सच्ची सफलता और समृद्धि प्राप्त करना

श्री श्री परमहंस योगानन्द के लेखन के अंश

सच्ची सफलता

सफलता कोई साधारण बात नहीं है, यह केवल आपके धन और भौतिक संपदा की प्राप्ति के द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकती। सफलता का अर्थ और अधिक गहराई तक जाता है। यह केवल आपकी आन्तरिक शान्ति और मानसिक नियंत्रण की उस मात्रा से आँका जा सकता है, जो आपको हर परिस्थिति में प्रसन्न रहने के योग्य बनाती है। वही सच्ची सफलता है।

सफलता और सुख का रहस्य आपके भीतर है। यदि आपने बाहरी सुख और सफलता प्राप्त की है, परन्तु आन्तरिक नहीं, तो वास्तव में आप सफल नहीं हैं। एक अति धनी करोड़पति जो सुखी नहीं है, सफल नहीं है। मेरा तात्पर्य यह नहीं, कि यदि आपके पास करोड़ रुपया है तो आप सफल नहीं हो सकते। चाहे आप गरीब हैं अथवा अमीर, यदि आप जीवन में सुखी हैं तो आप वास्तव में सफल हैं।

सक्रिय इच्छाशक्ति का प्रयोग करना

कुछ भी असम्भव नहीं है, जब तक आप ऐसा न सोचें।

नश्वर प्राणी के रूप में आप सीमित हैं, परन्तु ईश्वर की सन्तान के रूप में आप असीम हैं।… अपनी एकाग्रता को ईश्वर पर केन्द्रित करें, और वह सम्पूर्ण शक्ति जिसे आप किसी भी दिशा में प्रयोग करने के लिए पाना चाहते हैं, आप प्राप्त कर लेंगें।

इच्छाशक्ति आपके भीतर ईश्वर के प्रतिबिम्ब का माध्यम है। इच्छाशक्ति में प्रकृति की सारी शक्तियों को नियन्त्रित करने वाली ईश्वर की असीम शक्ति निहित है। क्योंकि आप ईश्वर के प्रतिबिम्ब के रूप में बनाए गए हैं, वह शक्ति आपकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करने के लिए आपकी है।

जब आप कोई अच्छे कार्य करने का निश्चय कर लेते हैं, तो उन्हें पूरा करने के लिए यदि आप दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रयोग करते हैं, तो आप उन्हें पूरा कर ही लेंगे। चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न हों, यदि आप प्रयत्न करते रहेंगे, तो ईश्वर ऐसा साधन बना देंगे जिसके द्वारा आपकी इच्छाशक्ति को उसका उचित फल मिल ही जाएगा। यही वह सत्य है जिसका जीसस ने उल्लेख किया था जब उन्होंने कहा : “यदि तुम विश्वास करो, और कोई शंका न करो, … तो यदि तुम इस पर्वत को कहोगे, यहाँ से हट जाओ, और सागर में गिर जाओ, तो ऐसा ही हो जाएगा।” यदि आप अपनी इच्छाशक्ति का लगातार उपयोग करें, फिर चाहे कुछ भी अवरोध आएँ, तो लोगों की सहायता के लिए, यह सफलता, स्वास्थ्य और शक्ति को उत्पन्न करेगी, और सर्वोपरि, यह ईश्वर के साथ सम्पर्क को उत्पन्न करेगी।

संसारी व्यक्ति का दिमाग “मैं नहीं कर सकता” से ही भरा रहता है। कुछ विशेष गुणों और आदतों वाले परिवार में जन्म लेने के कारण वह इनसे प्रभावित होकर सोचने लगता है कि वह कुछ कार्य नहीं कर सकता; वह ज़्यादा चल नहीं सकता, वह इस चीज़ को खा नहीं सकता, वह उसको सहन नहीं कर सकता। उन सभी “नहीं कर सकता” के भावों को दग्ध करना ही होगा। आप जो कुछ भी करना चाहें, उसे कर पाने की शक्ति आपके भीतर है; वह शक्ति इच्छाशक्ति में निहित है।

