मुक्तिदायक सत्यों को आत्मसात करना और उन्हें प्रकट करना — श्री दया माता

5 अक्टूबर, 2026

नीचे श्री दया माता के प्रवचनों के नए संकलन, Journey With Paramahansa Yogananda (जिसे शीघ्र ही सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप द्वारा और बाद में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया द्वारा प्रकाशित किया जाएगा) के एक अध्याय “Spiritual Maturity Means Attunement With God,” से एक संक्षिप्त अंश दिया गया है। इस अंश में, योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की प्रिय तीसरी अध्यक्ष एवं संघमाता, परमहंस योगानन्दजी के कुछ मुक्तिदायक सत्यों को और उन सत्यों को, जिन्हें हम अपने जीवन में प्रकट करना चाहते हैं, उन्हें व्यावहारिक रूप से उतारने के महत्त्व को व्यक्त करती हैं।

जब परमहंस योगानन्दजी हमें एकसाथ ध्यान के लिए बुलाते थे, तो वे कभी-कभी बहुत कम बोलते थे; परन्तु उनके थोड़े से शब्दों में प्रचुर अर्थ, प्रचुर सत्य होता था। मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि प्रत्येक शब्द, चाहे वह अनुशासन का संदेश दे रहा हो अथवा प्रशंसा का, मेरे ही लिए है। उन्होंने जो कुछ भी कहा, मैंने उसे ऐसे मार्गदर्शन के रूप में ग्रहण किया जिसे मुझे स्वयं अपने जीवन में उतारना चाहिए। इससे मुझे कोई सरोकार नहीं था कि अन्य कोई ऐसा करता है या नहीं। मैंने कभी यह नहीं माना कि उनके शब्द, विशेषकर उनकी डाँट-डपट, दूसरों के लिए थी। मैंने सत्य के प्रत्येक कंकड़ को उठाया और उसे अमूल्य निधि की तरह सहेजा। मुझे अनुभव हुआ कि उनके बोलने का कोई लाभ नहीं था जब तक कि मैं उनके प्रत्येक वचन को हृदय से आत्मसात न कर लूँ। आज हम सबके लिए भी यही बात सत्य है। यदि हम ईश्वर को जानना चाहते हैं, तो हमें गुरु के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए इसी प्रकार का प्रयास करना होगा।

एक शाम ध्यान के पश्चात्, गुरुजी ने हमें आशीर्वाद देते हुए तीन बातें कहीं, जिन्हें मैंने तब से ही अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया है। मैं आप सभी को आज से ही उनका अभ्यास करने को प्रोत्साहित करती हूँ :

  1. सहानुभूतिपूर्ण बनें।
  2. आलोचना न करें।
  3. विनम्र बनें।

अपने कमरे में लौटकर, मैंने उन्हें लिख लिया, और उन्हें ऐसी जगह रख दिया जहाँ वे मुझे अपना निरंतर स्मरण कराते रहें।

सहानुभूतिपूर्ण बनें : इसका अर्थ है अधिक समझदार और दयालु होना; दूसरों के प्रति संवेदना रखना, उनके प्रति विचारशील होना, आवश्यकता के समय सहायक होना, और हमेशा दूसरों के बारे में अच्छा सोचने का प्रयास करना।

आलोचना न करें : आलोचना में लिप्त होना एक गंभीर मनोवैज्ञानिक बीमारी बन सकता है। इस बुरी आदत में पड़ना बहुत आसान है क्योंकि इस संसार में कुछ भी पूर्ण नहीं है; हर किसी में स्पष्ट कमियाँ हैं — और निश्चित रूप से हम स्वयं भी इसमें शामिल हैं। किंतु दूसरों के प्रति नकारात्मक रूप से अत्यधिक आलोचनात्मक होने और व्यक्तिगत पाठ के रूप में उन त्रुटियों से स्वयं बचने के लिए अपने स्तर पर उनके दोषों को मात्र देखने के बीच एक बहुत सूक्ष्म अंतर है। हमें एक-दूसरे पर निर्णय थोपने का कोई अधिकार नहीं है; मात्र ईश्वर को ही वह अधिकार है। जिस किसी का भी आलोचनात्मक स्वभाव होता है, वह इसे आध्यात्मिक प्रगति में एक बड़ी बाधा पाएगा।

विनम्र बनिए : विनम्रता “मैं विनम्र हूँ” जैसे खोखले शब्दों में नहीं, अपितु हमारे दृष्टिकोण में व्यक्त होती है। यह ईश्वर के साथ एक मधुर रूप से गोपनीय, मूक और प्रेमपूर्ण संबंध है, जिसमें हम कभी यह अनुभव नहीं करते कि इसके लिए हम किसी श्रेय के पात्र हैं। प्रशंसा मिलने पर, हम जानते हैं कि ईश्वर के आशीर्वाद, मार्गदर्शन और सहायता के बिना, हम उस प्रशंसा को आकर्षित नहीं कर पाते।

सच्ची विनम्रता के लिए प्रार्थना करें — यह आत्म-विस्मृत करने वाला आन्तरिक दृष्टिकोण है : “हे प्रभु, कर्ता तू है, मैं नहीं।” इसका उपयोग एक मानसिक जप के रूप में करें, पूरी गहराई से एकाग्र होते हुए ईश्वर से प्रार्थना करें कि वे आपको अहम् से मुक्त करें। विनम्रता के बिना आध्यात्मिक जीवन के निर्माण के लिए कोई ठोस आधार नहीं होता है। मन और हृदय ईश्वर के विचारों और उनके प्रति प्रेम से जितने अधिक ओत-प्रोत होंगे, स्वार्थी “मैं, मैं, मैं” के लिए उतनी ही कम जगह बचेगी।

गुरुजी द्वारा हमें प्रदान किये गए मुक्तिदायी सत्यों को यथासंभव जीवन्त रूप में आप तक पहुँचाना मेरे लिए सौभाग्य और आनंद की बात है। यह उनका परामर्श है। ईश्वर को जानने के अपने सच्चे प्रयास के अंतर्गत इन सत्यों को अपने जीवन में उतारें। आध्यात्मिक विकास सबसे पहले एक आंतरिक विषय है। यदि आप इन सत्यों को अपने हृदय में बसा लेंगे, उन पर आंतरिक रूप से मनन करेंगे, और अपने विचारों तथा प्रार्थनाओं को उनसे भर लेंगे, तो वे आपके जीवन में बाहरी रूप से प्रकट होने लगेंगे। “क्योंकि जैसा मनुष्य अपने हृदय में सोचता है, वैसा ही वह होता है।” *

पादटिप्पणी : 
* नीतिवचन 23:7 (बाइबिल)। 

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