क्रियायोग का 150वां वार्षिकोत्सव

वर्ष 2011 में क्रियायोग के प्राचीन विज्ञान का आधुनिक विश्व से पुनः परिचय कराने का 150वां वार्षिकोत्सव मनाया गया। वर्ष 1861 में लाहिड़ी महाशय की हिमालय में अमर गुरु महावतार बाबाजी से भेंट हुई और उनसे पवित्र आत्म-विज्ञान में दीक्षा प्राप्त की। जैसा कि परमहंस योगानन्दजी ने लिखा है : “यह मंगलकारी प्रसंग अकेले लाहिड़ी महाशय के लिए नहीं था; यह समस्त मानव जाति के लिए सौभाग्य का क्षण था। खोई हुई, या लंबे समय से लुप्त, योग की उच्चतम कला पुनः प्रकाश में लाई जा रही थी।”

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया द्वारा 2011 में इस वार्षिकोत्सव के सम्मान में और विश्व-भर में सत्यान्वेषियों के लिए आत्म-मुक्तिदायक क्रिया प्रविधि को आगे प्रसारित करने में सहायता करने हेतु अनेक आयोजन किए गए :

  • योगदा सत्संग पत्रिका का एक पूरा अंक क्रियायोग विज्ञान को समर्पित था।
kriyapage
  • वाईएसएस वेबसाइट में एक नया खंड जोड़ा गया है जिसमें आत्म-मुक्ति की इस पवित्र प्रविधि के इतिहास और लाभों पर प्रकाश डाला गया है।
  • वाईएसएस केन्द्रों और मंडलियों ने क्रियायोग पर परमहंस योगानन्दजी के लेखन पर आधारित कार्यक्रम आयोजित किए, जिसके दौरान वाईएसएस/एसआरएफ़ अध्यक्ष श्री मृणालिनी माता का एक विशेष संदेश भक्तों के साथ साझा किया गया।
  • 2011 के शरद संगम के दौरान, सभी कक्षाओं में क्रिया विज्ञान के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया।
kriyamagzine-hindi
  • योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया (वाईएसएस) ने अपनी पत्रिका और अपनी वेबसाइट पर विशेष कार्यक्रमों के साथ-साथ विशेष सामग्री को भी प्रदर्शित किया। विशेष आयोजनों में पद यात्राएं, या पैदल यात्राएं, रानीखेत से बाबाजी की गुफा — वह स्थान जिसके पास लाहिड़ी महाशय ने अपने गुरु, बाबाजी से क्रियायोग में दीक्षा प्राप्त की थी, तक लाहिड़ी महाशय द्वारा की गयी 1861 की यात्रा को पुन: अभिनीत करना था। विभिन्न अवसरों पर वाईएसएस सदस्यों और वाईएसएस संन्यासियों के दो समूहों ने हिमालय की तलहटी के बीच से ग्यारह घंटे की यात्रा में भाग लिया। एक भाग लेने वाले भक्त ने लिखा :

“हमारी यात्रा शीघ्र प्रातःकाल में 6:00 बजे उज्जवल प्रकाश में प्रारम्भ हुई। यह एक सुन्दर सुहावनी सुबह थी और सुखद मौसम ने हमारे प्रयास को प्रोत्साहित किया। स्वामी निर्वाणानन्द, ब्रह्मचारी सदानन्द और अच्युतानन्द, और प्रवेशार्थी दिव्यांशु ने हमें प्रेरित किया और रास्ते में उनके द्वारा दिए गए ज्ञान के मोती हमारे लिए एक अतिरिक्त लाभ था। जैसे-जैसे हम छोटे कस्बों और गांवों को पार करते हुए आगे बढे, स्थानीय लोगों ने प्रसन्नता के साथ हमारा स्वागत किया। छह घंटे के भीतर हम एक छोटे से कस्बे बिंटा पहुँचे। यहाँ हमने अपना सादा दोपहर का भोजन किया। आलीशान पर्वत, आत्मा को प्रसन्न करने वाले दृश्य, अंतहीन आकाश, प्रफुल्लित सूरज और तैरते बादल इतने स्फूर्तिदायक थे, कि हमें ट्रेकिंग की कठिनाई अनुभव ही नहीं हुई। हमने ईश्वर और गुरु के प्रेम को अनुभव करते हुए और प्रकृति की शांति का आनंद लेते हुए सुन्दर जल-धाराओं और मनोरम जंगलों को पार किया।

“जब हम बिंटा से पाँच घंटे की ट्रेकिंग के बाद बाबाजी की गुफा तक पहुँचे, तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि हमने रानीखेत से ग्यारह घंटे की ट्रेकिंग की है। निश्चित रूप से इस अनुभव के पीछे बाबाजी का आशीर्वाद रहा होगा। गुफा में ध्यान करते हुए हमने अनुभव किया कि बाबाजी का प्रेम हम पर बरस रहा है, हमारी चेतना में संसार समाप्त हो गया, और हम नित्य नवीन शुद्ध आनंद से सराबोर हो गए। यह एक समृद्ध अनुभव था और हममें से प्रत्येक अपने साथ अविस्मरणीय स्मृतियाँ लेकर आया।”

क्रिया वार्षिकोत्सव को कई प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशनों में भी चित्रित किया गया, जिनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं :

ad

शेयर करें