यदि आप सक्रिय इच्छाशक्ति के साथ किसी विचार को पकड़े रखते हैं, तो यह अन्ततः साकार रूप धारण कर लेता है।

एक विचार को सक्रिय इच्छाशक्ति के साथ बनाए रखने का अर्थ है उसे तब तक बनाए रखना जब तक उस विचार का प्रारूप सक्रिय बल का विकास न कर ले। जब एक विचार को इच्छा के बल द्वारा सक्रिय बना दिया जाता है, तो यह ठीक आपके द्वारा रचित मानसिक प्रारूप के अनुसार साकार हो सकता है।

आप इच्छाशक्ति का विकास कैसे कर सकते हैं? किसी ऐसे लक्ष्य को चुनें जिसके बारे में आप सोचते हैं कि आप उसे प्राप्त नहीं कर सकते, और फिर अपनी पूरी शक्ति के साथ उसी एक कार्य को करने का प्रयास करें। जब आपको सफलता मिल जाए, तो किसी बड़े कार्य को हाथ में लें और इसी प्रकार अपनी इच्छाशक्ति के अभ्यास को जारी रखें। यदि आपकी कठिनाई गम्भीर हो, तो गहनता से प्रार्थना करें: “प्रभो! मुझे अपनी सभी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दें।” आपको अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए, चाहे आप कुछ भी हों, या आप कोई भी हों। आपको दृढ़ निश्चय करना ही चाहिए। इसी इच्छाशक्ति को व्यवसाय और ध्यान दोनों में ही प्रयोग करें।

सफलता या असफलता का निर्णय आपके अपने मन में होता है। शेष समाज की नकारात्मक धारणा के विरुद्ध भी, यदि आप अपनी ईश्वर प्रदत सर्वविजयी इच्छा के द्वारा दृढ़ धारणा प्रकट करते हैं कि आप कठिनाइयों में दुःख भोगने के लिए छोड़े नहीं जा सकते, तो आप एक गुप्त दिव्य शक्ति को स्वयं में उदय होता हुआ अनुभव करेंगे; और आप देखेंगे कि उस दृढ़ धारणा एवं शक्ति का आकर्षण आपके लिए नए मार्ग खोल रहा है।

असफलता के साथ रचनात्मकता से निपटना

सफलता के बीज बोने के लिए असफलता का मौसम सर्वोत्तम समय होता है। परिस्थितियों की मार से आप घायल हो सकते हैं, परन्तु अपना मस्तक ऊँचा रखिए। सदैव एक बार और प्रयास कीजिए, भले ही आप अनेक बार असफल हो चुके हों। जब आपको लगे कि आप और संघर्ष नहीं कर सकते या जब आप सोचें कि आप हर सम्भव प्रयास कर चुके हैं, या जब तक आपके प्रयासों को सफलता का मुकुट नहीं बन्ध जाता, संघर्ष करते ही रहिए।

विजय के मनोविज्ञान का प्रयोग करना सीखें। कुछ लोग परामर्श देते हैं, “असफलता के बारे में कोई चर्चा बिल्कुल मत करो।” परन्तु केवल इसी से लाभ नहीं होगा। सर्वप्रथम, अपनी असफलता और इसके कारणों का विश्लेषण करें, अनुभव का लाभ उठाएँ, और फिर इसके विषय में सोचना बन्द कर दें। जो व्यक्ति संघर्षरत रहता है, जो भीतर से अपराजित है, यद्यपि वह बहुत बार असफल रहा हो, तो भी वह वास्तव में विजयी व्यक्ति है।

