स्वामी चिदानन्द गिरि का जन्माष्टमी सन्देश – 2026

14 अगस्त, 2026

जो व्यक्ति मुझे सर्वत्र देखता है तथा प्रत्येक वस्तु को मुझमें देखता है, मैं उसकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होता, न ही वह मेरी दृष्टि से कभी ओझल होता है।

— ईश्वर-अर्जुन संवाद : श्रीमद्भगवद्गीता (VI:30)

प्रिय आत्मन्,

जन्माष्टमी अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण के जन्मदिन के आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करने वाले इस पावन अवसर पर आप सबका स्नेहपूर्ण अभिनन्दन। यद्यपि उनका जन्म अनेक सहस्राब्दियों पूर्व हुआ था, तथापि जिन लोगों के हृदय उनके साथ अन्तर्सम्पर्क में हैं उनके लिए ये महान् एवं दिव्य प्रेम के परमप्रिय अवतार आज भी उतने ही वास्तविक है जितने तब थे जब वे अपने सुन्दर मानवीय स्वरूप में इस पृथ्वी पर विचरण करते थे — आत्म-साक्षात्कार के लक्ष्य की प्राप्ति के उद्देश्य से योग के राजमार्ग का अनुसरण करने वाले सच्चे साधकों का मार्गदर्शन और उनका उत्थान करने के लिए सदैव तत्पर। हम परम सौभाग्यशाली हैं कि हमारे गुरुदेव परमहंस योगानन्दजी द्वारा प्रदत्त क्रियायोग शिक्षाओं के माध्यम से, हमारे पास आत्मा की मुक्ति का वही पवित्र सूत्र उपलब्ध है जो भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया था।

श्रीमद्भगवद्गीता में परमप्रिय श्रीकृष्ण हमें आश्वासन प्रदान करते हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर को सर्वत्र देखता है तथा प्रत्येक वस्तु को उनमें देखता है, वे उस व्यक्ति की दृष्टि से कभी ओझल नहीं होते हैं और न ही वह भक्त उनकी दृष्टि से कभी ओझल होता है। जब भी हम दैनिक जीवन के कर्तव्यों और उसकी लय के मध्य ईश्वर का स्मरण करते हैं, अशान्ति के स्थान पर ध्यान का चुनाव करते हैं, और अपने दिव्य प्रियतम के साथ और उनके लिए कार्य करते हैं, — जब भी हम किसी बुरे विचार के स्थान पर करुणामय विचार पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, दूसरों के प्रति दया भाव का प्रदर्शन करते हैं, अथवा किसी नकारात्मक आदत के आकर्षण का प्रतिरोध करते हैं, — हम और भी अधिक प्रत्यक्ष रूप से उनकी सर्वव्यापकता को अपनी चेतना में अनुभव करते हैं। कभी-कभी भक्तों को लग सकता है कि ईश्वर का प्रत्युत्तर प्राप्त करने के लिए उन्हें पहले उच्च आध्यात्मिक अवस्था अथवा स्वयं पर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त करना आवश्यक है। तथापि ईश्वर अपनी असीम उदारता के साथ अपनी नित्य-प्रेममय एवं सतर्क आँखों के द्वारा भक्ति के प्रत्येक अर्पण और प्रत्येक सच्चे प्रयास पर अपनी दृष्टि बनाए रखते हैं और उनकी दृष्टि में ऐसी प्रत्येक वस्तु का महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुवाद एवं व्याख्या, ईश्वर-अर्जुन संवाद, में गुरुदेव परमहंस योगानन्दजी ने बताया है, “एक अति क्षणिक विचार और सबसे तुच्छ कार्य भी ईश्वर की उपस्थिति में जाने के लिए एक सीढ़ी के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।”

प्रियजनों, जब आप अपने दैनिक ध्यान और जीवन के अनुभवों में वही विश्वास और आध्यात्मिक उत्साह बनाए रखते हैं जिसने श्रीकृष्ण के भक्तों को सांसारिक मोह-माया छोड़कर उनकी दिव्य बांसुरी की पुकार का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया था, तो आपका हृदय एवं मस्तिष्क उनकी अनन्त और सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले प्रेम — वह प्रेम जो आपको कभी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देता है और आपकी प्रत्येक आध्यात्मिक विजय पर आनन्दित होता है — की जीवन्त विद्यमानता के प्रति अधिक से अधिक ग्रहणशील बनें।

आप सबके लिए मेरी यह प्रार्थना है कि श्रीकृष्ण जन्मोत्सव आनन्दपूर्वक मानते हुए आप अपनी चेतना के पवित्र पालने में उनके दिव्य जीवन एवं शिक्षाओं के माध्यम से संसार के लिए सदैव उपलब्ध आत्मा को जाग्रत करने वाले प्रकाश एवं आशीर्वाद को ग्रहण कर सकें।

जय श्रीकृष्ण! जय गुरु!
स्वामी चिदानन्द गिरि

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