सरलता को हृदयपूर्वक अपनायें

श्री श्री परमहंस योगानन्द की ज्ञान विरासत से संकलित

सादा जीवन अधिक प्रसन्न जीवन होता है

Meditation near a lake — Silhouette

प्रसन्नता बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती; बल्कि यह जीवन की छोटी-छोटी खुशियों में प्राप्त होती है, और सर्वाधिक प्रसन्नता गहन ध्यान के नित्य-नवीन आनन्द में प्राप्त होती है।…

आत्मा से उत्पन्न होने वाले सादे, सच्चे, एवं चिरस्थायी आनन्दों को थामे रखने के द्वारा प्रसन्न रहें। ये आनन्द गहन चिन्तन, अन्तर्निरीक्षण, आध्यात्मिक उत्प्रेरणा, तथा ध्यान से प्राप्त होते हैं।

आधुनिक जीवन अत्यधिक असन्तोषजनक बनता जा रहा है। यह आपको प्रसन्नता प्रदान नहीं करता। इसमें बहुत-सी जटिलतायें हैं, बहुत-सी इच्छायें हैं। ज़्यादा अच्छी गाड़ियाँ, ज़्यादा अच्छे कपड़े, और मनोरंजन के अधिक साधन — तथा अधिक चिन्तायें! इन तथाकथित “आवश्यकताओं” से स्वयं को मुक्त करें और ईश्वर के साथ अधिक समय व्यतीत करें। अपने जीवन को सरल बनायें। अपने अन्तर में प्रसन्न रहें, अपनी आत्मा से प्रसन्न रहें।

आज के मनुष्य का आनन्द बस अधिक-से-अधिक प्राप्त करने में ही निहित है, और उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि दूसरों के साथ क्या होता है। परन्तु क्या सरल जीवन व्यतीत करना बेहतर नहीं है — इतने सारे सांसारिक सुख-साधनों के बिना और कुछ कम चिन्ताओं के साथ? इन साधनों को अर्जित करने में खुद को झोंक देने से आपको कोई सुख नहीं मिलेगा यदि आपके पास उनका आनन्द उठाने का ही समय नहीं है।…वह समय आयेगा जब मानवजाति इतनी सारी भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता की चेतना से ऊपर उठने की शुरूआत करने लगेगी। लोग सरल जीवन में अधिक सुरक्षा तथा शान्ति प्राप्त करने लगेंगे।

तनाव एवं वित्तीय चिन्तायें कम करने के लिये जीवन सरल बनायें

एक जटिल सांसारिक जीवन केवल देखने में और अहं में बसी सामाजिक प्रतिष्ठा की चेतना को ही अच्छा लगता है, परन्तु कुछ ही लोगों को यह अहसास होता है कि, “इन सांसारिक सुखों का क्या मूल्य चुकाना पड़ता है।” आर्थिक दासता, मानसिक अशान्ति, व्यावसायिक चिन्तायें, अन्यायपूर्ण स्पर्धा, आपसी मतभेद, स्वतंत्रता का अभाव, रोग, दुःख-क्लेश, वृद्धावस्था, तथा मृत्यु एक सांसारिकता भरे जीवन की उपज हैं। जब हमारे पास सौंदर्य का, प्रकृति का, तथा जीवन में ईश्वर की इतनी सारी अभिव्यक्तियों का आनन्द उठाने का समय नहीं रह जाता, तो ऐसे में हम कितना कुछ खो देते हैं।

एक ऐसा निवास स्थान चुनें जो आपके लिये पर्याप्त हो, परन्तु आपको वास्तव में जितनी आवश्यकता है उससे बड़ा न हो, और यदि सम्भव हो तो किसी ऐसे स्थान पर हो जहाँ करों की दरें तथा जीवन निर्वाह का व्यय यथोचित हो।…अपना जीवन सरल रखें, तथा झूठे और महँगे सुखों को खोजने की अपेक्षा उसी में आनन्द लें जो आपको ईश्वर ने दिया है। ईश्वर की रहस्यमयी प्रकृति में मनुष्य के मन को मन्त्रमुग्ध कर देने वाला बहुत कुछ है। अपना खाली समय उपयोगी किताबें पढ़ने में, ध्यान में, और जटिलताओं से मुक्त एक सरल जीवन के आनन्द में बितायें। एक बड़े घर, दो गाड़ियों, और सामयिक भुगतानों, तथा न चुका पाने वाले कर्ज़ों की अपेक्षा सरल जीवन, कम चिन्तायें, और ईश्वर के लिये समय होना — क्या ये बेहतर नहीं हैं?

अपनी असीम करुणा के चलते ईश्वर हमारे जीवन के अनुभवों द्वारा हमें अपना आनन्द, अपनी प्ररेणा, एक सच्चा जीवन, सच्चा ज्ञान, सच्ची प्रसन्नता, तथा सच्ची बोधशक्ति प्रदान करते हैं। परन्तु ईश्वर की महिमा केवल आत्मा की निस्तब्धता में, ईश्वर के साथ संलाप करने के लिये मन के तीव्र आन्तरिक प्रयास द्वारा प्रकट होती है। यहीं पर हमें सत्य का अनुभव होता है। बाह्य जगत् में माया का प्रभाव बहुत प्रबल है; बहुत ही कम लोग बाह्य परिवेश के प्रभावों से अछूते रह पाते हैं। यह संसार तो अपनी अनन्त जटिलताओं तथा विविध अनुभवों के साथ निरंतर चलता रहता है। प्रत्येक जीवन नया होता है और प्रत्येक जीवन को अलग ढंग से जीना होता है। तथापि ईश्वर की मौन वाणी समस्त प्राणी-जगत् का आधार है, जो पुष्पों के माध्यम से, धर्म-ग्रन्थों के माध्यम से, और हमारे अन्तःकरण के माध्यम से सदा हमें पुकारती रहती है — उन सभी वस्तुओं के माध्यम से जो सुन्दर हैं तथा जो जीवन को जीने के योग्य बनाती हैं।

जो आवश्यक है उसके लिये समय निकालें

मिथ्या सांसारिक चमक-दमक पर स्वर्णिम आध्यात्मिक अवसरों को खो न दें। यदि शरीर की ऐसी इच्छाओं को, जिन्हें मैंने “अनावश्यक आवश्यकताओं” का नाम दिया है, तृप्त करने के निरन्तर प्रयासों में समय गँवा दिया जाये तो हमारे पास ईश्वर के लिये समय ही कहाँ रह जाता है? इसकी अपेक्षा जीवन को सरल बनायें तथा बचे हुए समय को ध्यान में लगायें जो ईश-संपर्क प्रदान करता है तथा शान्ति एवं प्रसन्नता रूपी जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं की प्राप्ति में सच्ची प्रगति प्रदान करता है।

ईश्वर सरल है। अन्य सब कुछ जटिल है।

ईश्वर की चेतना में दृढ़तापूर्वक स्थित हो जायें, उस अनन्त सत्ता की अनुभूति में जो समस्त सृष्टि में सागर की भांति प्रवाहित होता है। इस छोटे-से जीवन काल में ईश्वरानुभूति प्राप्त करने के लिये प्रयास करना निरर्थक नहीं है। आप देखेंगे कि आनन्द का अविरत प्रवाह होता रहेगा।…

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