चाहे जीवन अन्धकारमय हो, चाहे कठिनाइयाँ आएँ, चाहे सुअवसरों का उपयोग न कर पाएँ, लेकिन अपने अन्तर में यह कदापि न कहें : “मैं बर्बाद हो चुका हूँ। ईश्वर ने मुझे त्याग दिया है।” ऐसे व्यक्ति के लिए कौन कुछ कर सकता है? आपके परिवार के लोग आपको त्याग सकते हैं, आपका अच्छा भाग्य आपको धोखा देता दिखाई दे सकता है, मनुष्य और प्रकृति की सभी शक्तियाँ आपके विरुद्ध हो सकती हैं, परन्तु आपके अन्दर विद्यमान कार्य आरम्भ करने की दिव्य शक्ति के गुण के द्वारा, आप अपने बीते हुए ग़लत कार्यों द्वारा उत्पन्न भाग्य के प्रत्येक हमले को विफल कर सकते हैं, और विजयी बनकर स्वर्ग की ओर बढ़ सकते हैं।

चाहे आप कितनी बार भी असफल हों, प्रयास करते रहें। चाहे कुछ भी हो जाए, यदि आपने अपरिवर्तनीय दृढ़ निश्चय कर लिया है, “पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो सकती है, परन्तु मैं जितना सर्वोत्तम हो सके प्रयत्न करता रहूँगा,” तब आप सक्रिय इच्छाशक्ति का उपयोग कर रहें हैं और आप सफल हो जाएंगे। ऐसी सशक्त इच्छाशक्ति ही एक व्यक्ति को धनवान् बनाती है, दूसरे को शक्तिशाली और किसी अन्य व्यक्ति को सन्त बना देती है।

एकाग्रताः सफलता की एक कुंजी

जीवन में बहुत सी असफलताओं का मूल कारण एकाग्रता की कमी होती है। एकाग्रता एक खोजबत्ती की तरह है; जब इसका प्रकाश-पुंज विशाल क्षेत्र में फैलाया जाता है, तो इसकी किसी विशिष्ट लक्ष्य पर एकाग्र होने की शक्ति कमज़ोर पड़ जाती है, परन्तु एक समय में एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित करने से यह शक्तिशाली हो जाती है। महान् व्यक्ति एकाग्रता सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। वे अपने सम्पूर्ण मन को एक समय में एक ही लक्ष्य पर रखते हैं।

व्यक्ति को एकाग्रता की वैज्ञानिक विधि का ज्ञान होना चाहिए (जैसा कि योगदा सत्संग पाठों में सिखाया गया है) जिससे वह अपने ध्यान को बाधाओं की वस्तुओं से मुक्त करके, उसे एक समय में एक ही वस्तु पर केन्द्रित कर सके। एकाग्रता की शक्ति द्वारा मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मन की अपार शक्ति का उपयोग कर सकता है और जिन द्वारों से असफलता के प्रवेश की सम्भावना है उनकी रक्षा कर सकता है।

हमें अपनी निकटतम समस्याओं और कर्तव्यों का सामना केंद्रित ऊर्जा से करना चाहिए और उनका निष्पादन पूर्ण रूप से करना चाहिए। हमारा यही जीवन दर्शन होना चाहिए।

अधिकांश लोग प्रत्येक कार्य को अनमने भाव से करते हैं। वे अपनी एकाग्रता का लगभग दसवाँ भाग ही प्रयोग करते हैं। इसी कारण उनके पास सफल होने की शक्ति नहीं होती…[Do] सभी कार्य एकाग्रता की शक्ति से करें। इस शक्ति का पूरा बल ध्यान के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जब आप ईश्वर की उस एकाग्रता की शक्ति का उपयोग करते हैं, तो आप इसे किसी भी वस्तु पर केन्द्रित करके सफल हो सकते हैं।

रचनात्मकता

ईश्वर की रचनात्मक शक्ति के साथ अपना अन्तर्सम्पर्क करें। आप अनन्त प्रज्ञा के सम्पर्क में आ जाएँगें जो आपका मार्गदर्शन एवं सभी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है। आपके अस्तित्व के सक्रिय स्रोत (ईश्वर) से निर्बाध रूप से शक्ति प्रवाहित होगी जिससे आप कार्यकलाप के किसी भी क्षेत्र में रचनात्मकता से कार्य करने में सक्षम हो जाएँगे।

