“क्रिसमस मनाने का का सही अर्थ है, ध्यान के द्वारा स्वयं को इस दिव्य उत्सव के लिए इस प्रकार तैयार करना कि आप अपने अन्तर्मन में भाईचारे एवं सभी जीवों के प्रति प्रेम की नवीन चेतना के जन्म का अनुभव करें।” — परमहंस योगानन्द
—Paramahansa Yogananda
क्रिसमस 2012
क्रिसमस पर्व पर आपको शुभकामनाएं! हम अनंत चैतन्य स्वरूप जीसस की उस मानवीय शिशु रूप में आगमन पर आराधना करते हैं, जो सृष्टि में ईश्वरीय सर्वव्यापकता का प्राकट्य हैं। मैं यह प्रार्थना करती हूँ कि आप अपने हृदय एवं आत्मा में क्राइस्ट के उस सार्वभौमिक प्रेम, शांति, व आनंद को अनुभव करें जो जीसस के रूप में व्यक्त हुआ है। आइए, हम क्रिसमस के पावन पर्व का अभिनंदन अपनी अंतश्चेतना को विस्तृत करने वाले प्रेम और ईश-दीप्ति के आंतरिक बोध के रूप में करें, — एक ऐसी अलक्षित परंतु अक्षीण आंतरिक संश्रय एवं सहायता, जो युग-युगांतर से ईश्वर अपने अवतरित स्वरूपों के माध्यम से प्रदान कर रहे हैं। भगवान् के आत्मोत्सर्ग रूपी उपहार प्राप्त करने के लिए आप अपने विचारों और भावनाओं को श्रद्धा के साथ उन आशीर्वादों से समस्वर रखें, जो इस पावन पर्व के समय वे आपको विशेष प्रेम एवं अनुकंपा से देते हैं। इस उत्सव पर प्रेम और शांति के स्पंदन आपको दैनिक चिंताओं एवं आशंकाओं से मुक्त रख आपकी अंतर्निश्चलता के केंद्र को अन्तर्ज्ञान-जनित आश्वासन एवं उन ईश्वरीय गुणों से आपूरित कर देते हैं जो आपको सभी बाधाओं से मुक्त होने का सामर्थ्य — जो कि जीसस द्वारा उद्बोधित एक जन्माधिकर है — प्रदान करते हैं। उन्होने हमें उस ईश-अनुभूति का मार्ग दिखाया है : सर्वोपरि ईश्वर को अपने “सम्पूर्ण हृदय, आत्मा, मन, तथा पूर्ण क्षमता” से प्रेम करो, और तदुपरांत “दूसरों को भी उतना ही प्रेम करो, जितना आप स्वयं से करते हैं” — यानि जीवन को परमात्मा पर भक्तिमय ध्यान, तथा अपने कार्यों को सौहार्द, सेवा, एवं आत्मीय गुणों से सिंचित कर एक संतुलित जीवन का निर्वाह करना।
हमारे गुरु परमहंस योगानन्दजी जीसस के विषय में कहते हैं : “मानवीय दृष्टि में वे बेथलेहम में जन्मे एक छोटे शिशु, तथा एक उद्धारक थे जिन्होंने रोगियों का उपचार किया, और मृत मनुष्यों को जीवित किया। दैवीय दृष्टि में वे सर्वव्यापी क्राइस्ट चैतन्य हैं। आपको उस क्राइस्ट चेतना को अपने भीतर जानने की अभिलाषा करनी होगी।” गुरूजी ने प्रत्येक वर्ष क्रिसमस से पहले एक दिन का विशेष ध्यान करने की परंपरा को आरंभ किया। गहरे व लंबे ध्यान में श्रद्धा और आत्मा की गहनतम पुकार द्वारा जीसस के क्राइस्ट चैतन्य को सच्चे भाव में समझना, और इस प्रकार क्रिसमस को भक्तिमय बनाने की परिणति क्राइस्ट-शांति के उस दर्शन के रूप में होती है जो समूचे मानवीय ज्ञान से परे होता है। परिस्थितियों की सीमाओं, अहंकारजन्य आसक्तियों तथा भ्रामक मनोरथों से मुक्त होकर हमारी चेतना क्राइस्ट चेतना से एक हो जाती है, और हमें उस विश्वास से ओत-प्रोत कर देती है जो हमें क्राइस्ट ही की भांति निर्भीक एवं आनंदमय होकर जीने की क्षमता देता है। सत्य एवं अनासक्त प्रेम का अपने जीवन में समावेश करने से हम हमारी चेतना के शाश्वत स्वरूप को इस संसार में रहते हुए भी जागृत कर सकते हैं।
इस पवित्र समय में आप ईश्वर, क्राइस्ट, व गुरुजनों के असीम आशीर्वादों को क्रिसमस उपहारों के रूप में प्राप्त करें!
सर्वदा भगवान के निर्बाध प्रेम और आशीर्वादों से साथ,
श्री मृणालिनी माता
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