दक्षिणेश्वर के 75 वर्ष

“लाहिड़ी महाशय एवं बाबाजी की इच्छा एवं आशीर्वाद द्वारा मैं दक्षिणेश्वर में ठीक गंगा तट पर एक अति सुन्दर स्थान को पाने में सफल हुआ, अर्थात् हमारा योगदा सत्संग मठ। यह कोलकाता से लगभग बीस मिनट की दूरी पर है, तथा हमारे कार्य के लिए महान् सम्पदा है। मैं इसके विषय में बहुत प्रसन्न हूँ।”

1935–36 की भारत यात्रा के दौरान गुरुदेव श्री श्री परमहंस योगानन्द ने राजर्षि जनकानन्दजी को कोलकाता से लिखा “आपको यह जान कर प्रसन्नता होगी, कि मैं बंगाल के शीर्ष शहर कोलकाता में एक स्थायी केंद्र की स्थापना हेतु निरंतर कार्यरत हूँ और मेरे विचार में मुझे इसमें सफलता भी मिली है।” भारत की एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा के दौरान भी गुरुदेव समय निकाल कर कोलकाता और आस-पास की जगहों का मुआयना करते और उपयुक्त स्थान की खोज के लिए स्वयं जाते। परंतु, चूँकि उनकी अमेरिका वापिसी जल्द ही थी, इस वजह से वे यह कार्य संपन्न नहीं कर सके। वर्तमान स्थल का चुनाव 1939 में पूरा हुआ। गंगाजी के तट पर, फल और फूलों के उद्यानों से आच्छादित यह भूमि श्री नंद लाल करौरी जी से खरीदी गई, जो कोलकाता के एक नामी ज़मींदार और व्यापारी होने के साथ एक प्रख्यात क्रिया योगी पंचानन भट्टाचार्यजी (हमारे परम परम गुरु श्री लाहिड़ी महाशय) जी के शिष्य) के शिष्य भी थे।

बाद में परमहंस योगानन्दजी ने अपनी योगी कथामृत में लिखा — “दक्षिणेश्वर में गंगाजी के सामने एक भव्य मठ 1939 में समर्पित किया गया। कोलकाता से कुछ मील उत्तर की ओर यह मठ नगरवासियों के लिए शांति का आश्रय है और भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी और अन्य भागों में स्थित योगदा स्कूलों, आश्रमों व केन्द्रों का मुख्यालय है।”

एक अनौपचारिक सत्संग में आश्रम में रहने वाले भक्तों के साथ बातचीत करते हुए दया माताजी, उनकी बाईं ओर श्री श्री मृणालिनी माता।
वाईएसएस मठ दक्षिणेश्वर के ध्यान मन्दिर में 1964 में क्रियायोग दीक्षा समारोह का संचालन करते हुए श्री दया माताजी। स्वामी श्यामानन्दजी दाईं ओर दिखाई दे रहे हैं।
गोवर्धन मठ, पुरी के परम पूज्य श्री जगदगुरु शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थजी और श्री दया माताजी, शंकराचार्यजी की मई 1959 में योगदा सत्संग मठ दक्षिणेश्वर की यात्रा के दौरान।

आनन्दमयी माँ और दया माताजी, 1961

कई वर्षों से योगदा सत्संग मठ को गुरुजी के प्रथम शिष्यों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है जिनमें मुख्यत: श्री श्री दया माता जोकि लगभग 55 वर्षों तक हमारी संघमाता व अध्यक्ष रहीं और श्री श्री मृणालिनी माता, हमारी वर्तमान अध्यक्ष व संघमाता। इनके अतिरिक्त, अन्य प्रथम शिष्यों श्री आनन्द माताजी, श्री सैलसुता माताजी, श्री उमा माताजी, श्री मुक्ति माताजी, स्वामी आनंदमयजी, स्वामी भक्तानन्दजी और स्वामी बिमलानन्दजी ने भी अपनी उपस्थिति से इस मठ को अनुग्रहित किया। इनके प्रेरणा-प्रद सत्संगों और क्रियायोग दीक्षाओं ने हमारे प्रिय गुरुदेव द्वारा प्रज्ज्वलित योग साधना की मशाल को अभी तक सजीव रखा हुआ है। आज भी दक्षिणेश्वर आने वाले भक्तों को वहाँ आशीष प्राप्त होता है और वे अपनी साधना में और अधिक अटल हो जाते हैं।