स्वयं से यह प्रश्न पूँछें: “क्या मैंने कभी ऐसा कार्य करने का प्रयत्न किया है जिसे किसी अन्य ने न किया हो?” यह पहल शक्ति के उपयोग की प्रारम्भिक अवस्था है। यदि आपने यहाँ तक नहीं सोचा है, तो आप उन सैंकड़ों दूसरे लोगों की भाँति हैं जिनकी यह भ्रान्तिपूर्ण सोच है कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं उससे भिन्न कुछ करने की शक्ति उनके पास नहीं है। वे निद्राचारियों ( sleep walkers ) की भाँति हैं, उनके अवचेतन मन से प्राप्त सुझावों ने उन्हें एक अश्व-शक्ति वाले लोगों की चेतना ही दे रखी है।

यदि आप ऐसी स्वप्नचारी अवस्था में जीवन-यापन कर रहे हैं, तो आप इस प्रतिज्ञापन के साथ स्वयं को जागृत करें: “मुझ में मानव का महानतम गुण है—पहल शक्ति। प्रत्येक मनुष्य के पास इस शक्ति की थोड़ी चिनगारियाँ होती हैं जिनके द्वारा वह किसी ऐसी वस्तु का सृजन कर सकता है जिसका पहले कभी सृजन न हुआ हो। यदि मैं स्वयं को परिवेश द्वारा सम्मोहित होने दूं, तो मैं देखता हूँ कि कितनी आसानी से मैं संसार में व्याप्त नश्वर चेतना की सीमितता से भ्रमित हो सकता हूँ!”

पहलशक्ति क्या है? यह आपके भीतर रचनात्मक शक्ति अर्थात् अनन्त सृष्टिकर्ता की एक चिंगारी है। यह आपको कुछ ऐसी रचना करने की शक्ति दे सकती है जिसका पहले कभी किसी ने सृजन न किया हो। यह आपको कार्यकलापों को नए ढंग से करने की प्रेरणा देती है। पहल करने वाले मनुष्य की उपलब्धियाँ एक उल्कापिण्ड की भाँति भव्य हो सकती हैं। प्रकटरूप में शून्य से कुछ उत्पन्न करके वह यह प्रदर्शित करता है; कि परमात्मा की महान् अन्वेषण शक्ति के प्रयोग द्वारा असम्भव प्रतीत होने वाले कार्यकलाप सम्भव बन सकते हैं।

जो रचना करता है वह, परिस्थितियों, भाग्यों और देवताओं को दोष देते हुए अवसर की प्रतीक्षा नहीं करता। वह अपनी इच्छा, प्रयास, सूक्ष्म विवेक की जादुई छड़ी से सुअवसरों का लाभ उठा लेता है या उन्हें उत्पन्न कर लेता है।

किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व, शान्तिपूर्वक बैठे, अपनी इन्द्रियों और विचारों को शान्त करें, और गहरा ध्यान करें। तब परमात्मा की महान् रचनात्मक शक्ति आपका मार्गदर्शन करेगी।

जब भी आप कुछ निर्मित करना चाहते हैं, तो बाहरी स्रोत पर निर्भर न रहें; गहरे जाएँ और अनन्त स्रोत को खोजें। व्यवसायिक सफलता की सभी विधियाँ, सभी आविष्कार, संगीत की सभी तंरगें, और सभी प्रेरणात्मक विचार एवं लेख ईश्वर के रिकॉर्ड में अंकित हैं।

सर्वतोमुखी सफलता का सृजन

वह व्यक्ति सबसे अधिक बुद्धिमान है जो ईश्वर को खोजता है। वह सर्वाधिक सफल व्यक्ति है जिसने ईश्वर को पा लिया है।

