कूटस्थ चैतन्य पर परमहंस योगानन्दजी की विवेचना

परमहंस योगानन्दजी द्वारा

पवित्र भूमि की यात्रा के उपरांत, वर्ष 1935 में भारत से, सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के विद्यार्थियों एवं मित्रों के लिए लिखित

जेरुसलम एवं भारत से मैं, सिद्ध महात्माओं के प्रत्यक्ष ज्ञान से पुनर उर्जित परमात्मा का नवीन सन्देश, आपको प्रदान कर रहा हूँ। दिव्य सत्ता के निमित्त के रूप में मेरी आत्मा परम आह्लादित अनुभव कर रही है।

विचारों की लेखनी व्योम के स्याह पटल पर लेखन कर रही है और आत्मा की अदृश्य सत्ता को दृश्य कर रही है एवं मेरी लेखनी अगोचर विचारों को मूर्त रूप दे रही है। इस प्रकार मैं इस पृष्ठ पर, परमात्मा का चित्रण कर रहा हूँ—स्याही, विचारों एवं आत्म साक्षात्कार से—जिस से सभी उनके परम ऐश्वर्य की अनुभूति कर सकें।

ज्यूँ-ज्यूँ सत्य, विचार एवं शब्दों के झरोखे से, झलक दिखलाता जा रहा है, वैसे-वैसे कूटस्थ प्रज्ञा एवं स्पंदनात्मक सत्ता द्वारा परमात्मा अभिव्यक्त होते जा रहे हैं। जब राष्ट्र रूपी मनके क्राइस्ट की चेतना व उनकी शांति की सार्वभौमिक संवेदना के धागे में नहीं पिरोये जाते, वे अलगाव से ग्रस्त रहते हैं, क्षुद्र स्वार्थ की चट्टानों से टकरा-टकरा कर खंडित हो, बिखरते रहते हैं। क्रिसमस पर्व के क्राइस्ट के अवतरण का उत्सव सभी जातियों के व्यक्तियों द्वारा परस्पर हार्दिक प्रेम की अभिव्यक्ति द्वारा मनाया जाना चाहिए।

मैं प्रार्थना करता हूँ कि एक नवीन अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना के पालने में क्राइस्ट का जन्म हो; कि युद्ध की अंधियारी रात्रि में क्राइस्ट के प्रेम का सितारा एक नवीन संगठित संसार को आलोकित करे। मैं प्रार्थना करता हूँ कि क्राइस्ट का जन्म सभी राष्ट्रों में एकात्मता के प्रति प्रेम, सभी मनुष्यों में आध्यात्मिक उन्नति की महत्वाकांक्षा, शुद्ध हृदय मित्रों में दिव्य मैत्री, इस मार्ग के जिज्ञासुओं में आत्म-साक्षात्कार एवं सभी सच्चे साधकों में शाश्वत, नित्य नवीन आनंद तथा चिर स्थायी ज्ञान के रूप में हो।

भौतिक समृद्धि व प्रसिद्धि समय के साथ धूमिल जो जाते हैं, किन्तु परमात्मा से प्राप्त ऐश्वर्य सदा विद्यमान रहता है, सर्वोत्कृष्ट उपयोगिता के साथ सेवा में समर्पित हो कर। परिवर्तनशीलता की वेदिका पर भौतिक सुख समृद्धि की उपासना क्यों की जाए? अविनाशिता के मंदिर में आध्यात्मिक संतोष की उपासना करना सीखिये। भौतिक सम्पदाओं को अक्षय आध्यात्मिक संपत्ति में रूपांतरित करने का सर्वोत्तम उपाय है उनका आध्यात्मिक सेवा में उपयोग करना। क्राइस्ट को समझने के लिए उन्हें जीवन में उतारना चाहिए। सभी शुभ कर्मों में, प्रत्येक भौतिक एवं आध्यात्मिक सेवा में, एवं ध्यान की चरनी में, शाश्वत विश्वव्यापी क्राइस्ट का पुनर्जन्म होता है।

उस क्राइस्ट को कोई धर्मशास्त्र के अध्ययन से नहीं समझ सकता; साधक को गहरे ध्यान के निकुंज में उनकी उपस्थिति का अनुभव करना होगा। ध्यान से अभिभूत विचारों के पालने में, जो भाव-भक्ति की सुकोमल टहनियों से बुना गया हो, नवजात क्राइस्ट को निहारें, आंतरिक शांति नामक किलकते हुए कपोत की थपकियाँ देते हुए।

इन बीस शताब्दियों में क्रिसमस पर्व 1,935 बार मनाया जा चुका है—किन्तु कितने थोड़े लोगों ने जीसस के जन्म के सच्चे महत्त्व की अनुभूति प्राप्त की है! प्रत्येक वर्ष, परमेश्वर तथा देवदूत सभी के कल्याण के लिए इस अवसर पर, दिव्य पर्व के रूप में उत्सव मनाते हैं। अतः आप में से प्रत्येक व्यक्ति, गहन ध्यान का हफ़्तों का पूर्व अभ्यास करके, आगामी क्रिसमस पर्व का उत्सव मनाने के लिए अपनी चेतना को ग्रहणशील बनाये। आपके ध्यान के लोक में नवजात कूटस्थ चैतन्य का अवतरण, अवर्णनीय चित्ताकर्षक, आत्म उत्थान दायक, व आत्मा का विकास करने वाला होगा। क्राइस्ट के स्वागत के लिए, मेरुदंड में स्थित ध्यान रत चेतना रूपी क्रिसमस वृक्ष* को, दिव्य क्राइस्ट के विभिन्न नवीन बोध रूपी, सतत झिलमिलाते ज्ञान के सितारों व दिव्य प्रेम के कमल पुष्पों से अलंकृत करें। इस आतंरिक क्रिसमस वृक्ष के प्रति, अपनी समस्त भौतिक इच्छाओं को एक बार सदा सदा के लिए अंतर्घट में उमड़ने वाले क्राइस्ट के आनंद को समर्पित कर दें।

तब क्रिसमस पर्व की सुबह को जागने पर, क्राइस्ट आपकी विभिन्न शाखाओं में विभाजित चेतना के क्रिसमस वृक्ष के निकट, आपके द्वारा उनके लिए अर्पित उपहार ग्रहण करने के लिए और आपको अमरता की सुनहरी डोरी से बंधे अपने अक्षय उपहार – सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, दिव्य प्रेम, ब्रह्मांडीय आलोक, सतत आत्म जागृति व् चिर नवीन आनंद प्रदान करने के लिए आकर्षित हो जायेंगे।


*गहन ध्यान में रत साधक को दिखने वाले, मस्तिष्क व् मेरुदंड में स्थित आध्यात्मिक प्रज्ञा व ऊर्जा के सात ज्योतिर्मय केंद्र का सन्दर्भ लें। भारतीय ग्रंथों में इन्हे “सात कमल ” कहा गया है; बुक ऑफ़ रेविलेशन में सेंट जॉन ने इनकी तीव्र ज्योतियों को “सात सितारे” कहा है।

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