जन्माष्टमी के अवसर पर स्वामी चिदानन्द गिरि का संदेश 2018

प्रिय आत्मन्,

जन्माष्टमी, प्रियतम भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मदिवस, विश्व-भर में हम सभी के लिए, जिन्हें उनके उत्कृष्ट जीवन के प्रकाश और महिमा ने प्रभावित किया है, अत्यंत आनन्द का अवसर है। दिव्य रूप से भेजे गए धर्म के पुनर्स्थापक श्रीकृष्ण, हमारे हृदयों में ईश्वर के प्रेम और आनंद के अवतार के रूप में निवास करते हैं। जिस प्रकार वृन्दावन की गोपियाँ और गोप श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन से प्रबल रूप से खिंचे चले आते थे, उसी प्रकार, आइए, उनकी अनंत उपस्थिति की दिव्य छवि को हमारी आत्माओं को निरंतर ईश्वर की ओर ले जाने के लिए नेतृत्व करने देते हैं – उसी कालातीत सत्य द्वारा मार्गदर्शित करके, जो उन्होंने अर्जुन को बताए, और जो पवित्र भगवद्गीता के माध्यम से आज भी हमसे वार्ता करते हैं।

वह यात्रा आत्म-जागरूकता विकसित करने के साथ प्रारंभ होती है। स्वयं से प्रश्न करिए, “क्या मैं अपनी आदतों, इन्द्रिय इच्छाओं, और अहं की पसंद और नापसंद का अनुसरण कर रहा हूँ? या क्या मैं सचेत रूप से आत्मा के ज्ञान द्वारा निर्देशित होने का प्रयास कर रहा हूँ?” आपके भीतर अपने जीवन और इच्छाओं का उत्तरदायित्व लेने के लिए जितना आप सोच सकते हैं उससे कहीं अधिक शक्ति है। अर्जुन के दुर्बलता के क्षणों में श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके वास्तविक, साहसिक स्वरुप एवं एक दिव्य योद्धा के रूप में माया के विरुद्ध हार न मानने के उनके कर्त्तव्य का स्मरण करवाया। यदि आप भी अपने गुरु एवं अपनी आत्मा के ज्ञानपूर्ण मार्गदर्शन का अनुसरण करें, तो आप उन्नति करते हुए शांति एवं मुक्ति का आनन्दपूर्ण भाव अनुभव करेंगे। चंचलता उत्पन्न करने वाले विचार एवं कर्म हमें बांधे रखते हैं; शांति प्रदान करने वाले विचार और कर्म मुक्तिदायक होते हैं। जैसाकि हमारे गुरु, श्री श्री परमहंस योगानन्द ने कहा है, “शांति आत्मा से उत्पन्न होती है, और यह एक पवित्र आतंरिक परिवेश है जिसमें वास्तविक आनंद प्रकट होता है।”

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सिखाया कि गुरु-प्रदत्त ध्यान प्रविधियों का निष्ठापूर्वक एवं भक्ति के साथ अभ्यास करने से ईश्वर की उपस्थिति का पूर्ण अनुभव होता है। जैसे-जैसे शरीर और मन की चंचलता कम होती है, आप अपने ह्रदय और आत्मा में उन्हें अनुभव करेंगे जो सम्पूर्णता हेतु समस्त आनन्द, समस्त प्रेम और समस्त शक्ति के आधार हैं। ईश्वर में स्थिर होकर, अब आपको थोड़ी सी प्रसन्नता के लिए एक अप्रत्याशित संसार से याचना करने की आवश्यकता नहीं है। आपकी प्रसन्नता दूसरों को प्रेरणा देते हुए एक उत्थानकारी प्रभाव बिखेरेगी। मानवीय-चेतना को ईश्वरीय-चेतना में परिवर्तित करने में समय और प्रयास लगता है, परन्तु गुरूजी ने हमें आश्वासन दिया है : “ईश्वर से मिलन की खोज में व्यतीत किए गए गहन ध्यान का प्रत्येक क्षण, समभाव का अभ्यास करने का प्रत्येक प्रयास एवं कर्म के फल की इच्छा का त्याग – दुःख को दूर कर शांति एवं आनंद की स्थापना करके, एवं ईश्वर के मार्गदर्शक ज्ञान के साथ समस्वरता द्वारा कर्म को कम करके एवं निर्णायक कार्यों में त्रुटी को कम करके – इसका प्रतिफल लाते हैं।”

मैं प्रार्थना करता हूँ कि जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने विजय हेतु अर्जुन का मार्गदर्शन किया, उसी प्रकार वे आत्मा की मुक्ति हेतु आपकी यात्रा को आशीर्वाद प्रदान करें।
जय श्री कृष्ण! जय गुरु!


स्वामी चिदानन्द गिरि

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