निम्नलिखित पोस्ट “ध्यानावस्था में ईश्वर के साथ विचारों का मौन आदान-प्रदान : मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता” नामक वार्ता का एक अंश है, जिसे परमहंस योगानन्दजी के संकलित प्रवचन एवं आलेख के भाग IV, Solving the Mystery of Life में पूर्ण रूप से पढ़ा जा सकता है — जिसे शीघ्र ही सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप और बाद में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया द्वारा प्रकाशित किया जाएगा। यह पूर्ण वार्ता 7 जनवरी, 1940 को एन्सिनिटस, कैलिफ़ोर्निया में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप गोल्डन लोटस टेम्पल की दूसरी वर्षगांठ के उत्सव में दिया गया था।
इस संसार में सदा कुछ दोष रहेंगे। मानवजाति के लाभ के लिए चाहे कुछ भी आश्चर्यजनक चमत्कारिक उपाय ढूँढ लिए जाएँ, यह भौतिक संसार मानवजाति के लिए कभी भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं होगा। यद्यपि जीसस पाँच हज़ार लोगों को मात्र कुछ मछलियों और रोटियों से ही पेट भर खिला पाने का चमत्कार कर सके, यहाँ तक की मृतकों को भी पुनर्जीवित किया फिर भी उनको भले काम करने के लिए कष्ट सहने पड़े। अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से उन्होंने यह दिखाया कि सब कुछ भगवान् का है, और जब हम परमात्मा की उस लोकोत्तर चेतना को पोषित करते हैं तो हम धीरे-धीरे सतही अल्पज्ञान वाली बातों से आगे बढ़कर सभी बाहरी अभिव्यक्तियों के पीछे छिपे एक परमसत्य को स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं।
यही एकमात्र तरीका है हमारे प्रसन्न बने रहने का, एकमात्र समय जब हम दुःख और सुख में, जीवन एवं मृत्यु में, और अस्तित्व की सभी द्वयात्मकताओं में स्वयं को सकुशल एवं सुरक्षित मान सकते हैं। हमें सदा परिवर्तनशील भौतिक परिस्थितियों से पूर्णता की आशा नहीं करनी चाहिए, अपितु यह समझ लेना चाहिए कि मात्र परमपिता ही हमें स्थायी प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं।
मान लीजिए आप स्वप्न देख रहे हैं कि आपको कोई भयानक रोग है और आप अपने स्वप्न में किसी अन्य व्यक्ति को देखते हैं जो सशक्त एवं स्वस्थ है। फिर आप देखते हैं कि आप गरीब और भूखे हैं जबकि किसी अन्य व्यक्ति के पास सब कुछ प्रचुर मात्रा में है। स्वप्न देखते समय आपको पीड़ा एवं भूख वास्तविक लगते हैं; परन्तु जब आप जाग जाते हैं आप राहत के साथ मुस्कराते हैं।
ऐसा ही है इस स्वप्न-संसार के साथ भी जिसमें हम रहते हैं। मैं हर क्षण यह देख रहा हूँ। माया के इस स्वप्न-संसार में परमपिता के लिए काम करने के लिए बाहरी रूप से मुझे शरीर की सीमाबद्धता एवं भौतिक अस्तित्व से सन्तुष्ट रहना पड़ता है; परन्तु ईश्वर-चेतना की आन्तरिक जागृति की अवस्था में मैं अविरल रूप से परमात्मा के आनन्द एवं अप्रतिबन्धित स्वतंत्रता का आनन्द ले रहा हूँ।
