधिक ग्रहणशील होंगे।
मेरी प्रार्थनायें सदा आपके साथ हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए दिव्य भाव में रहकर अपने दैनिक आध्यात्मिक एवं भौतिक कर्तव्यों को कर, आप तनाव और निराशा के अहं के बोझों को गिरते हुए तथा उन्हें ईश्वर में मग्न हृदय की शान्त, सकारात्मक, आनन्दपूर्ण भावना से प्रतिस्थापित होता हुआ पाएंगे। कभी आप पर प्रभावी रही सांसारिक चेतना अपना प्रभुत्व खो देगी, और आप अविचल आन्तरिक शान्ति तथा दिव्य आनन्द की आत्मिक विजय का वरण करेंगे।
ईश्वर एवं गुरुजनों के दिव्य प्रेम में,
श्री श्री मृणालिनी माता
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