वाईएसएस/एसआरएफ़ अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द गिरि ने “The Spiritual Expression of Friendship” का औपचारिक रूप से विमोचन किया

6 जनवरी, 2026
The Spiritual Expression of Friendship - परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित पुस्तक

हमें यह सूचित करते हुए अत्यन्त प्रसन्नता है कि परमहंस योगानन्दजी की The Spiritual Expression of Friendship — एक ऐसी पुस्तक जो दूसरों के साथ हमारे संबंधों में खोजे जाने के लिए प्रतीक्षारत गहन आध्यात्मिक गहराइयों को उद्घाटित करती है — अब खरीदने हेतु उपलब्ध है।

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के अध्यक्ष एवं आध्यात्मिक प्रमुख, स्वामी चिदानन्द गिरि ने 25 दिसम्बर को लॉस एंजिलिस स्थित एसआरएफ़ अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय में संन्यासियों के लिए आयोजित वार्षिक क्रिसमस कार्यक्रम में The Spiritual Expression of Friendship पुस्तक का विश्वव्यापी वितरण हेतु आधिकारिक रूप से विमोचन किया। उस विशेष अवसर पर, स्वामी चिदानन्दजी ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित तथा ऑनलाइन जुड़े वाईएसएस/एसआरएफ़ के संन्यासियों को इस पुस्तक में परमहंसजी द्वारा दी गई प्रेरणा के अथाह स्रोत के विषय में सम्बोधित किया। स्वामी चिदानन्दजी ने कहा, “यह एक छोटी पुस्तक है। परन्तु जैसा कि किसी भी चीज़ के साथ होता है जिस पर गुरुदेव की चेतना और जीवन का स्पर्श हो, उसमें बहुत कुछ समाहित होता है!”

यह पुस्तक तीन खण्डों में विभाजित है, जिसका आरम्भ परमहंसजी की Songs of the Soul से ली गई सुन्दर कविता “Friendship”से होता है। इसके पश्चात् मैत्री की दिव्य प्रकृति और आध्यात्मिक शक्ति पर एक गहन प्रेरणादायक लेख है। अन्तिम खण्ड में एक काव्यात्मक प्रेरणा, “Love Is the Breath of Spirit,” प्रस्तुत की गई है, जिसके विषय में स्वामी चिदानन्दजी ने समझाया कि परमहंसजी “अपने आत्म-साक्षात्कार और समस्त सृष्टि में प्रवाहित और व्याप्त दिव्य प्रेम के अनुभव से बोल रहे हैं।”

वाईएसएस/एसआरएफ़ अध्यक्ष ने उस उदात्त लेख की उत्पत्ति और विकास पर भी प्रकाश डाला, जिससे पुस्तक का शीर्षक लिया गया है और जो पुस्तक का अधिकांश भाग है। मूलतः परमहंसजी द्वारा 1930 के दशक में लिखे गए इस लेख को, पहली बार वाईएसएस/एसआरएफ़ पाठमाला की प्रारंभिक शृंखला के एक अंश के रूप में प्रकाशित किया गया था। जब पाठमाला का नया सम्पूर्ण संस्करण (2019 में विमोचित) तैयार किया जा रहा था, तब पूर्व अध्यक्षगण श्री दया माता और श्री मृणालिनी माता ने निर्णय लिया कि इस लेख को गोपनीय गृह-अध्ययन शृंखला में रखने के बजाय, जहाँ यह सबके लिए सुलभ नहीं होता, आध्यात्मिक मित्रता पर इस सार्वभौमिक रूप से लागू होने वाले संदेश को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि इसका अधिकाधिक प्रसार और समग्र मानवता पर प्रभाव सुनिश्चित किया जा सके। स्वामी चिदानन्दजी ने यह भी उल्लेख किया कि परमहंसजी ने 1949 में अपने लेख की पुनः समीक्षा की थी, जिसमें उन्होंने ऐसे विस्तृत विवरण और स्पष्टीकरण जोड़े थे जो अब तक कभी प्रकाशित नहीं हुए थे। इस प्रकार, स्वामी चिदानन्दजी ने कहा कि इस नई पुस्तक में अब संसार के पास “परमहंस योगानन्दजी के आध्यात्मिक मित्रता, दिव्य मित्रता पर आधारित इस अद्भुत ग्रंथ की प्रामाणिक प्रस्तुति” है।

पाठकों को ज्ञात होगा कि पुस्तक का तीसरा खंड अद्वितीय चित्रों से संवर्धित है, जो काव्यमय प्रेरणा के प्रत्येक अनुच्छेद में निहित गहन आध्यात्मिक बिंबों को सजीव बनाते हैं। इसकी परिकल्पना भी श्री दया माता और श्री मृणालिनी माता ने की थी, जब उन्होंने सन् 2000 में योगदा सत्संग पत्रिका के लिए इस प्रेरणादायक रत्न को तैयार किया था और अंततः इसे स्थायी पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के निर्देश दिए थे।

