लॉस एंजिलिस स्थित सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय में 15 जून, 1965 को दिए गए सत्संग का एक अंश। यह प्रवचन, जिसका शीर्षक “अपने भयों का सामना करने का साहस” है, 2020 में योगदा सत्संग पत्रिका में प्रकाशित हुआ था और श्री दया माता के प्रवचनों के तीसरे संग्रह, Journey With Paramahansa Yogananda, नामक आगामी पुस्तक का एक अध्याय होगा, श्री दया माता ने 1955 से 2010 में अपने देहावसान तक योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की अध्यक्ष एवं संघमाता के रूप में सेवा की।
प्रत्येक मनुष्य को साहस के गुण का अभ्यास करना आवश्यक है। साहस अनिवार्य रुप से भय की अनुपस्थिति नहीं है; कोई व्यक्ति अत्यधिक घबराहट का अनुभव कर सकता है, तथा उसके उपरांत भी साहसी हो सकता है। एक वीरतापूर्ण व्यक्ति अपने भयों से पराजित नहीं होता अपितु उनका सामना करने तथा उनके ऊपर विजय प्राप्त करने का निश्चय करता है।
हम किसी वस्तु से कारण जाने बिना ही — संभवतः इस जीवन अथवा किसी पूर्वजन्म के किसी विस्मृत मानसिक आघात के कारण — भयभीत हो सकते हैं। किंतु यदि हम अपनी असुरक्षा की भावनाओं को तथा अनिश्चितताओं को निष्पक्ष भाव से देखें तो हम पाएँगे कि वे प्रायः निराधार होती हैं। “हमें केवल एक ही वस्तु से भयभीत होना चाहिए और वह है — स्वयं भय।”* इस कथन में बहुत सच्चाई है। हमारे कल्याण के संदर्भ में मुख्य आशंकाएँ प्रायः बाह्य परिस्थितियों में नहीं, अपितु इस तथ्य में निहित होती हैं कि हमने आत्मा की स्वाभाविक शक्ति तथा आस्था के साथ उन परिस्थितियों का सामना करना नहीं सीखा है।
अपने बचपन के एक अनुभव के कारण मैं अंधेरे से अत्यधिक डरा करती थी। मैं उस समय लगभग आठ या नौ वर्ष की थी। एक रात मेरी माँ ने मुझे मेरे नन्हें भाई को कुछ देर तक पकड़ने के लिए कहा। मैं एक खिड़की के पास बैठी शांतिपूर्ण ढंग से उसे हाथ में पकड़ कर हिला-डुला रही थी। संयोगवश उन्हीं दिनों मैं अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी पढ़ रही थी, और मेरा अतिसंवेदनशील तरुण मन चोरों द्वारा अपने बंदियों पर किए गए अत्याचारों की भयंकर कल्पनाओं से भरा हुआ था। पड़ोस के कुछ लड़कों ने एक चाल चलने की ठानी। वे खिड़की के बाहर तक रेंग कर आए और अकस्मात् भयंकर चीखें निकालने लगे। मैं अत्यंत भयभीत हो उठी और कुर्सी से उछल पड़ी।
उस घटना के बाद लम्बे समय तक मैं अवचेतन रुप से सम्भवतः अंधेरे में छिपी वस्तु से डरती रही। मुझे कभी भी किसी भी वस्तु से डरना अच्छा नहीं लगता था। अतः एक दिन मैंने स्वयं से पूछा, “मुझे क्या हो गया है? मैं अंधेरे से क्यों डरती हूँ?” मैंने यह निश्चय किया कि भय पर विजय प्राप्त करने के लिए मैं जानबूझकर जहाँ भी सम्भव होगा सभी अंधेरे कमरों में जाऊँगी। और मैंने ऐसा ही किया।
जैसा कि स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने कहा है, “भय का सामना करो, तब वह तुम्हें सताना बंद कर देगा।” अपने भयों से दूर भागना व्यर्थ है, क्योंकि वे तब तक आपका पीछा करते रहेंगे जब तक आप मुड़कर उनका सामना नहीं करते। पहली बार जब आप ऐसा करेंगे तो यह अत्यंत कठिन प्रतीत होगा, किंतु फिर भी ऐसा करें। दूसरी बार यह पहले से अधिक सरल होगा, और शीघ्र ही आप भय पर विजय प्राप्त कर लेंगे। साहस का अभ्यास करने से ही साहस विकसित होता है।
पाद टिप्पणी :
* फ्रैंक्लिन डी. रुज़वेल्ट।
हम आपको वाईएसएस/एसआरएफ़ की पूजनीय तृतीय अध्यक्ष और संघमाता, श्री दया माता के प्रेरक जीवन के विषय में जानने के लिए आमंत्रित करते हैं — प्रेम, विनम्रता और ईश्वर तथा अपने गुरु, परमहंस योगानन्दजी के प्रति समर्पित सेवा से पूर्ण एक जीवन।



















