जन्माष्टमी 2019 पर स्वामी चिदानन्द गिरि का संदेश

Bhagavan Krishna with mukut

प्रिय आत्मन्,

वर्ष के इस समय जब विश्व भर के हम समस्त भक्त भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस, जन्माष्टमी मनाते हैं, तो यह अपने मन एवं हृदयों को दिव्य प्रेम के इस राजसी अवतार के साथ समस्वर करने का एक अद्भुत अवसर होता है। इस पवित्र अवधि में उनके प्रति हमारी श्रद्धा, शान्ति एवं आनन्द के उस आंतरिक साम्राज्य के लिये हमारी ललक को एक नवीन रूप प्रदान करे जिसे ईश्वर चाहते हैं कि हम सब प्राप्त करें। श्रीमद्भगवद्गीता हमें आश्वस्त करती है कि जिस प्रकार अनन्त प्रभु ने श्रीकृष्ण के माध्यम से प्रकट होकर अपने शिष्य अर्जुन का आध्यात्मिक एवं सांसारिक विजय की और मार्गदर्शन किया, उसी प्रकार वे हमारे अपने कुरुक्षेत्र के दैनिक युद्ध में हमारा भी मार्गदर्शन करेंगे — जब तक कि हम भी अपनी आत्मा की गहराईयों में छिपे दिव्य गुणों और क्षमताओं को ईश-चैतन्य के साथ अभिव्यक्त करना न सीख लें।

धर्म के पुनर्स्थापक की अपनी भूमिका में, भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथी बने; परन्तु इसके साथ ही उन्होंने अर्जुन से आग्रह भी किया कि वह भी माया के अवरोधों को परास्त करने में एक साहसी दिव्य योद्धा के रूप में अपनी भूमिका को पूर्ण करे। ईश्वर भी हमसे यही करने को कहते हैं — कि हम अपनी सहज दिव्यता एवं आनन्द को ग्रसने वाले परिसीमनकारी विचारों, इच्छाओं तथा आचरणों को अपनी चेतना से बाहर निकालने के लिये अपनी इच्छा-शक्ति, पहल, एवं आत्म-प्रेरित विवेक का उपयोग करें। गीता में श्रीकृष्ण का अद्वितीय और व्यावहारिक ज्ञान हमें यह दिखाता है कि कैसे, प्रत्येक विजय के साथ, हम और अधिक मजबूत बनते जाते हैं तथा और अधिक आत्म-मुक्ति एवं आनन्द प्राप्त करते हैं।

माया एक हटी शत्रु है क्योंकि कई जन्मों से हमने नम्वर शरीर एवं मन के साथ ही अपनी पहचान जोड़ी है। जब तक हम दैनिक जीवन के नाटक के लिए चल रही उनकी प्रतिक्रिया में ही मग्न रहेंगे, हमारी ऊर्जा और अवधान बाह्य परिस्थितियों, अर्थात्, हमारा अत्यधिक ध्यान खींचने वाले तनावों, निरंतर संवेदी उत्तेजनों, तथा इस आधुनिक विश्व में व्याप्त शान्ति-विध्वंसक सूचनाओं के अतिभार, के बंधक बन जाते हैं। हमें विजय प्राप्त करने के लिए भगवान कृष्ण के बताए मार्ग की आवश्यकता है: गहन ध्यानयोग के विज्ञान का निरंतर अभ्यास करते हुए चेतना को अन्तर्मुखी करना, जहाँ दिव्य उपस्थिति शाश्वत रूप से हमारी प्रतीक्षा कर रही है। हमारे गुरुदेव परमहंस योगानन्द ने कहा है: “इन्द्रियों की निरन्तर माँगों और चंचल विचारों के कोलाहल से मुक्त होकर, योगी आनन्दमय आन्तरिक शान्ति की अद्भुत पूर्ण नीरवता का आनन्द उठाता है, जो धीरे-धीरे उसकी सम्पूर्ण प्रकृति को शुद्ध कर देती है।” उस ईश्वरीय-शान्ति का स्पर्श मात्र भी हममें आध्यात्मिक प्रेरणा भर सकता है तथा हमारे सामने चाहे जैसी परिस्थितियों आयें उनका सामना करने की संभावनाओं के प्रति हमारी जागरूकता को बढ़ा सकता है। हम दैनिक परिस्थितियों का अधिक समचित्तता के साथ आकलन कर सकते हैं, और अहं तथा भावनाओं के आवेगों के बजाय शान्त विवेक एवं आत्मा के अन्तर्ज्ञान से मार्गदर्शित हो सकते हैं। हम दूसरों के प्रति अधिक समझ एवं सहानुभूति अभिव्यक्त करने में समर्थ होते हैं, केवल नैतिक अनिवार्यता के आधार पर नहीं, बल्कि उस गहन सहानुभूति के आधार पर, जो कोई व्यक्ति अपने किसी निकटतम प्रियजन के लिए महसूस करता है।

भगवान् श्रीकृष्ण एवं हमारे गुरुदेव के आशीर्वादों से — तथा ध्यान, सम्यक कर्म, एवं ईश्वर के प्रति उत्तरोत्तर बढ़ती भक्ति की रूपान्तरकारी शक्ति से — आप भी चरित्र का वह तेज प्राप्त कर सकते हैं जो ईश-चैतन्य से, अर्थात्, शक्ति एवं जीवन्तता से, सभी के प्रति सद्भाव रखने से, और स्थायी आन्तरिक आनन्द से उत्पन्न होता है।

जय श्रीकृष्ण! जय गुरु!

स्वामी चिदानन्द गिरि

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