महान् गुरुजन आपको कभी भी लापरवाह होने का परामर्श नही देंगे; वे आपको सन्तुलित होना सिखाएँगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपको शरीर को भोजन और वस्त्र देने के लिए काम करना पड़ता है। परन्तु यदि आप एक कर्त्तव्य को दूसरे कर्त्तव्य का विरोधी बनने देते हैं, तो यह सच्चा कर्त्तव्य नहीं है। सहस्रों व्यवसायी धन एकत्र करने में इतने व्यस्त हैं, कि वे भूल जाते हैं कि वे अत्यधिक हृदय रोग भी उत्पन्न कर रहे है! यदि समृद्धि लाने का कर्त्तव्य आपको स्वास्थ्य के प्रति कर्त्तव्य को भुला देता है, तो यह कर्त्तव्य नहीं है। व्यक्ति को सन्तुलित तरीके से विकास करना चाहिए। एक अद्भुत शरीर का विकास करने पर विशेष ध्यान देने का कोई लाभ नहीं है, यदि इसमें एक तुच्छ मस्तिष्क है। मन का विकास भी अवश्य करना चाहिए। और यदि आपके पास उत्कृष्ट स्वास्थ्य और समृद्धि एवं बुद्धि है, परन्तु आप सुखी नहीं हैं, तो आपने अभी तक जीवन को सफल नहीं बनाया है। जब आप सच्चाई से कह सकें, “मैं सुखी हूँ, और मेरा सुख कोई भी मुझसे छीन नहीं सकता,” तो आप राजा हैं-आपने अपने भीतर ईश्वर का प्रतिबिम्ब पा लिया है।

सफलता का एक और गुण यह है कि हम सांमजस्यपूर्ण एवं लाभकारी परिणामों को केवल अपने लिए ही प्राप्त नहीं करते, अपितु उन लाभों को दूसरों के साथ भी बाँटते हैं।

जीवन मुख्यतः सेवा होना चाहिए। उस आदर्श के बिना, आपको प्रभु द्वारा दी गयी बुद्धि अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती। सेवा में जब आप अपने लघु अहं को भूल जाते हैं तो आप परमात्मा के बृहद् स्वरूप को अनुभव करेंगे। जिस प्रकार सूर्य की जीवन प्रदायिनी किरणें सबका पोषण करती हैं, उसी प्रकार आपको निर्धन एवं परित्यक्त लोगों के हृदयों में, आशा की किरणें बिखेरनी चाहिए, निराश लोगों के हृदयों में साहस जगाना चाहिए, और उन लोगों के हृदयों में नए साहस का प्रकाश करना चाहिए जो यह समझते हैं कि वे असफल हैं। जब आप अनुभव करते हैं कि जीवन कर्तव्यों का एक आनन्ददायक संग्राम है और साथ ही एक गुज़रता हुआ स्वप्न है, और जब आप दूसरों को करुणा एवं शान्ति प्रदान करके उन्हें सुखी करने के आनन्द से भर जाते हैं, तो ईश्वर की दृष्टि में आपका जीवन सफल है।

प्रचुरत्ता और समृद्धि

जो लोग केवल अपने लिए समृद्धि चाहते हैं वे अन्त में निर्धन बनने, या मानसिक असन्तुलन से पीड़ित होने के लिए बाध्य होते हैं; परन्तु वे लोग जो सम्पूर्ण संसार को अपने घर की तरह समझते हैं, और जो वर्ग या संसार की समृद्धि का वास्तव में ध्यान रखते हैं और उसके लिए काम करते हैं।… वे व्यक्तिगत समृद्धि को प्राप्त करते हैं जो वैध रूप में उनकी होती है। यह निश्चित एवं गुप्त नियम है।

प्रतिदिन, दूसरों की सहायता करने के लिए कुछ अच्छा काम करो, चाहे यह अल्प मात्रा में ही हो। यदि आप ईश्वर से प्रेम करना चाहते हैं तो आपको लोगों से प्यार करना चाहिए। वे उनकी सन्तान हैं। आप अभावग्रस्त लोगों को कुछ देकर और मानसिक रूप से व्यथित लोगों को सान्त्वना देकर, भयभीत लोगों को साहस देकर, दुर्बल लोगों को दिव्य मैत्री एवं नैतिक सहायता देकर, सहायक हो सकते हैं। जब आप दूसरों में ईश्वर के प्रति रुचि उत्पन्न करते हैं तथा उनमें ईश्वर का और अधिक प्रेम तथा अधिक गहरे विश्वास का विकास करते हैं, तब भी आप भलाई के बीज रोपित करते हैं। जब