इस संसार की सारी द्वैतताएँ ईश्वर ने हमारी परीक्षाओं के लिए बनाई हैं। वह चाहते हैं कि हम नश्वर जीवन के भ्रम से जाग जाएँ और अपने अमरत्व की चेतना को प्राप्त हों। ईश्वर सन्तों की भी परीक्षा लेते हैं; उनको बहुत सी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। सन्त फ्रान्सिस की जीवनी पढ़िए — दूसरों को रोग मुक्त करते हुए उन्होंने स्वयं कितना कष्ट सहा, परन्तु उन्होंने स्वयं के स्वस्थ होने के लिए ईश्वर से कभी भी प्रार्थना नहीं की। प्रत्येक रात्रि को उन्हें जीसस क्राइस्ट के दर्शन होते थे। इन्द्रिय सुख की आदतें जन्म से ही उनके साथ थीं, परन्तु फिर भी ईश्वर को पूर्ण समर्पित होकर वह चरम ऊँचाइयों तक पहुँच गए।
परमेश्वर हमारी स्तुति से नहीं, बल्कि हमारे प्रेम से प्रभावित होते हैं।
चमत्कार करने की योग्यता प्राप्त करने से मनुष्य सन्त नहीं बन जाता है। ऐसे असाधारण कार्य ईश्वर को जरा भी प्रभावित नहीं करते हैं; वह तो स्वयं इस जटिल और अद्भुत सृष्टि की प्रत्येक वस्तु में हर क्षण चमत्कार कर रहे हैं। उनकी दिलचस्पी केवल उनके प्रेम में है, जो उन्हें प्रेम करते हैं। ईश्वर के प्रति प्रेम से अपने हृदय को शुद्ध बना पाना सबसे बड़ा चमत्कार है; अन्य कुछ भी आपकी आत्मा को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं कर पाएगा।
न ही ईश्वर प्रशंसा करने से प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनमें जरा भी अभिमान नहीं है। जब आप इस बात के लिए लालायित नहीं रहते हैं कि अन्य किसी व्यक्ति का ध्यान आपके प्रति आकर्षित हो, और केवल उन सच्ची आत्माओं में रुचि रखते हैं जो आपको प्रेम करती हैं, जब आप सच्ची मित्रता का अर्थ समझने लगते हैं, जब आप चाटुकारिता के शब्दों से नहीं अपितु सच्चे हृदयों के प्रेम से ही प्रभावित किए जा सकते हैं — तब आपको उस प्रेम का ज्ञान होता है जिसे ईश्वर आपसे चाहते हैं और जिसे वह आपको देते हैं।
यही कारण है कि इस मन्दिर जैसे मन्दिरों का होना महत्त्वपूर्ण है — जिससे हम सब अपने धर्म के बाहरी रूप को ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव में बदल सकें। महान् जीसस क्राइस्ट, बाबाजी, लाहिड़ी महाशय और मेरे गुरु ने आपस में यह विचार-विमर्श किया कि किस प्रकार चर्च को चर्चवाद से बचाया जाए और सच्चे क्रिश्चियन धर्म को वापस लाया जाए। इसीलिए मैं आपकी सेवा करने के लिए यहाँ आया हूँ। यह शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को मुक्ति प्रदान कराएगी। सांसारिक सुविधाएँ प्रदान करने वाले सारे आविष्कार भी आपको प्रसन्नता नहीं दे पाएँगे। एक पूर्वी देश से यहाँ पहुँचने पर पहले तो मैं अमेरिका की उत्तम मशीनों और भौतिक प्रगति को देखकर मुग्ध हो गया था; परन्तु मैं देखता हूँ कि इन चीज़ों से आपको शांती एवं सन्तोष की प्राप्ति नहीं हुई। वास्तविक शांती एवं सन्तोष ईश्वरीय आनन्द से प्राप्त होते हैं।
आपकी अपनी परमात्मा में स्थित चेतना की शाश्वत सुरक्षा में, माया के स्वप्नों से परे उस भूमि में कोई मृत्यु, कोई रोग, कोई कष्ट कभी प्रवेश नहीं कर सकता। उस परम शरण में आश्रित रहिए। गहरे, नियमित ध्यान द्वारा स्वयं को उस चेतना में प्रतिष्ठित कीजिए, और आप वहाँ ईश्वर को उपस्थित पाएँगे।


