एसईओएफ़-इनसाइड

स्वामी चिदानन्दजी ने अपने उद्बोधन का समापन इस बात पर प्रकाश डालते हुए किया कि इस पुस्तक का विमोचन सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय, माउण्ट वॉशिंगटन पर, उसके शताब्दी वर्ष के दौरान कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि दिव्य मित्रता का विषय और आदर्श ही वास्तव में वह “पोषक सिद्धांत” है, जो परमहंसजी द्वारा इस स्थान पर स्थापित संन्यासी समुदाय की समर्पित सेवा में गुँथा हुआ है, और यह उनके उस विश्वव्यापी कार्य का मूल आधार भी है जो इस विशेष केन्द्र से प्रकट होने के लिए नियत था। गुरुदेव ने कहा, “यदि आप सभी प्रेम, सद्भाव, दयालुता और विनम्रता के साथ मिलकर कार्य करेंगे, तो यह कार्य पूरे विश्व में व्याप्त हो जाएगा।”

“परमहंसजी प्रायः कहा करते थे कि ईश्वर के प्रेम की सच्ची मित्रता से अधिक शुद्धतर अभिव्यक्ति इस भौतिक संसार में और कुछ नहीं है,” स्वामी चिदानन्दजी ने कहा, “यह वही मित्रता है जिसका इस पुस्तक में इतने सुन्दर ढंग से वर्णन किया गया है। आज हमारे संसार को इन शिक्षाओं और सिद्धांतों की स्पष्ट रूप से अत्यधिक आवश्यकता है। और मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मैं जीसस के जन्मोत्सव के हमारे समारोह के दौरान, क्रिसमस पर इस सुन्दर प्रकाशन का औपचारिक रूप से विमोचन कर रहा हूँ। इस पुस्तक में हमारे गुरु कहते हैं: ‘जीसस के इतने अधिक अनुयायी क्यों हैं? क्योंकि वे, अन्य महान् सन्तों और अवतारों की भाँति, मानव जाति की सेवा में अग्रगण्य हैं। मित्रों को आकर्षित करने के लिए व्यक्ति में एक सच्चे मित्र के गुणों का होना अनिवार्य है।’यही बात हमारे गुरु ने इस छोटी किन्तु शक्तिशाली पुस्तक में सशक्त और अविस्मरणीय ढंग से समाहित की है, जिसे आज विमोचित कर और आप सभी के साथ साझा कर पाने से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।”

सच्ची मित्रता : सभी के लिए एक सार्वभौमिक और एकीकृत करने वाली साधना

इस सुंदर सचित्र पुस्तक में, योग और आध्यात्मिकता के सर्वाधिक श्रद्धेय आधुनिक गुरुओं में से एक, सच्ची मित्रता के मूल में निहित सार्वभौमिक अभ्यासों को रेखांकित करते हैं, जो संघर्षों से ग्रस्त मानवता के लिए एक सामयिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे दिखाते हैं कि जब इसे अपने शुद्धतम और उत्कृष्ट रूप में साधा जाता है, तो मित्रता में हमें हमारी सामान्य दैनंदिन चेतना से परे, एक विस्तृत एवं सर्वव्यापी चेतना में ले जाने की क्षमता है, जहाँ हम दूसरों के साथ, और अन्ततः समस्त जीवन के साथ एक एकात्मकारी दिव्य बन्धुत्व का अनुभव करते हैं। हमें उस समावेशी और आलिंगनकारी प्रेम का अनुभव होता है, जो आत्मा का सच्चा स्वरूप है।

इसमें समाहित विषय :

  • मैत्री के अचूक नियमों को कैसे लागू करें
  • पूर्व जन्मों के मित्रों को पहचानना
  • ऐसे चुम्बकत्व को विकसित करना जो हम जहाँ भी जाएँ, सच्चे मित्रों को अपनी ओर आकर्षित करता है
  • जो हमें प्रेम नहीं करते, उनसे प्रेम करने का अभ्यास कैसे करें
  • …एवं और भी बहुत कुछ!

अपने प्रेम के जगमगाते साम्राज्य की सीमाओं का धीरे-धीरे विस्तार करते हुए इसमें अपने परिवार को, अपने पड़ोसियों को, अपने समाज को, अपने देश को, समस्त देशों को समस्त जीवित, चेतन प्राणियों को समाहित कर लीजिए। एक अखिल मित्र बनिए, जो ईश्वर की सम्पूर्ण सृष्टि के लिए दया एवं प्रेम से सिक्त हो, जो सर्वत्र प्रेम का रोपण करे।

— परमहंस योगानन्द, “The Spiritual Expression of Friendship”

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