आप इस संसार से विदा होंगे, तो सांसारिक समृद्धि पीछे छूट जाएगी; परन्तु प्रत्येक भलाई का कार्य जो आपने किया है, वह आपके साथ जाएगा। धनी लोग जो कृपणता से जीते हैं और स्वार्थी लोग जो कभी भी दूसरों की सहायता नहीं करते, वे अपने अगले जीवन में धन-सम्पदा आकर्षित नहीं करते हैं। परन्तु जो दान देते हैं और बाँटते हैं, चाहे उनके पास अधिक या कम हो, वे समृद्धि को प्राप्त करेंगे। यह परमात्मा का नियम है।

दिव्य विपुलता को शक्तिशाली, अत्यन्त ताज़गी देने वाली वर्षा समझें आपके हाथ में जो भी पात्र होगा वह उसे प्राप्त करेगा। यदि आपने टीन का प्याला पकड़ रखा है तो आपको उतनी ही मात्रा प्राप्त होगी। यदि आपने एक कटोरा पकड़ रखा है तो वह भर जाएगा। ईश्वर की विपुलता को प्राप्त करने के लिए आप किस तरह का पात्र पकड़े हुए हैं? शायद आपका बर्तन त्रुटिपूर्ण हो, यदि ऐसा है तो सभी प्रकार के भय, घृणा, शंका, और ईर्ष्या को समाप्त करते हुए इसको सुधारना और फिर इसकी शान्ति, नीरवता, भक्ति और प्रेम के शुद्धिकर जल से सफ़ाई करनी चाहिए। दिव्य विपुलता सेवा और उदारता के नियम का अनुसरण करती है। दो और फिर प्राप्त करो। आप संसार को अपना सर्वोत्तम दो और सर्वोत्तम ही आपके पास वापस लौट आएगा।

सफलता के लिए प्रतिज्ञापन

प्रतिज्ञापन के सिद्धांत एवं निर्देश

मुझे आवश्यकता के समय जो कुछ चाहिए उसे लाने के लिए मैं सर्वव्यापक ईश्वर की शक्ति में पूर्ण विश्वास के साथ आगे बढ़ता जाऊँगा।

मेरे अन्दर अनन्त रचनात्मक शक्ति है। मैं कुछ विशिष्ट कार्य अपने जीवन के अन्तिम समय तक अवश्य पूरे करूँगा। मैं एक ईश-मानव हूँ, एक विवेकपूर्ण प्राणी। मैं ईश्वर की शक्ति हूँ, जो मेरी आत्मा का बलशाली स्रोत है। मैं व्यवसाय के जगत् में, विचारों के जगत् में, ज्ञान के जगत् में रहस्योद्घाटनों का सृजन करूँगा। मैं और मेरे परमपिता एक हैं। मैं जो इच्छा करूँ उसका सृजन कर सकता हूँ, जैसे मेरे सृजनात्मक परमपिता करते हैं।

दिव्य प्रचुरता के लिए प्रतिज्ञापन

हे परमपिता! मैं असीम समृद्धि, स्वास्थ्य और ज्ञान चाहता हूँ, सांसारिक स्रोतों से नहीं, अपितु आपके सर्व-सम्पन्न, सर्वशक्तिमान, पूर्ण दानशील उदार हाथों से।

मैं भिखारी नहीं बनूँगा, जो नश्वर समृद्धि, स्वास्थ्य और ज्ञान की याचना करता है। मैं आपकी सन्तान हूँ और इस नाते से आपकी असीम सम्पदा से एक दिव्य पुत्र के असीम भाग की माँग करता हूँ।

परमपिता! मेरी यह प्रार्थना है: मुझे इसकी चिन्ता नहीं कि मेरे पास क्या स्थायी सम्पत्ति है, परन्तु मुझे अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति इच्छानुसार कर पाने की शक्ति प्रदान करें।

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