1958 में योगदा सत्संग मठ की यात्रा के दौरान श्री आनन्दमयी माँ, मठ में हो रही गतिविधियाँ देख अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए।

पुरी में गोवर्धन मठ के श्री शंकराचार्य जगदगुरु भारती कृष्ण तीर्थ (जिनकी 1958 में अमेरिका की ऐतिहासिक यात्रा वाईएसएस/एसआरएफ़ द्वारा प्रायोजित थी) ने 1959 में योगदा सत्संग मठ का दौरा किया और श्री दया माताजी से भेंट की। वाईएसएस और एसआरएफ़ द्वारा किए गए कार्यों की उन्होंने बहुत सराहना की।

कमल कुंड, योगदा सत्संग मठ, दक्षिणेश्वर

कमल कुंड, योगदा सत्संग मठ, दक्षिणेश्वर

परमहंस योगानन्दजी की योगी कथामृत पढ़ने के पश्चात अथवा मठ के रमणीक वातावरण के बारे में जानने के बाद अन्य अनेक धर्मात्मा भी योगदा सत्संग मठ की ओर आकर्षित हुए, उनके मुखारविंद से अनायास निकले प्रशंसा के कुछ शब्द जैसे – “हमारे तीर्थ स्थानों में से एक सबसे महत्वपूर्ण स्थान”, “वृंदावन की पवित्र भूमि”, “धरती पर स्वर्ग”, “गंगा तट पर धर्म स्थली”, “तपोवन जैसा वातावरण”, “प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही, एक अचिंतनीय शाँति व निर्मलता से परिपूर्ण वैभवपूर्ण स्थान”, “हृदय व आत्मा को अध्यात्म से प्रभावित करता एक असाधारण वातावरण।”

7 मार्च 1977 को, योगदा सत्संग मठ, दक्षिणेश्वर की पवित्र भूमि पर श्री श्री परमहंस योगानन्द के अनुकरणीय जीवन और मानवता के प्रति उनके योगदान को सम्मानित करते हुए एक विशेष समारोह आयोजित किया गया, जिसमें भारत सरकार द्वारा एक डाक टिकट और प्रथम आवरण जारी किए गए। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता अमेरिका में भारत के भूतपूर्व राजदूत डॉ. बिनय रंजन सेन और पश्चिम बंगाल के उस समय के पोस्टमास्टर जनरल श्री एस. के. घोष द्वारा की गई। इस अवसर पर डॉ. सेन ने अपने असाधारण अनुभव के बारे में बताया, कि किस प्रकार परमहंसजी ने अपने व्याख्यान का समापन करते हुए अपने प्रिय भारत पर लिखी कविता पढ़ी और ठीक उसी समय महासमाधी ले ली। यह घटना बिल्टमोर होटल, लॉस एंजेलिस में एक प्रीतिभोज के समय 7 मार्च, 1952 को हुई। डॉ. सेन ने कहा “यह केवल अनुभव किया जा सकता है कि योगानन्दजी जैसे व्यक्तित्व मानव जीवन का नव संवर्धन करते हैं।…उनके जैसे महापुरुषों का कभी देहांत नहीं होता।…वे उन लाखों लोगों के हृदय और मन में जीवित हैं जो उनके संदेश से प्रेरणा ले लाभान्वित हुए। वे सदैव जीवित रहेंगे।… परमहंसजी वास्तव में एक तारे के समान हैं जो हमारे भाग्य का मार्गदर्शन कर सकते हैं।”

योगदा सत्संग मठ, दक्षिणेश्वर की स्थापना की प्लैटिनम जयंती के उपलक्ष्य में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया अनेक कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है।

योगदा सत्संग मठ दक्षिणेश्वर में, श्री श्री परमहंस योगानन्दजी के सम्मान में भारत सरकार द्वारा 7 मार्च 1977 को जारी डाक टिकट का विमोचन समारोह। अमेरिका में भारत के भूतपूर्व राजदूत डॉक्टर बिनय रंजन सेन एवं मुख्य अतिथि, भाषण देते हुए। बाईं से दाईं ओर स्वामी शांतानन्दजी, श्री डी. एन. जतिया और श्री बनमाली दास।

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